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    राकेश अचल का लेख। अब ज्ञानवापी मस्जिद के बहाने

    राकेश अचल का लेख। आप मानें या न मानें किन्तु मै सत्तारूढ़ भाजपा की चरणबद्ध रणनीति का लोहा मानता हूँ। देश के दूसरे राजनीतिक दल आज की तारीख में रणनीति का निर्धारण करने में भाजपा के पासंग भी नहीं हैं। भाजपा और उससे जुड़े लोग एक के बाद एक शिगूफा छोड़कर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के अपने आजमाए हुए फार्मूले का इस्तेमाल करते रहते हैं, इस रणनीति के चलते रसोई गैस की कीमतों में इजाफे का मुद्दा हो या कोविड काल में मौतों के आंकड़े छिपाने का मुद्दा हो ,सब भस्मीभूत हो जाते हैं। 

    भाजपा समर्थकों ने अब काशी की ज्ञानवापी मस्जिद के मुद्दे को गरमा दिया है। ये मुद्दा तब तक गर्म रहेगा जब तक की गुजरात और हिमाचल में विधानसभा के चुनाव नहीं हो जाते। मजे की बात ये है कि इस मुद्दे को गर्माते हुए आपको भाजपा कहीं नजर नहीं आएगी। ऐसे मामलों में भाजपा जरूरत पड़ने पर ही सामने आती है ,अब मुद्दा ये है कि अदालत के आदेश पर सर्वे टीम को ज्ञानवापी परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। सर्वे टीम का कहना है कि उन्हें मस्जिद परिसर में नहीं जाने दिया गया। हिंदू पक्ष का कहना है कि मस्जिद के अंदर कई लोग मौजूद थे, जिन्होंने बैरिकेडिंग कर सर्वे टीम को रोक दिया। 

    ज्ञानवापी मस्जिद विवाद कुछ-कुछ अयोध्या के राम मंदिर -बाबरी मस्जिद विवाद जैसा ही है। देश में ऐसे असंख्य प्रकरण हैं जहां हिन्दू कहते हैं की मुगल शासकों ने उनके पूजाघर तोड़कर मस्जिदें बना लीं थीं ,इसलिए उन्हें अब आजाद किया जाये। काशी विश्‍वनाथ मंदिर और उससे लगी ज्ञानवापी मस्जिद के बनने और दोबारा बनने को लेकर अलग-अलग तरह की धारणाएं और किम्वदंतियां चली आ रही हैं। हालांकि इनकी कोई प्रमाणिक पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है। बड़ी संख्‍या में लोग इस धारणा पर भरोसा करते हैं कि काशी विश्‍वनाथ मंदिर को औरंगजेब ने तुड़वा दिया था। इसकी जगह पर उसने यहां एक मस्जिद बनवाई थी। 

    इतिहाकारों का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण 14 वीं सदी में हुआ था और इसे जौनपुर के शर्की सुल्‍तानों ने बनवाया था। लेकिन इस पर भी विवाद है। कई इतिहासकार इसका खंडन करते हैं। उनके मुताबिक शर्की सुल्‍तानों द्वारा कराए गए निर्माण के कोई साक्ष्‍य नहीं मिलते हैं। न ही उनके समय में मंदिर के तोड़े जाने के साक्ष्‍य मिलते हैं। दूसरी तरफ काशी विश्‍वनाथ मंदिर के निर्माण का श्रेय राजा टोडरमल को दिया जाता है।

    कहा जाता है कि राजा टोडरमल ने ही 1585 में दक्षिण भारत के विद्वान नारायण भट्ट की मदद से कराया था। यानि जितने मुंह ,उतनी बातें। 

    ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण के बारे में एक कहानी ये भी है कि अकबर के जमाने में नए मजहब 'दीन-ए-इलाही' के तहत मंदिर और मस्जिद दोनों का निर्माण कराया गया था। ज्‍यादातर लोग यह मानते हैं कि औरंगजेब ने मंदिर के तुड़वा दिया था। लेकिन मस्जिद अकबर के जमाने में 'दीन ए इलाही' के तहत बनाई गई या औरंगजेब के जमाने में इसको लेकर जानकारों में मतभेद हैं। अंजुमन इंतज़ामिया मसाजिद के पदाधिकारी किसी प्राचीन कुएं और उसमें शिवलिंग होने की धारणा को भी नकारते हैं। उनका कहना है कि वहां ऐसा कुछ भी नहीं है। 

    भाजपा शासनकाल  में ही  2019 में राम  मंदिर विवाद का सुप्रीम  कोर्ट  द्वारा  निबटारा  किये   जाने  के बाद  

    इस मुद्दे को लेकर हिंदूवादी संगठन अयोध्‍या के रामजन्‍मभूमि आंदोलन के साथ ही आवाज उठाते रहे हैं। उनका दावा है कि स्वयंभू शिवलिंग के ऊपर मस्जिद का निर्माण हुआ है। उनकी मांग मस्जिद हटाकर वो हिस्‍सा मंदिर को सौंपे जाने की है। द्वादश ज्‍योतिर्लिंगों में प्रमुख श्री काशी विश्‍वनाथ मंदिर और उसी के पास स्थित ज्ञानवापी मस्जिद का कसे 1991 से वाराणसी की स्‍थानीय अदालत में चल रहा है। 1991 में स्वयंभू विश्वेश्वर की ओर से डॉ. रामरंग शर्मा, हरिहर पांडेय और सोमनाथ व्यास ने एफटीसी कोर्ट में याचिका दायर कर नया निर्माण व पूजा करने के अधिकार की मांग की थी। अंजुमन इंतजामिया मसाजिद को प्रतिवादी बनाया गया। अदालत ने लम्बी सुनवाई के बाद 1997 में वादी व प्रतिवादी दोनों के पक्ष में आंशिक निर्णय दिये थे। फैसले से असंतुष्ट प्रतिवादी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। 13 अगस्त 1998 को हाइकोर्ट ने फैसले पर रोक लगा दी।

    मामले  को गरमाये रखने  के लिए भाजपा समर्थक  विनय शंकर रस्तोगी ने 2019 में मूल वाद में अलग से प्रार्थना पत्र देकर पुरातत्व विभाग की ओर से सर्वेक्षण करने की अनुमति मांगी। इसके बाद सर्वेक्षण प्रकरण पर सुनवाई शुरू हो गई। एएसआई को विभिन्न प्रक्रियाओं के तहत सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया गया था। बाद में हाईकोर्ट ने एएसआई सर्वे पर रोक लगा दी थी। मुस्लिम पक्ष ज्ञानवापी परिसर के सर्वे का विरोध कर रहा है। उसका कहना है कि यदि कोर्ट कमिश्‍नर वहां घुसते हैं उनके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा। मुस्लिम पक्ष इस पर अड़ा है कि अदालत का आदेश मस्जिद के अंदर प्रवेश करने का नहीं है इसलिए उसमें प्रवेश की इजाजत नहीं दी जाएगी

    बहरहाल अब जो  होगा  सो  होकर  रहेगा,क्योंकि बहुसंख्यक समाज ऐसा चाहता है.,मामला अदालत में है इसलिए सरकार  खामोश  है। विपक्ष यहां है नहीं। विपक्ष मस्जिद से जुड़े लोग हैं ,जिन्हें  पता है कि उन्हें अब राम मंदिर की ही तरह यहां  भी हारना ही होगा ,क्योंकि सब मिलकर  उन्हें हराना चाहते  हैं  सवाल ये है कि ऐसे मुद्दों  को समय -समय  पर निकालकर क्यों  गरमाया जाता है ? क्या देश में और कोई  दूसरा  मुद्दा बचा  ही नहीं है ? क्या देश में सचमुच रामराज कायम हो चुका है? आखिर कब तक हम एक के बाद एक गड़े हुए मुर्दे उखाड़कर अपना  राजनीतिक उल्लू  सीधा  करते रहेंगे ?

    देश में ज्ञानवापी मदिर-मस्जिद जैसे अनेक विवादित  पूजा  स्थल  हैं। मान  भी लिया जाये कि सदियों पहले  तत्कालीन शासकों ने उन्हें तोड़फोड़कर नया स्वरूप दे दिया था ,तो आज उन्हें फिर से पुरानी स्थिति में पहुंचने  की क्या जरूरत पड़ी है। इतिहास लिखने  की चीज  है,करेक्शन  करने की नहीं, आप नए  पूजाघर बनाइये ,कौन  रोकता  है ? आप नयी  संसद बना ही रहे  हैं न,आपने  दुनिया  की सबसे  बड़ी  मोरठ i बना ली  कोई आपका  हाथ  पकड़ने  आया  ? लेकिन  आप नहीं मानेंगे  क्योंकि आपकी  फितरत  में तो कुछ और ही भरा  है। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA) 

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