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    राकेश अचल का लेख। गिरने के बाद लुढ़कने का मौसम।

    राकेश अचल का लेख। रोज सियासत पर बात करना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता, इसीलिए आज बात लुढ़कने की करते हैं। इससे पहले हम गिरने की बात कर चुके हैं वो भी नरेश सक्सेना की कविता के साथ, लुढ़कना एक ऐसी क्रिया है जिसमें गिरने का ही आभास होता है लेकिन ये इतनी अप्रत्याशित क्रिया है कि इस पर किसी बड़े कवि ने कविता नहीं लिखी, कहानी भी शायद नहीं लिखी, लिखी भी होगी तो कम से कम हमारे सर्च इंजिन को तो इस बाबद कुछ भी पता नहीं है। 

    देश में जैसे गिरने का युग चल रहा है ठीक उसी के समानांतर लुढ़कने का दौर भी चल रहा है। जिसे देखिये लुढ़कता नजर आ रहा है। लुढ़कने में एक ही सुविधा है कि इसमें गिरने की तरह आपको चोट नहीं लगती, लुढ़कने की ज्यादा लोक निंदा भी नहीं होती, लुढ़कने को परिहास के रूप में लिया जाता है। लुढ़कना वैसे गिरने की सहोदर क्रिया  है किन्तु गिरना बुरा माना जाता है ,क्योंकि गिरने पर आप अटक भी सकते हैं। जैसे ' आसमान से गिरें और खजूर में अटक जाएँ ' लेकिन लुढ़कने में ऐसा कोई खतरा निहित नहीं है। 

    लुढ़कने की प्रवृत्ति सभी में पायी जाती है ,यानि लुढ़कने पर केवल मनुष्य मात्र का एकाधिकार नहीं है। क्यों नहीं हो पाया ऐसा अब तक, इस पर शोध किया जा सकता है। क्योंकि मनुष्य हर चीज पर ,अपना एकाधिकार चाहता है, यहां तक कि लकीर खींचने तक पर, चाहे लकीर पानी पर खींचना हो, मख्खन पर खींचना हो या पत्थर पर खींचना हो, बहरहाल बात बहकने की नहीं बल्कि लुढ़कने की हो रही है ,इसलिए हमें हर हाल में  लुढ़कने पर ही केंद्रित रहना चाहिए। 

    लुढ़कने में गिरने के मुकाबले ज्यादा सुखानुभूति होती है, गिरने में ग्लानि की अनुभूति होती है, यदि न भी हो तो लोग करा देते हैं ,लुढ़कने के साथ ऐसा नहीं है, अर्थात लुढ़कना राहत का संवाहक है। लेकिन ये इस बात पर निर्भर करता है कि लुढ़का कौन ? अब मान लीजिये कि हमारा शेयर बाजार अचानक लुढ़कने लगे तो लोगों को राहत के बजाय चिंता होने लगती है। आशंका होने लगती है कि कहीं बाजार लुढ़कते-लुढ़कते न सम्हला तो डुबकी लगा सकता है। आजकल शेयर बाजार सम्हल कम रहा है लुढ़क ज्यादा रहा है। शेयर बाजार के लुढ़कते ही लोगों  की तमाम जमा पूँजी एक झटके में गायब हो जाती है। 

    गिरना,लुढ़कना और सम्हलना एक ही बिरादरी के शब्द हैं। दुनिया इन्हीं तीन शब्दों के आसपास मंडराती रहती है। ये तीन क्रियाएं न हों तो न राजनीति में हलचल हो न अर्थव्यवस्था में, लुढ़कने की चरम अवस्था को उठापटक कहते हैं। लुढ़कना सेहत के लिए बहुत जरूरी है, अभी मैंने बाजार की बात की, बाजार के लिए लुढ़कना अशुभ माना जाता है ,किन्तु मौसम में तापमान का लुढ़कना सुखद माना जाता है, जब देश के तमाम हिस्से 49  और 50 डिग्री सेल्शियस पर तपने लगते हैं तब अचानक सीरी हवाएं चलने लगें और पारा लुढ़कता दिखाई दे तो जनता वाह ! वाह !! कर उठती है.. अभी हाल ही में पारा एक झटके में 12 डिग्री लुढ़क गया। हमारे मैदानी इलाकों में तो पारा लुढ़कने का सीधा असर बिजली के बिलों पर पड़ा है। एक दिन में एक घर में प्रति एयर कंडीशनर 180 रूपये की बचत हो गयी, भक्तगण बोले-' साहब हैं तो सब मुमकिन है'। 

    लोग जैसे पिछले दिनों पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दामों के लुढ़कने से खुश थे ,उससे कहीं ज्यादा पारे के लुढ़कने से खुश हैं। मौसम का पारा और सरकार का पारा यदि न ही चढ़े तो लोक और लोकतंत्र के लिए बेहतर माना जाता है। लोकतंत्र में गिरना और लुढ़कना आदिकाल से चला आ रहा है। अब यदि हमारे नेता लुढ़कें न तो मजा ही न आये। लुढ़कने के लिए गोल-मटोल होना जरूरी है, पेंदीदार आकृति की कोई चीज आसानी से नहीं लुढ़क सकती फिर चाहे वो नेता हो या पारा या शेयर बाजार, लुढ़कने के लिए ' बैगन' की तरह होना अनिवार्य है। बैंगन में पैंदी नहीं होती इसलिए बैंगन थाली में बड़ी आसानी से लुढ़कता है और इतनी कलात्मकता के साथ लुढ़कता है कि अंतत: मुहावरे में तब्दील हो जाता है। 

    लुढ़कने के मामले में जो सम्मान सब्जियों में बैंगन को हासिल है वो ही सम्मान राजनीति में हमारे कांग्रेसियों को हासिल है। कांग्रेसी बड़ी आसानी से लुढ़क कर कांग्रेस से भाजपा में पहुंच जाते हैं। वामी इस मामले में कमजोर हैं लेकिन समाजवादी तो लुढ़कने के मामले में बेशर्म समझे जाते हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कब, और किसके लिए लुढ़के .लुढ़कने के लिए केवल सही वक्त का चुनाव करना पड़ता है। हमारे देश की सियासत में राम विलास पासवान जैसा सफल लूढकू नेता आज तक नहीं हुआ। वे इतना लुढ़कते थे कि ये पता करना मुश्किल था कि वे आखिर किस सरकार के साथ हैं ?

    हमारे मध्यप्रदेश में एक बाबा थे जो लुढ़कन बाबा कहलाते थे, उनके अच्छे खासे हाथ-पैर थे किन्तु वे हठीले थे, देह से गठीले भी थे,जिद कर बैठे कि लुढ़कते हुए शिवपुरी से दिल्ली जायेंगे। तो उन्हें मनाना कठिन हो गया। साहब वे न सिर्फ लुढ़के बल्कि लुढ़कते हुए दिल्ली पहुंचे और उनके लुढ़कने को बड़ी ही लोक प्रतिष्ठा मिली। हालाँकि उन्हें अल्पकाल के लिए दुर्गति का भी सामना करना पड़ा। लुढ़कना दरअसल एक नैसर्गिक क्रिया है, ये किसी भी व्यक्ति में पायी जा सकती है। राजा हो या रंक ,कोई भी लुढ़क सकता है। संविधान  में अकेली यही क्रिया है जिसे असंवैधानिक नहीं माना गया। लुढ़कने से मिलती-जुलती क्रिया को सियासत में दल-बदल कहते हैं, दल-बदल के खिलाफ बाकायदा क़ानून है किन्तु आज तक किसी ने लुढ़कने के खिलाफ क़ानून की न जरूरत समझी और न ही क़ानून बनाने की मांग की। 

    बचपन की बात है मै अक्सर इम्तिहान में लुढ़क जाया करता था। बड़ी मुश्किल से पंद्रह साल में ग्यारह पायदान चढ़ पाया। लुढ़कने के फायदे ज्यादा और नुक्सान कम हैं किन्तु घर वाले अपने बच्चों को लुढ़कने ही नहीं देना चाहते, अपना पेट काटकर मंहगे से मंहगा ट्यूशन और कोचिंग करा देंगे लेकिन बच्चे को लुढ़कने नहीं देंगे। जबकि लुढ़कने का आनंद वर्णातीत है। आपने कभी अपने गांव में घर की अटरिया पर कबूतरों को लुढ़कते हुए देखा है ?लुढ़कने वाले कबूतरों को 'लोटन ' कबूतर कहते हैं। कबूतरों के लुढ़कने की अदा इतनी मादक होती है कि कवि हृदय तक कविता लिखने पर विवश हो जाते हैं। 

    लुढ़कने पर मै आज पूरा शोध प्रबंध आपके सामने परोस सकता हूँ किन्तु वक्त इजाजत नहीं दे रहा, इसलिए मेरी सलाह है कि जब भी मौक़ा मिले जीवन में एक बार लुढ़ककर अवश्य देखें ,लेकिन एहतियात बरतें कि लुढ़कें तो पारे की तरह,शेयर बाजार और नेताओं की तरह नहीं। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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