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    जिसकी लाठी,उसकी भैंस

    राकेश अचल का  लेख। राजनीति का मुहावरों और कहावतों से गहरा रिश्ता है, ये रिश्ता न होता तो शयद कहावतों  और मुहावरों को कोई पूछता नहीं, जर्मनी में बैठे हमारे प्रधानमंत्री रामपुर और आजमगढ़ उपचुनाव के नतीजों पर बोलते हैं तो ये विश्वास और गहरा जाता है कि -जिसकी लाठी होती है ,भैंस भी उसी की  मानी जाती है। ये बात अलग है कि  भैंस की शक्ल,सूरत क्या है ?

    आजकल लाठी भी उनकी है और भैंस भी उनकी। वे जो चाहे सो करें, बोलें या चुप रहें। घर में बोलें या विदेश में बोलें ,आप कोई सवाल नहीं कर सकते। सवाल करेंगे तो उनके भक्त आपको निर्लज्ज कहेंगे। लेकिन मै सचमुच इन बातों की परवाह नहीं करता। जब हमारे नेता किसी की परवाह नहीं करते तो मै क्यों करूँ  ? मै तो ठहरा एक अदद मतदाता .वो मतदाता जो जनादेश देता है बदले में पूरे पांच साल तमाशा देखता है। जनादेश देना एक बात है और तमाशा देना दूसरी बात है। 

    बात भैंस और लाठी की चल रही है। आजकल आजमगढ़ में आजम खान की लाठी भी टूट चुकी है और उनकी भैंसें  भी कोई खोल ले गया है। हमारे यहां चंबल में भैंस खोलना कुटीर उद्योग की श्रेणी में आता है। यहां भैंस  खोलना और फिर भैंस की रिहाई के बदले में फिरौती मांगना आदिकालीन धंधा है। फिरौती को पनिहाई कहा जाता है, पनिहाई का रिश्ता शायद पन्हा से रहा होगा। भैंस वो ही खोल सकता है जिसका पन्हा बड़ा हो। हिन्दुस्तानी फिल्मों का लोकप्रिय संवाद है -जितना बड़ा जूता होता है ,पालिश भी उतनी ही ज्यादा लगती है चिनाय सेठ '। 

    बहरहाल यूपी में रामपुर और आजमगढ़ में बड़े-बड़े नेताओं की लाठियां तोड़कर भैंसे खोल ली गयीं है और पंत प्रधान कहते हैं कि ये चुनाव ऐतिहासिक हैं। ऐतिहासिक तो हैं ,क्योंकि इन चुनावों में पुर उजड़ गया और गढ़ धराशायी हो गया .होना ही था। जिन  दो हजार के मतदान केंद्र पर दो लोग ही मतदान कर पाएंगे तो ऐसा ही होगा। ऐसा लोकतंत्र पूरी यूपी को मुबारक, ये जिसकी लाठी ,उसकी भैंस का सर्वोत्तम नमूना है। 

    भैंस सनातन पशु है।  काला है,कुरूप है लेकिन वसा और दूसरे मामलों में सम्पन्न है. त्रेता में राम जी को दायजै [दहेज] में जो वस्तुएं मिलीं थीं उनमें  भैंस भी शामिल थी। राजा जनक के पास जितनी गायें थीं उससे कहीं ज्यादा भैंसें भी थी। मेरी बात पर यकीन न हो तुलसीदास जी की राम चरित मानस बांच लीजिये। बहरहाल भैंस अगर लोकप्रिय न होती तो असुरों के नाम महिषासुर क्यों होते ? क्यों कुम्भकर्ण भैंस को अपने भोजन में शामिल करता ? क्यों महिषासुर मर्दनी अवतरित होतीं ?

    भैंस युगानुरूप अपनी शक्ल-सूरत बदलती रहती है। कभी उसका रूप सत्ता सुंदरी का होता है तो कभी वो ईडी,डीडी बन जाती है .भैंस यानि महिषी, सबकी पसंद है। सब उसे अपने दरवाजे पर बाँधना चाहते हैं ,क्योंकि दुधारू भी होती और जखड़  भी, जब किसी राजमार्ग पर चलती है तो चाहे पंत प्रधान का कारकेट आ जाये अपनी जगह से टस से मस नहीं होगी। भैंस के ऊपर यातायात का कोई नियम लागू नहीं होता। भैंस केवल लाठी को पहचानती है जिसके हाथ में लाठी होती है भैंस उसी के साथ चल देती है। भैंस नहीं देखती कि  लाठी हाथ के हाथ में है या झाड़ू के हाथ में, कीचड़ में सने नेताओं के हाथ में है या हाथी छाप नेत्रियों के हाथ में, साइकल पर है या पैदल ? भैंस को केवल लाठी से मतलब। 

    भैंस को लोरना खूब आता है, जहाँ जलाशय देखती है लोर जाती है। दलदल तो उसे अति प्रिय है, भैंस अपनी देह को दलदल में ऐसे चभोरती है जैसे की उबटन लगाया जाता है। भैंस पुत्र को यमराज ने अपना वाहन बना रखा है। कारण उसकी अपनी प्रवृत्तियां हैं। कुर्बानी के लिए भैंस या उसके बच्चों से अच्छा और कोई पशु नहीं है। गाय का बलिदान कोई नहीं देता। जो लोग भैंस अफोर्ड नहीं कर सकते वे बकरा,मुर्गा का विकल्प चुनते हैं ,लेकिन भैंस की कुर्बानी का कोई मुकाबला नहीं, भैंस जनादेश के बावजूद लाठियों के सामने बड़े ही अदब के साथ कुर्बान होती है .सदियों से होती आ रही है। महाराष्ट्र में भैंस को लोगों ने हांकने की गलती तो कर ली लेकिन न उसके ऊपर सवारी कर पा रहे हैं और न उसकी कुर्बानी ही दे पा रहे हैं और भैंस है की खड़ी-खड़ी पगुरा रही है। 

    भैंस भारत के अलावा पकिस्तान,चीन ,नेपाल, मिस्र,ईरान ,म्यांमार,इटली,तुर्की और वियतनाम में पायी जाती है। भैंस की अनेक प्रजातियां हैं .ये जनागल में रहने लगें तो जंगली कहलाने लगती हैं और शहरों -गांवों में आ जाएँ तो मुर्रा  हो जातीं हैं .दुग्ध उत्पादन में इसका हिस्सा 60  फीसदी और मांस उत्पादन में 30  फीसदी है। यानि ये सिर्फ सत्ता सुंदरी नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था  की भी पोषक है। भैंस का पगुराना जितना चर्चित है उतना ही उसका डोका भी चर्चित है। भैंस बोलती नहीं है केवल डोका देती है .हमारे बहुत से नेताओं में ये लक्षण पाए जाते हैं। 

    भैंस को संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं रही। हमारे बुजुर्गों का अनुभव है कि  आप भैंस के सामने खड़े होकर खूब बीन बजाते रहिये वो खड़ी-खड़ी पगुराती रहेगी। यानि नाद ब्रम्ह  से भैंस का कोई लेना -देना नहीं, भैंस का अक्षरों से भी कोई लेना देना नहीं है फिर वे अक्षर चाहे किसी भाषा के हों ? भैंस के लिए काला अक्षर अपने बराबर का काला दिखाई देता है। भारत में भैंस को पूरा-पूरा सम्मान दिया जाता है तभी तो 36 साल पहले ही देश में भैंस अनुसन्धान केंद्र की स्थापना कर दी गयी थी। श्रीलंका में नेशनल भैंस उद्यान है, कम्बोडिया वाले बी भैंस का पूरा सम्मान करते हैं। 

    बहरहाल बात जिसकी लाठी उसकी भैंस की चल रही थी। तीस्ता सीतलवाड़ को शायद इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी इसीलिए उन्हें गुजरात की पुलिस उठा ले गयी। गुजरात पुलिस आजकल दलदल वाले दल की भैंस है। उसका काम ही आँख बंद काम करना है, गुजरात की पुलिस भी अपना-पराया नहीं देखती। उसे तो बस लाठी वाले हाथ दिखाई देते हैं, जो सत्ता की भैंस को आँख दिखायेगा या उसे बदनाम करेगा सीधा जेल जाएगा। भैंस को आँख दिखाना या बदनामकरना राष्ट्रद्रोह है। आपको सतर्क रहना चाहिए, आजमखान और अखिलेश यादव इसीलिए गच्चा खा गए, उन्होंने अपनी भैंस की रखवाली नहीं की और भैंस कब दूसरे के खूंटे से बांध गयी उन्हें पता ही नहीं चला। लोकतंत्र की सेहत के लिए भैंस की सेहत भी अच्छी होना चाहिए। भैंस और लोकतंत्र में एक ही साम्य है। ये दोनों लाठी से हाँके जाते हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस ही नहीं लोकतंत्र भी उसी का होता है। इसलिए भैंस के बजाय लाठी पर कब्जा करने की कोशिश कीजिये। लाठी हाथ में होगी तो सत्ता की भैंस आखिर कहाँ जाएगी ? 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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