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    राकेश अचल का लेख। आईपीसी के बजाय मनु स्मृति के प्रति आस्था।

    राकेश अचल का लेख। आप हैरान भी हो सकते हैं और गर्वोन्नत भी ,क्योंकि हमारे देश में राजनीति ही नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था भी अब कानूनों के बजाय स्मृतियों का सहारा लेने लगी है। गुजरात की एक अदालत ने हत्या के एक मामले में आरोपी को मृत्युदंड की सजा सुनाते हुए आईपीसी के साथ ही मनु स्मृति का भी सहारा लिया। मामला गुजरात के सूरत में हुए बहुचर्चित ग्रीष्म वेकारिया  हत्याकांड का है। सूरत के कामरेज थाना क्षेत्र अंतर्गत पासोदरा इलाके की लक्ष्मीधाम सोसायटी में 12 फरवरी 2022 की शाम ग्रीष्मा वेकरिया नाम के छात्रा की उसके सहपाठी फेनिल गोयाणी ने एकतरफा प्रेम में चाकू से सरेआम गला रेतकर हत्या कर दी थी। फेनिल गोयाणी ने ग्रीष्मा वेकरिया का गला रेतने से पहले उसके भाई ध्रुव वेकरिया और उसके चाचा सुभाष वेकरिया पर भी हमला कर घायल कर दिया था। 

    नृशंस हत्या के इस मामले में फांसी की सजा के अलावा कोई और सजा हो ही नहीं सकती थी ,लेकिन इस सजा को सुनाने से पहले अदालत द्वारा मनु स्मृति के श्लोक का जिक्र करना विचारणीय है। अदालत ने मनु स्मृति का जो श्लोक पढ़ा वो निम्नानुसार है -

    ' यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा ।

    प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥

    यत्र श्यामः लोहिताक्षः दण्डः चरति पापहा ।

    प्रजाः तत्र नमुह्यन्ति नेता चेत् साधु पश्यति ।।

    भावार्थः- जहां श्याम वर्ण एवं लाल नेत्रों वाला और पापों (पापियों) का नाश करने वाला ‘दण्ड’ विचरण करता है और जहां शासन का निर्वाह करने वाला उचित अनुचित का विचार कर दण्ड देता है, वहां प्रजा उद्विग्न या व्याकुल नहीं होती। 

    मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हजार पाँच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का उल्लेख है। भारत के अलावा बर्मा, थाइलैण्ड, कम्बोडिया, जावा-बाली आदि में इसका बड़ा आदर-सम्मान था। मनु स्मृति तत्कालीन समय की एक आदर्श दंड संहिता ही नहीं बल्कि आचार संहिता भी कही जाती है। हम इसके गुण - दोषों के बारे में विमर्श करने नहीं जा रहे हैं, हमारी जिज्ञासा ये है कि क्या आधुनिक काल में भी हमें अपनी मौजूदा दंड संहिताओं का इस्तेमाल करने के लिए कालातीत हो चुकी संहिताओं का हवाला देना होगा ?यही काम हमारी राजनीति कर रही है और इससे समाज में विसंगतियां बढ़ रहीं है। 

    फांसी की सजा सुनाने से पहले जज विमल व्यास ने मनुस्मृति के श्लोक का पढ़ा और उसका अर्थ समझाया। जज ने कहा कि-' सजा देना आसान नहीं है, लेकिन यह रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस है', हैरानी की बात यह है कि कोर्ट में सजा से पहले अदालत में मौजूद फेनिल के चेहरे पर किसी भी तरह का डर या अफसोस नहीं था। अदालत के फैसले से मृतिका के परिजन संतुष्ट हैं, पूरा गुजरात संतुष्ट है, हम भी संतुष्ट हैं ,हमारा मुद्दा संतोष या असंतोष   नहीं बल्कि मनु स्मृति है। मनु स्मृति एक तरह से प्रगतिशील भी है और रूढ़िवादी भी। मनुस्मृति की अब तक अनेक टीकाएँ भी हुईं हैं इससे जाहिर है की मनु स्मृति विवादों से परे नहीं है। मनुस्मृति ही है जिसने सबसे पहले जातिवाद के खिलाफ अपना मत व्यक्त किया-'जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते।'बावजूद क्या इसके हम अपने मौजूदा कानूनों के तहत फैसला करते समय मनु स्मृति या उस जैसे किसी पुराने ग्रंथों का हवाला देकर अपने निर्णयों को वजनदार बना सकते हैं ?

    मनु स्मृति कोलेकर आधुनिक काल में भारत के विचारक भी आपस में उलझते रहे। महात्मा गाँधी ने जहाँ मनु स्मृति का स्मार्थन किया वहीं डॉ भीमराव अम्बेडकर ने मनु स्मृति की होली जलाई। मनुस्मृति मूल्यांकन और आलोचना के अधीन है। डॉ बी आर अम्बेडकर भारत में जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को जिम्मेदार मानते थे  विरोध में, अम्बेडकर ने 25 दिसंबर, 1927 को मनुस्मृति की होली जलाई। महात्मा गांधी ने पुस्तक को जलाने का विरोध किया। गांधी ने तर्क दिया कि मनु स्मृति किसी के अधिकारों को नहीं बल्कि किसी के कर्तव्यों को परिभाषित करता है, इसमें शिक्षक से लेकर चौकीदार तक सभी के लिए समान रूप से आवश्यक है, और समान दर्जा। गांधी ने मनुस्मृति को उदात्त शिक्षाओं को  माना उसके असंगति और अंतर्विरोध वाले पाठों को ख़ारिज भी किया , गाँधी जी कहते रहे की मनु स्मृति के उन हिस्सों को स्वीकार करना चाहिए जो "सत्य और अहिंसा की बात करते हैं। 

    आज जिस दौर में हम हैं उसमें मनमानी संहिताएं बनाई जा रहीं हैं। अंतर्जातीय विवाहों के लिए अलग और दंगा,बलात्कार जैसे अपराधों के लिए अलग। अब संहिताएं तेजी से 'बुलडोजर संहिता 'में बदल रहीं हैं। मुसलमान किसी हिन्दू लड़की से शादी करे तो 'लव जिहाद ' का मामला कहकर उसके लिए अलग कानून है लेकिन यदि कोई हिन्दू लड़का किसी मुसलमान लड़की से शादी की वजह से मार दिया जाये तो उसके लिए कोई क़ानून नहीं है।  हैदराबाद में बीती शाम अपनी पत्नी के साथ बाइक पर घर जा रहे एक युवक को लोहे की रॉड से पीट-पीट कर मार डाला। पुलिस का कहना है कि 25 वर्षीय कार विक्रेता को उसकी मुस्लिम पत्नी के भाई और रिश्तेदारों ने पीट-पीटकर मार डाला। बी नागराजू और सैयद अश्रीन सुल्ताना ने तीन महीने पहले अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी कर ली थी। यानि लव जिहाद की भी अलग-अलग परिभाषा हो गयी है। 

    आज जब जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से हटाने के लिए नए-नए विवाद खड़े किये जा रहे हैं ऐसे में मनु स्मृति का जिक्र करना समीचीन भी है और जरूरी भी, क्योंकि सियासत देश को जिस दिशा में ले जा रही है ,वो खतरनाक है।सियासत ऐसा राम राज लाना चाहती है जिसमें सब कुछ नेताओं के 'मन की स्मृति ' से संचालित हो मनु स्मृति अपनी जगह है और भारतीय दंड संहिताएं अपनी जगह। उन्हें किसी हवाले की जरूरत नहीं है। यदि है तो उन्हें ख़ारिज कर नए सिरे से लिखा जाना चाहिए। आज का समाज हजारों साल पहले की संहिताओं से आखिर कैसे संचालित हो सकता है ? अदालतों को  इस मामले में ज्यादा सतर्कता बरतना चाहिए। 

    पिछले दिनों देश में लोगों के खानपान,पूजा पद्यतियों को लेकर तमाम विवाद खड़े किये गए। अभी भी पूजा घरों पर ध्वनि विस्तारक यंत्रों के इस्तेमाल को लेकर अनेक राज्यों में सियासत चल रही है। सरकार क़ानून का इस्तेमाल न करते हुए मूक दर्शक बनी है। ये देश एक तरफ प्रगतिशील होना चाहता है और दूसरी तरफ यहां केवल हनुमान चालीसा पढ़ने की धमकी को राजद्रोह मान लिया जाता है, विचार करना चाहिए कि आखिर हमारी मंजिल है कहाँ ? 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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