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    राम राज या आम राज

    राकेश अचल का लेख। भारत में राम राज पहले आया या आम राज, इस पर बहस की जरूरत है, क्योंकि इस समय देश और दुनिया में जो बहसें चल रहीं हैं उनमें न रस है और न गंध,गूदा तो  है ही नहीं। मुझे राम राज और आम राज में बचपन से दिलचस्पी रही है, इसलिए मै आपको भी इस खुशबू और स्वाद से भरे विषय में शामिल करना चाहता हूँ। 

    राम राज में आम जरूर रहे होंगे ,क्योंकि लंका जीतने गए भालुओं और बानरों का गुजर -बसर तो आम के बिना हो ही नहीं सकता। राम राज के बाद ही देश में राजतंत्र के साथ ही लोकतंत्र आया और आम की तरह आदमी को भी महत्व दिया गया। मुझे लगता है कि आम की लोकप्रियता के चलते ही गरीबों की जमात को आम आदमी का नाम दिया गया होगा। आम फलों का राजा होता है तो आम आदमी लोकतंत्र का राजा, ये बात अलग है कि राम राज हो आम राज चूसा और निचोड़ा आम और आम आदमी ही है। 


    इस समय हमारे देश में आम आदमी के दिलों पर या तो देश के चौकीदार का राज है या फिर फटेहाल पप्पू का, चौकीदार कौन है और पप्पू कौन है ये बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दोनों ही अपने-अपने उपनाम से जाने -पहचाने जाते हैं। आजकल आम आदमी के प्रिय पप्पू ईडी की गिरफ्त में हैं, ईडी ने पप्पू से पूरे दस घंटे पूछताछ की, अभी न जाने कितने घंटे उन्हें इसी तरह ईडी के सवालों के जबाब देना है। मौखिक परीक्षा के बाद ही ईडी तय करेगा कि आम आदमी के इस ख़ास आदमी को जेल भेजा जाये या फिर आजाद छोड़ दिया जाये ?

    ईडी कहने को तो एक संवैधानिक संस्था है लेकिन राम राज में उसका 'निक नेम' भी तोता-मैना हो गया है। कहते हैं कि ईडी अपने आप काम नहीं करती,उसे इशारे करना पड़ते हैं या ताली बजाकर चेताना पड़ता है। ईडी इशारा पाते ही अपने शिकार को लपक लेती है। पप्पू  को लपकने में ईडी को बहुत देर लगी, लेकिन हमारे यहां देर हैं अंधेर नहीं, पप्पू  से पूछताछ को लेकर कांग्रेसी दुखी होकर सड़कों पर निकल आये कहते हैं कि पप्पू से पूछताछ नहीं होना चाहिए, क्योंकि बड़े लोगों से पूछताछ होती नहीं है। चौकीदार से भी आठ साल में किसी ने पूछताछ की ? प्रेस वाले भी उनसे पूछताछ नहीं कर सकते। 

    बहरहाल बात आम की थी ,बीच में आम आदमी के बीच रहने का दावा करने के कारण उस पर भी बात करना पड़ी, हमारे यहां आम उतना ही पुराना है जितना की हमारा मजहब, कम से कम चौथी शताब्दी से तो हम आम उत्पादक देश हैं ही, हमने ही दुनिया को आम खिलाया, हमारे यहां जो भी आक्रांता आया ,जाते वक्त आम अपने साथ ले गया, आज आम दुनिया में न जाने कितने देशों में पैदा होता है, लेकिन हमारे आम जैसा आम और कहीं नहीं मिलता, हमारे आम को अंग्रेजी वाले मेनजीफेरा कहते हैं और आज यही नाम बिगड़ते-बिगड़ते मेंगो हो गया है। 

    दुनिया में मेंगो और बनाना में बहुत पुरानी अदावत है। मेंगो ,बनाना से जलता है क्योंकि दुनिया ने 'बनाना डेमोक्रेसी' तो अपना ली लेकिन मेंगो डेमोक्रेसी नहीं अपनायी। हम आम को ही नहीं उसके पत्तों तक को पवित्र मानते हैं इसीलिए पूजा-अर्चना में सबसे पहले आम के पत्तों के तोरण बनाते हैं,कलश सजाते हैं, हमारे यहाँ हर भाषा में आम को आम ही कहा गया है हाँ संस्कृत वाले इसे आम्र कहते हैं, आम्र के पुष्प गुच्छ आम्रमंजरी कहलाते हैं, ये मधुमख्खियों और कवियों को बहुत भाते हैं, आम के बागीचे को अमराई कहते हैं, ये घनी और छायादार होने के कारण पुराने जमाने में आउटडोर शूटिंग करने वालों को बेहद आकर्षित करती थी। 

    भारत दुनिया के तमाम इंडेक्सों में भले ही नीचे और सबसे नीचे रहता हो लेकिन आम उत्पादन में उसका नंबर एक है। दुनिया में सबसे ज्यादा 187 लाख टन आम भारत पैदा करता है। चीन आबादी में भले हमसे आगे हो लेकिन आम की पैदावार करने में बहुत पीछे है। यानि चीन केवल 47 लाख टन आम ही सालाना पैदा कर पाता है। आम के उत्पादन में नंबर एक रहने का श्रेय किसी नेहरू, गाँधी या मोदी को नहीं बल्कि इस देश के किसानों को है। वे ही कड़ी मेहनत करते हैं। 

    सियासत में जैसे राजनीतिक दलों की कमी नहीं है वैसे ही भारत में आम की किस्मों की कमी नहीं है। आम आदमी केवल राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय आमों के नाम जानता है जबकि इसकी तमाम प्रजातियां क्षेत्रीय होती हैं। मुंबइया फिल्मों की तरह आम की एक प्रजाति बम्बइया भी है। वैसे आम की अन्य प्रजातियों में बंबइया बादाम ,तोतापरी,मालदा,पैरी,सफ्दर पसंद,सुवर्णरेखा,सुन्दरजा ,सुन्दरी,लंगडा और राजापुरी प्रमुख हैं। जब तब आने वाले आमों में मुलगोआ और नीलम प्रमुख हैं। इसके अलावा भी अलंपुर बानेशन,अल्फोंसो/बादाम गुंदूआप्पस/खडेर',बंगलोरा/तोटपुरी/कॉल्लेक़्टीओं/किली-मुक्कु,बाँगनपलल्य/बनेशन/छपतीदशहरी/दशहरी,अमन/निराली अमन,गुलाब ख़ास,ज़ार्दालू,आम्रपाली (आम)का अपना जलवा है रूमानि,समार्बेहिस्त/चोवसा/चौसा,वनरज मौसम की समाप्ति पर फजलीऔर सफेदा लखनऊ को भी खूब सम्मान मिलता है। 

    आम संस्कृति का अंग भी है मलिहाबाद के आम खाकर देखिये कभी, यहां नबाबों को आम खाना बहुत पसंद था। आम की पार्टियां होतीं थी,नुमाइशें लगती थीं, आम के बागीचे आदमी की हैसियत का पैमाना हुआ करते थे। मुझे लगता है कि आम पर पढ़ते हुए आपके मुंह में भी पानी आने लगा होगा। आम का तो नाम लेते ही सबके मुंह में पानी आ  ही जाता है। आम के विषय में स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह बात मानते हैं, कि आम मानव शरीर की अनेक प्रकार की कमजोरियों को दूर करता है व मानव के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी है। आम खाने से शरीर में नया खून पैदा होता है। आम में अनेक प्रकार के औषधीय गुण पाए जाते हैं। आयुर्वेद मे आम के पत्ते आम की गुठली आदि का भी प्रयोग रोगों के इलाज में किया जाता है।

    आम भले ही फलों का राजा हो लेकिन उसके साथ आम आदमी वो ही व्यवहार करता है जो व्यवहार सरकारें आम आदमी के साथ करती हैं। आम कच्चा हो तो चटनी तथा अचार और मुरब्बे के काम आता है। सुखाया जाता है सूखे आम को अमचूर कहते हैं। सूखे आम का पावडर तक बना दिया जाने लगा है। पकते ही उसे काटा जाता है ,चूसा जाता है ,पापड़ बनाये जाते हैं ,और तो और अब कैंडी बनाई जाने लगी हैं। इतने पर भी मन नहीं मानता तो आम की गुठलियों  तक को बेच दिया जाता है। वे भी दवा-दारू के काम आ ही जातीं हैं। आम की लकड़ी का इस्तेमाल तो फर्नीचर बनाने में होता ही है। यानि आम की कथा हरी कथा की तरह अनंत है। दुनिया में जहाँ आम राज नहीं है वहां राम राज है और जहाँ राम राज नहीं है वहां आम राज है। आम को राम से अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन राजा तो एक ही हो सकता है इसलिए द्वन्द जारी है आम और राम के बीच। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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