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    लोकतंत्र का तमाशा,तमाशे का लोकतंत्र।

    राकेश अचल का लेख। आजादी के अमृत वर्ष में लोकतंत्र का तमाशा जारी है ,बल्कि आप कह सकते हैं कि हमारा लोकतंत्र ही तमाशा है। असंख्य भारतीयों की शहादत को छुद्र राजनीति ने तमाशा बना दिया है। इस तमाशे पर न कानून लगाम लगा पाया और न जनता, सब इस तमाशे का हिस्सा हैं,अपराधी हैं और तमाशा फिर भी जारी है।  तमाशे की उम्र भी लोकतंत्र की उम्र से थोड़ी सी कम है। 

    सरकार चाहे जनादेश से बनी हो या जोड़तोड़ से ,उसकी उम्र खरीदारों के हाथ में होती है। सरकारें कभी मध्यप्रदेश में गिराई जाती हैं तो कभी महाराष्ट्र में, दिशा कोई भी हो सबका चरित्र लगभग एक जैसा है। लोकतंत्र के जो पहरुए हैं वे जन्मना बिकाऊ ही पैदा हो रहे हैं। राजनीति में जबसे व्यापारी मानसिकता ने घर किया है तब से ये खरीद-फरोख्त और तेज हो गयी है। कोई नैतिकता नहीं,कोई क़ानून का भी नहीं, कोई लाज नहीं,कोई शर्म नहीं, बस खरीदो,और बेचो, धड़ल्ले से खरीदो,बेचो मन माने दाम पर खरीदो और बेचो। 

    महाराष्ट्र में शिवसेना ,एनसीपी और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार थी। 02 साल 07 महीने से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सरकार चला रहे थे लेकिन अब आजकल में उनकी सरकार का अंत उन्हीं की पार्टी के बागी कर रहे हैं। दरअसल चलती हुई सरकार को अस्थिर करने वाले बाग़ी नहीं बिकाऊ लोग होते हैं। बाग़ी होते तो मुंबई में बैठकर अपने ही नेतृत्व से मुकाबला करते। चोरों की तरह सूरत से गुवाहाटी भागे-भागे न फिरते, जो बाग़ी हैं वे ही बिकाऊ हैं, कोई कहे या न कहे ,माने या न माने लेकिन हकीकत ये है कि  भाजपा शिवसेना के इन बागियों की मुंह मांगी कीमत लगा चुकी है। 

    भाजपा जहाँ जनादेश से नहीं जीत पाती वहां धनादेश से जीतने का हुनर जानती है। ये हुनर भाजपा ने कहीं और से नहीं बल्कि कांग्रेस से सीखा है। उस कांग्रेस से जिसे वो देश से समूल नष्ट कर देना चाहती हैजिसके पीछे उसने ईडी सीडी सब लगा रखी है। भाजपा ने मध्य प्रदेश समेत जहाँ भी मौक़ा मिला सरकारों को अस्थिर कर गिराया और विधायक खरीदकर अपनी सरकार बनाई। भाजपा की किस्मत अच्छी है की उसके हटकने वाला न पार्टी के भीतर कोई है और न पार्टी के बाहर, विपक्ष ' नल्ला ' हो चुका है। विपक्ष न जनादेश की रक्षा कर पा रहा है और न जनता की , दोनों असहाय हैं ,निरुपाय हैं। 

    महाराष्ट्र के संदर्भ में मुझे कोई हैरानी नहीं है, हैरानी की कोई वजह है भी नहीं, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री जिस तरिके से सरकार चला रहे थे उसका अंत यही होना था, उद्धव ठाकरे के पास बाल ठाकरे जैसी ऊर्जा का बाल तक नहीं है। न तेवर हैं और न व्यक्तित्व , नसीब में लिखा था सो वे मुख्यमंत्री बन गए, कांग्रेस और एनसीपी की अटकी थी सो वे मुख्यमंत्री बन गए। महाराष्ट्र में भाजपा को सत्ता में आने से रोकना सबकी प्राथमिकता थी ,इसलिए ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए। कांग्रेस और एनसीपी ने ढाई साल ठाकरे को सहा और भाजपा को रोका लेकिन बुर्ज शिवसेना की ही कमजोर निकली। 

    इस बार न कांग्रेसी बिके और न एनसीपी के विधायक, बिके तो शिवसैनिक बिके, शिव सैनिक भी बिकाऊ हो सकते हैं ,ये मुंबई वालों ने सोचा नहीं होगा। लेकिन वे अपने शिव सैनिकों को राजनीति की मंडी में बिकते हुए देख सकते हैं। अब महाराष्ट्र ही नहीं पूरा देश उद्धव ठाकरे को गिड़गिड़ाते,मिमियाते हुए देख रहा है। इसी को तमाशा कहते हैं। इस तमाशे में क़ानून भी मूक दर्शक है, बेचारे राज्यपाल को दिल्ली के निर्देशों की प्रतीक्षा है। वे अपने विवेक से कुछ कर ही नहीं सकते। वैसे भी राज्यपाल के पास अपने विवेक से काम करने का अधिकार रहा ही कहाँ है ?

    बिकाऊ शिव सैनिकों की और से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के लिए ये अगले महीने आने वाले उनके जन्मदिन का पेशगी तोहफा है। इस संकट में उनके साथ कोई नहीं है। मनसे भी नहीं, हो भी तो क्यों हो ? उद्धव ठाकरे ने ढाई साल अपने ढंग से सरकार चलाई है। अब उसी का खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। इस महा पतन के बाद महाराष्ट्र में शिव सेना शायद ही कभी सत्ता का स्वाद चख पाए। शिव सेना की जो धनक महाराष्ट्र में बनीं थी उसे लालची शिव सैनिकों से विधायक बने लोगों से अपनी  कीमत वसूल कर समाप्त कर दिया है। उनकी शेर छवि बकरी में तब्दील हो चुकी है। अब जब भी चुनाव होंगे तब उन्हें कोई दो कौड़ी में नहीं पूछेगा। भाजपा भी नहीं, भाजपा को तो आज उनकी जरूरत है। केवल सरकार गिराने और सरकार में ईंट-रोड़ा बने रहने तक उनकी जरूरत है। 

    महाराष्ट्र में व्यंग्य चित्रकार स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे ने 56 साल पहले जिस उद्देश्य से शिव सेना की स्थापना की थी उसका समापन उन्हीं के अपने लोगों ने कर दिया है। जब शिवसेना को 19 जून को अपना 56 वा स्थापना दिवस मनाना था तब शिव सेना अपनी बर्बादी और विभाजन का तमाशा देख रही है। शिव सेना के लोकसभा में 18 ,राज्य सभा में 03 और महाराष्ट्र विधानसभामें 56 सदस्य हैं लेकिन उसकी इस ताकत को भाजपा ने एक झटके में समाप्त कर दिया। भाजपा को इसके लिए दोष देने का कोई अर्थ नहीं है। ये उसका अपना चरित्र है। उसकी अपनी रणनीति है। दुर्भाग्य तो लोकतंत्र का है ,जहां जनादेश को धनादेश से आइसक्रीम के गोले की तरह खरीदा जा सकता है। 

    राजनीति में व्यापार के संस्कार विकसित करने वाली भाजपा हर राज्य में विभीषण खोज लेती है। खोज ही नहीं लेती उन्हें रामभक्त बनाकर अपना भी बना लेती है। हर कीमत पर बना लेती है लेकिन जैसे ही लंका ढहती है तिलक अपने ही किसी आदमी का सारती है। भाजपा ने अभी हाल फिलहाल तो किसी विभीषण का राजतिलक नहीं किया। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी केंद्र में मंत्री बनाया है ,लेकिन प्रदेश में उन्हें उनकी हैसियत से अवगत करा दिया। आगे पीछे महाराष्ट्र में भी बागी एकनाथ शिंदे का होना तय है। बागियों के साथ यही होता आया है। 

    कांग्रेस  दलबदल के संस्कार की जनक तो नहीं है किन्तु उसने भी इसका इस्तेमाल करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। देश की राजनीति में ' आयाराम-गयाराम ' का मुहावरा कांग्रेस ने ही गढ़ा है। हालाँकि देश में सरकारों को लंगड़ा-लूला कर गिराने का श्रेय पूर्व सामंतों के नाम ही लिखा हुआ है। भारत का लोकतंत्र तब तक सवल और चिरायु नहीं हो सकता जब तक की दलबदल का ठोस इलाज नहीं हो जाता। दलबदल सियासी कोढ़ है। कोविड होता तो तो शायद किसी टीके से ठीक हो जाता किन्तु कोढ़ तो कोढ़ है। 


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