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    राकेश अचल का लेख। अदालत ,अफसर और सरकार।

    राकेश अचल का लेख। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान महिला उत्पीड़न के प्रति जितने अधिक संवेदनशील और आक्रामक हैं ,उनके अफसर उतने ही लापरवाह और महिला उत्पीड़न में भागीदार हैं। स्थिति ये आ गयी है कि अब प्रदेश के उच्च न्यायालय तक को ऐसे लापरवाह अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश देना पड़ रहे हैं। जबलपुर  सर्किल के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक उमेश जोगा के खिलाफ की गयी अदालत की टिप्पणी और निर्देश सरकार और पुलिस मुख्यालय दोनों के मुंह पर तमाचा है। 

    दुर्भाग्य की बात ये है कि कार्रवाई के मामले में मुख्यमंत्री जी का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा है। ये आरोप नहीं है बल्कि वास्तविकता है। आप पिछले दिनों की कुछ घटनाओं को आपस में जोड़कर यदि समीक्षा करेंगे तो आपके सामने पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी। सबसे पहले रीवा की ही बात करते हैं। यहां पिछले महीने एक ढोंगी बाबा ने एक नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया लेकिन पुलिस ने 18  घंटे तक बाबा के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया। 

    बलात्कार के आरोपी बाबा के यहां आशीर्वाद बटोरने वाले उस पुलिस अधीक्षक के खिलाफ दिखावे की भी कार्रवाई नहीं की जो बाबा को लगातार बचने की कोशिश करता रहा। आरोप थे कि पुलिस अधीक्षक को बाबा की हरकतों के बारे में पहले से पता था और बाबा को हड़काने वाले टीआई को एसपी ने कार्रवाई करने से न सिर्फ रोका बल्कि बाबा से क्षमा मांगने के लिए दबाब डाला। लेकिन चूंकि मामला भापुसे के एक अधिकारी का था इसलिए सारे मामले पर धुल दाल दी गयी। ये वे ही अधिकारी थे जिन्हें ग्वालियर से स्थानीय नेतृत्व की नाराजगी कि वजह से हटाया गया था। रीवा के बाद खरगोन के दंगों पर गौर कीजिये। खरगोन में दंगों के लिए कथित रूप से दोषी लोगों के मकान जमींदोज कर दिए गए लेकिन कलेक्टर और एसपी को बख्श दिया गया। आखिर क्यों नहीं उनके खिलाफ जांच स्थापित की गयी.? क्या इन दोनों अफसरों की कोई लापरवाही नहीं थी इन दंगों के पीछे ? लेकिन जब अफसरों को बचाने का संकल्प ही हो तो कोई क्या कर सकता है ? 

    खरगोन से पहले सीधी में रंगकर्मियों और प्रेस कर्मियों को अर्धनग्न करने के मामले में टीआई के खिलाफ सांकेतिक कार्रवाई करने वाली सरकार ने किसी बड़े अधिकारी को इस अमानवीय घटना के लिए जिम्मेदार नहीं माना। सरकार की नजर में कोई बड़ा अफसर कोई गलती करता ही नहीं है और अगर करता है तो उसे बचाना सरकार का परम् कर्तव्य होता है। 

    अफसरों के प्रति ढुलमुल रवैये की वजह से ही ये नौबत आयी है कि अब हाईकोर्ट को एक वरिष्ठ पुलिस अफसर को रेंज से हटाने के लिए निर्देश देना पड़े हैं। मामला छिंदवाड़ा में बलात्कार के एक आरोपी पुलिस आरक्षक की के डीएनए सेम्पल बदल देने का है। ये सही है कि सेम्पल एडीजी  ने नहीं बदला लेकिन ये भी सच है कि सेम्पल बदला और अदालत में झूठी रिपोर्ट पेश की गयी जो एडीजी की और से पेश की गयी। एडीजी इतने मशगूल है लोककल्याण के कामों में कि देख ही नहीं पाए कि वे किस कागज पर दस्तखत कर रहे हैं ? जो लापरवाही अदलात को प्रथम दृष्टया दिखाई दे गयी उसे एडीजी  साहब देख ही नहीं पाए .फिर ऐसे एडीजी  की क्या जरूरत ? 

    मामले की तह में जाएँ तो पता चलता है कि सेम्पल बदलने के मामले में एक आरोपी पुलिस कर्मी भी ही और उसे बचाने की कोशिश में एडीजी ने डाक्टर कि और से बनाई गयी झूठी रपट पर दस्खत कर अदालत को गुमराह करने कि कोशिश की .पुलिस का दुस्साहस किसी भी सीमा तक जा सकता है। अब एडीजीपी को हटाना सरकार कि मजबूरी है ,लेकिन सवाल ये है कि उन्हें हटाने भर से क्या स्थितियों में सुधार आ जाएगा  ?शायद नहीं क्योंकि अब जिलों के अलावा मैदान में काम करने वाले पुलिस और प्रशासन के अधिकारी भाजपा कार्यकर्ताओं की तरह काम करने लगे हैं। प्रशासन का राजनीति के रंग  में रंगना  लोकतंत्र के लिए घातक है। घातक इसलिए है क्योंकि सरकार को नींद से जगाने वाली तमाम संस्थाएं पहले से राजनीतिक रंग में रंगी हुई हैं। यहां तक कि मीडिया का रंग भी अब राजनीतिक हो गया है। मीडिया नेताओं की बगलगीर होकर काम कर रही है। नेता मीडिया कर्मियों के जन्मदिन अपने घरों पर मनाने का ढोंग करने लगे हैं। लेकिन मीडिया भूल जाती है कि उसे अर्धनग्न करने पर मौन रहने वाली सरकार ही है। 

    नौकरशाही के बेलगाम होने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। पुलिस तो वर्दी वाली होती है लेकिन भाप्रसे के ऑफर भी किसी को नहीं गिनते। राजधानी भोपाल के आयुक्त ने बिना अधिकार पंचायतों के परिसीमन की अधिसूचना जारी कर दी। ये तो गनीमत है कि मामला अदालत के संज्ञान में आ गया सो जबाब तलब कर लिया गया अन्यथा परिसीमन तो हो ही गया था। बहरहाल मुद्दा ये है कि सरकार दोषी अधिकारियों को लगातार बचा रही है, इसे रोका जाना चाहिए। अदलात इस मामले में दखल दे या निर्देश जारी करे ये प्रदेश सरकार के लिए अशोभनीय लगता है। दतिया में पूरा पुलिस और प्रशासन स्थानीय मंत्री के निर्देश पर पीतांबर धारण करने को विवश दिखाई दिया। नाम दतिया गौरव समारोह था लेकिन निकाली गयी माँ पीतांबरा कि रथ यात्रा। अपनी स्थापना से लेकर अब तक मान अपने भवन से कभी बाहर नहीं निकली थीं। 

    पिछले कुछ वर्षों में ये परम्परा बन गयी है कि सरकार अपने राजनितिक मकसद के लिए नौकरशाही का खुलकर इस्तेमाल करती है। सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्वास का लालच देकर अफसरों से कुछ भी ऊंच-नीच कराई जा सकती है। अब तो नौकरशाहों की उम्मीदें कुछ ज्यादा ही बढ़ गयीं हैं ,वे सेवानिवृत्ति के बाद सीधे राजनीति में आने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। पिछले महीनों में आपने पुलिस के एक आला अफसर को भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के नेतृत्व में निकाली गयी एक रैली के लिए चाय-पानी की व्यवस्था करते हुए बुंदेलखंड में देखा था। इस सेवा के बाद ही उस अफसर को मनचाही पोस्टिंग भी हासिल हो गयी थी। 

    नौकरशाही की अराजकता के एक नहीं अनेक किस्से हैं। प्रदेश का परिवहन विभाग तो आजकल सुर्ख़ियों में है। सरकार की बदनामी हो रही है लेकिन कहीं कोई फर्क नहीं पड़ रहा.लगता है अब सरकार ' शॉकप्रूफ ' हो चुकी है। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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