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    राकेश अचल का लेख। ' नबाबों ' के शहर में ' महाराज ' सिंधिया फिर लोकपथ से राजपथ की ओर

    राकेश अचल का लेख। मेरे लिए यकीन करना आसान नहीं है लेकिन अब जब प्रदेश की राजधानी भोपाल (जो कभी नबाबों की रियासत रही है) में ग्वालियर की पूर्व रियासत के प्रतिनिधि  और भाजपा के ' महाराज ' ज्योतिरादतीय सिंधिया ने श्यामला हिल्स पर बने सरकारी बंगले को राज प्रासाद में बदलकर स्वीकार कर लिया है तो मानना पड़ रहा है की पहली बार सिंधिया परिवार में कोई व्यक्ति राज्य की राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से प्रवेश कर रहा है। 

    सिंधिया का गृहप्रवेश साधारण गृह प्रवेश नहीं है। इसके अनेक अर्थ हैं और सियासत में सक्रिय लोग इससे या तो वाकिफ हैं या फिर इस मामले में बोलकर फिलहाल कोई पंगा नहीं लेना चाहते। सिंधिया परिवार आजादी के बाद से ही राजनीति में सक्रिय है। पहले राजमाता विजयाराजे सिंधिया,फिर उनके सुपुत्र माधवराव सिंधिया और फिर बेटियां बसुंधरा राजे और यशोधरा राजे सिंधिया राजनीति में आये। बसुंधरा राजे  ने राजस्थान को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, वे केंद्रीय मंत्री के साथ ही राजस्थान की मुख्यमंत्री भी रहीं लेकिन मध्यप्रदेश में सिंधिया परिवार के किसी सदस्य ने प्रदेश की बागडोर नहीं सम्हाली। हालाँकि यशोध्रा राजे सिंधिया राजमाता की राजनीतिक विरासत की दावेदार बनकर मैदान  में आयीं लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। 

    मुझे याद है कि एक जमाने में कोहेफिजा में तालाब के ठीक सामने राजमाता विजयाराजे साहब का बँगला हुआ करता था लेकिन वे उसमें बहुत कम रूकती थीं। बंगले में अक्सर राजमाता के भाई-भाभी और दूसरे परिजन ही रहा करते थे माधवराव सिंधिया ने अपने तीन दशक लम्बे राजनितिक कैरियर में कभी भोपाल को अपनी राजनीति का केंद्र नहीं बनाया। वे जब भी भोपाल आए किसी न किसी निजी होटल में रुके। सिंधिया की बहन यशोधरा राजे के पास 45  बंगले में मंत्री की हैसियत से बँगला था, जिसे उन्होंने तब भी नहीं छोड़ा जब वे विधायक नहीं थीं। 

    मध्यप्रदेश की राजनीति में ये पहला मौक़ा है जब निर्वाचित जन प्रतिनिधि न होकर भी प्रदेश में भाजपा की सरकार बनवाने वाले कांग्रेस के दिग्गज रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भोपाल में न केवल सरकारी बँगला लेना स्वीकार किया बल्कि उसे राजप्रासाद का 'लुक' भी दिलाया। ये स्वाभाविक है, सिंधिया परिवार के लोग छोटे दरवाजे वाले भवनों में कभी नहीं रहे। ज्योतिरादित्य सिंधिया का मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव से 17  माह पहले डेरा डालना इस बात का संकेत देता है कि वे अब राज्य की राजनीति की जरूरत बन गए हैं। 

    मध्यप्रदेश में डेढ़ दशक तक अखंड राज करने वाली भाजपा की जड़ें ज्योतिरादित्य सिंधिया के अंधाधुंध और आक्रामक प्रचार के कारण ही 2018  में उखड़ी थीं ,और उन्हीं की वजह से 18  माह बाद 2020  में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार का पतन हुआ और भाजपा दुबारा सत्ता में आयी। इस बारे में सारी कहानी पाठकों को पता ही है, लेकिन नयी बात ये है कि सिंधिया अब भोपाल के निवासी बन गए हैं। वे उसी श्यामला हिल्स पर रहने पहुंचे हैं जहाँ से मुख्यमंत्री निवास बहुत कम दूरी पर है। 

    मेरा अनुभव कहता है कि सिंधिया अब इस धारणा को तोड़ने जा रहे हैं कि उनके परिवार का कोई सदस्य प्रदेश का नेतृत्व करने से कतराता रहा है। जो संकेत  मिल रहे हैं उससे जाहिर है कि जिस तरह 2018  का विधानसभा चुनाव ' महाराज बनाम शिवराज ' था ठीक उसी तरह 2023 का विधानसभा चुनाव भी ' महाराज बनाम कमलनाथ '  होगा ,यानि शिवराज के बजाय कमलनाथ सिंधिया के सामने होंगे और शिवराज पार्श्व में, मध्यप्रदेश का चुनाव भाजपा उत्तर प्रदेश के चुनाव की तरह न शायद न लड़े ,मुमकिन है कि इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी प्रतिष्ठा दांव पर न लगाएं ,क्योंकि उनके पास मध्यप्रदेश में एक चुंबकीय नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया मौजूद है। 

    सब जानते हैं कि सिंधिया ने अपने परिवार की राजनीतिक गाथा में नए अध्याय जोड़े हैं। पहला पराजय का अध्याय   है ,दूसरा अपनी दादी की भांति बगावत का अध्याय है,तीसरा जिस कलंक को उनका परिवार डेढ़ सौ से ज्यादा साल से ढो रहा था उसे धोने का अध्याय है.वे सिंधिया परिवार के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका झांसी की रानी की समाधि पर जाकर सिर नवाया और अब मुमकिन है कि सिंधिया प्रदेश के मुख्यमंत्री बनकर एक नया अध्याय और इस राजनीतिक गाथा में जोड़ दें। सिंधिया के भोपाल स्थित शासकीय आवास का कायाकल्प किसी साधारण बंगले की तरह न होकर एक राज प्रासाद  की तरह हुआ है। उसका दरवाजा राजभवन के दरवाजे की तरह ऊंचा है। दरवाजे पर प्रकाश बिंदुओं के नीचे सरि-सर्प भी लटके हैं जो सिंधिया के राजचिन्ह का प्रतिनिधित्व करते हैं। लोगों को इन संकेतों को समझना चाहिए .जो नहीं समझना चाहते वे या तो चतुर हैं या अनाड़ी सिंधिया भोपाल में नबाबों की तरह नहीं बल्कि महाराज की तरह रहकर अपनी उपस्थिति रेखांकित करना चाहते हैं ,और ये जरूरी भी है। सिंधिया के आजू-बाजू में प्रदेश के और पूर्व मुख्यमंत्री भी रहते  हैं लेकिन किसी के बंगले का दरवाजा सिंधिया के दरवाजे की तरह नहीं है। हो भी नहीं सकता, होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि प्रदेश की राजनीति में महाराज तो वे अकेले हैं.बाक़ी  तो राजा  और जागीरदार  या किसान  हैं। 

    हम जैसे लोगों की मुश्किल ये है कि ज्यादा सच लिख दें तो हमें सिंधिया का भक्त बताया जा सकता है और ज्यादा सख्त लिख दें तो विरोधी ,जबकि हम दोनों प्रजातियों में नहीं हैं। हमारे पास अपना खुद का चश्मा  है उससे हम जो देख पाते हैं अपने उन मित्रों को दिखाते हैं जो अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं के साथ काम करते हैं .सिंधिया को समझने के लिए उनका समर्थक या विरोधी होना आवश्यक नहीं है। उनके कामकाज और अतीत का विश्लेषण कर आप सहज ही संभावित नतीजों पर पहुँच सकते हैं। मुमकिन है कि मेरी तरह आपका आकलन भी सौ फीसदी सही न हो लेकिन वो सौ फीसदी गलत भी नहीं हो सकता। 

    आप देखेंगे कि सिंधिया की मौजूदगी से प्रदेश की सत्तापक्ष के साथ विपक्ष की राजनीति में भी अप्रत्याशित तब्दीलियां आने वाले दिनों में दिखाई देंगीं। विपक्ष के सिर पर उनका सबसे बड़ा शिकार सीना तान कर खड़ा हो चुका है। सत्ता पक्ष के लिए सिंधिया अब एक जरूरत  बन चुके हैं क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराज का उत्तराधिकार पाने की लड़ाई प्रदेश में भाजपा का भट्टा बैठाने के लिए काफी है ,लेकिन सिंधिया सबके लिए सहज स्वीकार्य नेता हैं। उनके पराक्रम को भाजपा में चुनौती देने वाला मुझे कोई नजर नहीं आता। कांग्रेस की त्रिमूर्ती  [दिग्विजय,कमलनाथ और डॉ गोविंद सिंह ] सिंधिया का मुकाबला कैसे करेंगे ,अभी से कहना ठीक नहीं है। चलिए तेल  देखते  हैं और तेल  की धार  देखते  हैं। किन्तु याद रखिये की सिंधिया परिवार में ' राजपथ से लोकपथ ' और ' लोकपथ से राजपथ ' की यात्रा की एक सनातन परम्परा है। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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