Header Ads

  • INA BREAKING NEWS

    पृथ्वीराज के बहाने इतिहास पर बकबास

    राकेश अचल का लेख। इतिहास को भारत की दृष्टि से देखने के लिए अब आपको रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब ,गौरीशंकर हीराचंद ओझा ,विश्वनाथ काशिनाथ राजवाडे,यदुनाथ सरकार,रमेशचन्द्र मजुमदार‎,रामशरण शर्मा या बिपिन चन्द्र की जरूरत नहीं है। भारत की दृष्टि से इतिहास जानने के लिए अब अक्षय कुमार की फ़िल्में ही पर्याप्त हैं। वो भी इसलिए क्योंकि अक्षय कुमार की फिल्म ' सम्राट पृथ्वीराज ' को देश के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन आरएसएस के प्रमुख डॉ मोहन भागवत प्रमाणित करते हैं। 

    भारतीय इतिहास को लेकर संघ और संघ जनित जनसंघ तथा अब भाजपा दशकों से एक अभियान चलाये हुए हैं।  इन संगठनों को लगता है कि भारत का जो इतिहास आजाद भारत के लोग पढ़ रहे हैं वो दूषित है,गलत है ,भ्रामक है। अर्थात पढ़ाये जा रहे इतिहास में भारतीय दृष्टि है ही नहीं, इतिहास पढ़ने के लिए यदि आजादी के 75  साल बाद हमें फ़िल्मी माध्यम का सहारा लेना पड़े तो ये हास्यास्पद है, हास्यास्पद इसलिए है कि जो अब दिखाया जा रहा है वो पता नहीं कैसे प्रामाणिक माना जा रहा है। 

    संघ और भाजपा वाले ही नहीं देश में इससे पहले एक करनी सेना भी प्रकट हुई थी जो जोधा-अकबर जैसी फिल्मों को लेकर पूरे देश में तलवारें भांजती फिर रही थी। भाजपा ने हाल ही में देश की विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ' दी कश्मीर फ़ाइल ' के जरिये कश्मीर को भारतीय दृष्टिकोण से दिखाया था ,लेकिन आज का कश्मीर दिखाने के लिए अभी तक किसी ने फिल्म नहीं बनाई है। इतिहास का पुनर्लेखन या शुद्धिकरण इतना आसान तो नहीं जितना की सुबह-सुबह सूरज का उगना, इतिहास तो कुछ प्रमाण भी साथ लेकर चलता है, किंवदंतियां तक कभी-कभी इतिहास पर भारी पड़तीं हैं। 

    'सम्राट पृथ्वीराज' फिल्म देखने के बाद डॉ मोहन भागवत के श्रीमुख से निकला कि- ' अब हम इतिहास को भारत के दृष्टिकोण से देख रहे हैं। उन्होंने अक्षय कुमार और मानुषी छिल्लर अभिनीत इस फिल्म को विश्व स्तरीय बताया। आरएसएस के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ फिल्म देखने के बाद भागवत ने कहा कि यह तथ्य-आधारित फिल्म है और यह सही संदेश देती है, जिसकी आज देश को आवश्यकता है। हम दूसरों के द्वारा लिखे गए अपने इतिहास को पढ़ते थे। अब हम इतिहास को भारत के नजरिए से देख रहे हैं।'

    मजे की बात ये है कि फिल्मों के जरिये इतिहास लिखने और दिखने का इल्म हासिल कर चुके फिल्म निर्माताओं को भाजपा शासित राज्यों में फौरन मनोरंजन कर से मुक्ति मिल जाती है। भाजपा से जुड़े ये फिल्म निर्माता रातों-रात करोड़पति हो जाते हैं और इतिहास कूड़े में चला जाता है। आखिर सत्तारूढ़ भाजपा और उसकी जननी संघ को फिल्मी इतिहास कि जरूरत क्यों पड़ रही है ? क्या इनके जरिये ये दोनों एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते हैं जो कहीं है ही नहीं ? 

    भारत में इससे पहले भी ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि पर दर्जनों फ़िल्में बनाई गयीं किन्तु उन्हें न किसी संघ के प्रमाण पात्र की जरूरत पड़ी और न उन्हें इतिहास की तरह देखा गया .' सिकंदर','मुगलेआजम ',रजिया सुलतान ' ,जोधा-अकबर ,' बाजीराव मस्तानी ', पद्मावत,' झाँसी की रानी ', तानाजी 'यहाँ तक कि भगत सिंह और महात्मा गाँधी पर भी फ़िल्में बनें गयीं लेकिन कोई राजनीतिक दल इन फिल्मों का प्रचारक और उद्धारक नहीं बना। सबने फिल्मों को फिल्मों के नजरिये से देखा। लेकिन अब फिल्मों को सही इतिहास कहकर सम्मानित किया जा रहा है। 

    इतिहास मेरा भी प्रिय विषय रहा है। मै भी बचपन से ' झाँसी की रानी ' की कहानी को सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी गयी कविता के जरिए जानता और मानता था ,लेकिन मैंने जब इसी विषय पर हजारों पेजों की पड़ताल कर 'गद्दार ' शीर्षक से उपन्यास लिखा तो मुझे सिंधिया के पीआरओ का ख़िताब दिया गया क्योंकि मै उपंन्यास में ये प्रमाणित नहीं कर पाया कि सिंधिया ने झाँसी की रानी के साथ गद्दारी की थी .यानि आप जो सुनते आ रहे हैं वही देखना चाहते हैं या दिखाना चाहते हैं। जो प्रमाणिक हो या न हो इससे आपको कोई लेना-देना नहीं। 

    हकीकत ये है कि इतिहास हमेशा से घटनाओं और उनसे जुडी घटनाओं का वर्णन करता आया है। इतिहास को अंग्रेजी में[ history ]हिस्ट्री कहा जाता है. ग्रीक भाषा में इसका अर्थ बुनना होता है। जाहिर है कि इतिहास घटनाओं और धारणाओं की एक सार्थक बुनावट है .इतिहास न विज्ञान है और न ही कपोल कल्पना ,बल्कि इतिहास भी साहित्य की एक विधा है और उसे इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। इतिहास लेखन का ही कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है। सभ्य समाज ने कब से अपना इतिहास लिखना शुरू किया ,इसी पर विवाद हैं। इसलिए इतिहास को राजनीति के लिए इस्तेमाल करना एक अपराध है .इतिहास के उजाले में वर्तमान को देखना समझदारी नहीं है। 

    हमारे भाग्य विधाता पहले औरंगजेब से लड़ते दिखाई देते हैं और फिर अचानक उनके निशाने पर मोहम्मद गौरी आ जाता है। वे पहले मस्जिदों में से मंदिर तलाशते हैं और बाद में मोहम्मद गौरी में से पृथ्वीराज चौहान को निकाल लेते हैं और सम्राट  की तरह सम्मान देने लगते हैं। इतिहास को देखने की भारतीय दृष्टि यदि नागपुरिया चश्मे से ली जाएगी तो उसमें सामंत ही सामंत हीरो होंगे और गांधी ,नेहरू सबके सब अपराधी ये बात समझ से बाहर है कि हम अतीत के नायकों-खलनायकों से क्यों जूझ रहे हैं ? हमें आजादी के लिए लड़ने-मरने वाले नायक भी खलनायक नजर आते हैं.हम केवल वीर सावरकर को ही वीर मानते हैं ,किसी और को नहीं, बेहतर होता कि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगौर  गांधी को महात्मा की जगह वीर या महावीर की उपाधि दिए होते। 

    पृथ्वीराज को सम्राट बनाने वाले अक्षय कुमार की जय बोलना ही यदि आज का राष्ट्रधर्म है तो आप शौक से जय बोलिये ,उन्हें सम्मानित कीजिये ,संसद में नामित कीजिये ,भारतरत्न दीजिये, हमें कोई ऐतराज नहीं ,लेकिन आम हिन्दुस्तानी इस भेड़चाल में शामिल होने वाला नहीं है। फ़िल्में आती हैं जाती हैं लेकिन इतिहास नहीं बनतीं,न इतिहास बनाती हैं। फ़िल्में सिर्फ फ़िल्में होती हैं। एक आभासी दस्तावेज, अक्षय की बनाई फिल्म तकनीकी दृष्टि से बेहतरीन फिल्म हो सकती है लेकिन उनकी फिल्म के जरिये भारतीय  जन मानस को कोई नई इतिहास दृष्टि मिलेगी ऐसा कम से कम मै तो नहीं मानता। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

    Post Top Ad


    Post Bottom Ad


    Blogger द्वारा संचालित.