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    राकेश अचल का लेख: नफरत की राजनीति के खिलाफ पहल

    राकेश अचल का लेख: जाहिर तौर पर भारतीय राजनीति में इस समय ' नफरत ' चरम पर है और इससे हर कोई पीड़ित है आम आदमी से लेकर प्रधानमंत्री तक प्रधानमंत्री तो नफरत की राजनीति की वजह से दिन बाहर लोक आलोचना के शिकार होते हैं देश के एक सैकड़ा पूर्व नौकरशाहों के एक समूह ने इस बाबद प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर देश से ' नफरत की राजनीति ' समाप्त करने में सहयोग करने की अपील की है। मै पूर्व नौकरशाहों की इस पहल का स्वागत करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि उनकी अपील पर प्रधानमंत्री जी ध्यान देंगे। 

    पूर्व नौकरशाहों ने जहां ' हेट पॉलिटिक्स ' पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की चुप्पी पर सवाल उठाया है वहीं उन्हें उनकी तरफ से दिया गया 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास' वाला मंत्र भी याद दिलाया। एक खुले पत्र में  कहा है कि हम देश में नफरत से भरा विनाश का उन्माद देख रहे हैं जहां बलि की वेदी पर न केवल मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्य हैं बल्कि स्वयं संविधान भी है।

    जिस मुद्दे को लेकर मै बीते सात साल से लिखता आ रहा हूँ उसी मुद्दे पर लिखे गए खत पर 108 पूर्व नौकरशाहों के हस्ताक्षर हैं जिसमें दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, देश के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन, पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह, पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लै और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रधान सचिव टीकेएस नायर जैसे नाम शामिल हैं।

    हमारे जैसे अनेक नामालूम लेखकों की बात शायद प्रधानमंत्री तक न पहुंचती हो लेकिन जिन सौ लोगों ने प्रधानमंत्री जी को खत लिखा है उनकी बात प्रधानमंत्री जी को जरूर सुनना और समझना चाहिए। खत में कहा गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय, खासतौर पर मुस्लिमों के खिलाफ पिछले कुछ सालों और महीनों में हिंसा बढ़ी है। यह हिंसा असम, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और उत्तराखंड समेत उन सभी राज्यों में जहां भाजपा पॉवर में है एक नया भयावह रूप ले चुकी है। इनमें दिल्ली ऐसा राज्य है, जहां पुलिस का कंट्रोल केंद्र सरकार के पास है। पूर्व नौकरशाहों ने लिखा है कि हमारा मानना है कि यह खतरा अभूतपूर्व है और न केवल संवैधानिक नैतिकता व आचार खतरे में हैं, बल्कि इससे हमारी सामाजिक ताने-बाने के भी नष्ट होने की संभावना है, जिसे संरक्षित रखने के लिए हमारे संविधान को इतनी सावधानी से तैयार किया गया है।

    इन सभी ने कहा है कि पूर्व सिविल सर्वेंट होने के नाते यह सामान्य नहीं है कि हमें अपनी भावनाओं को इस तरह पेश करना पड़ रहा है, लेकिन जिस तेज गति से हमारे संस्थापकों की बनाई संवैधानिक संरचना को नष्ट किया जा रहा है, वह हमें बोलने और अपना गुस्सा व पीड़ा जाहिर करने के लिए मजबूर कर रही है।

    ये मानने में किसी को कोई ऐतराज नहीं हो सकता की भारत देश की नींव में ही ' नफरत ' के बीज डाल दिए गए थे ,लेकिन हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता चुनकर नफरत के इन बीजों को पनपने नहीं दिया। हमारे साथ ही आजाद हुआ नफरत और जाति के आधार पर बना पाकिस्तान पिछले 75 साल में नफरत की राजनीति से टूटकर दो टुकड़े हो गया लेकिन हम बचे रहे। हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस मन्त्र का जाप रात-दिन करते हैं उसे 'सबका विकास और सबका साथ' कहा जाता है लेकिन इस मन्त्र पर असल काम देश की आजादी के बाद के छह दशकों में सही मायनों में ही किया गया। इस मन्त्र को सिद्ध करने में पहले के प्रधानमंत्री कामयाब भी हुए लेकिन आज ये मन्त्र केवल नारा बनकर रह गया है। प्रधानमंत्री जी आज खुद ' नफरत की राजनीति ' के प्रणेता बने हुए हैं। उनका मौन लगातार ' नफरत की राजनीति' को बढ़ावा दे रहा है। 

    देश की राजनीति में नफरत कि संकर प्रजाति के बीज बोये ही 2014 के आम चुनावों में थे। नफरत की फसल लहलहाई और आज ये जान की दुश्मन बन गयी है। खत में प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी को लेकर भी सवाल उठाया गया है। लिखा है कि इस विशाल सामाजिक खतरे के सामने आपकी चुप्पी इसे दबाने वाली है। हम आपकी अंतरात्मा से अपने वादे 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' को दिल से लागू करने की अपील करते हैं। हमें आशा है कि इस 'आजादी के अमृत महोत्सव' में पक्षपात वाले विचारों से ऊपर उठकर आप उस हेट पॉलिटिक्स के अंत की अपील करेंगे, जिस पर आपकी पार्टी के कंट्रोल वाले राज्यों की सरकारें पूरी लगन से चल रही हैं।

    प्रधानमंत्री को खत लिखने वाले हो सकते हैं कि किसी टुकड़ा-टुकड़ा गैंग से जुड़े निकलें लेकिन उन सबका इस देश के निर्माण और संचालन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, इसलिए प्रधानमंत्री को सचमुच अपना मौन तोड़ना चाहिए। पूर्व नौकरशाहों की बात समझना चाहिए। देश में नफरत की राजनीति अब ऐसे मोड़ पर पहुँच गयी हैं जहाँ केवल और केवल सामाजिक ताना-बाना टूटने के अलावा कुछ नहीं होने वाला। लेकिन नफरत की राजनीति करने वाले लोगों को समझ लेना चाहिए कि भारत कोई पिछले सात साल में नहीं बना है, इसे आसानी से नुक्सान नहीं पहुंचाया जा सकता, सामाजिक समरसता को नहीं तोडा जा सकता। 

    मेरा निजी अनुभव है कि आज नफरत की राजनीति देश में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दुर्भाग्यपूर्ण दंगों से भी कहीं ज्यादा भयावह है। जिस तरह 1984  में एक पूरी कौम को हत्यारा बताकर मारकाट की गयी थी आज उसी तर्ज पर एक ख़ास कौम को आतंकवादी ,देशद्रोही बताकर नफरत का जहर घोलने की कवायद को अचानक तेज कर दिया गया है, स्थितियां ये हो गयीं है कि अब दाढ़ियां और टोपियां जान की दुश्मन बनती जा रहीं हैं। ये सब ख़ास तौर पर उन राज्यों में हो रहा है जहां भाजपा या उसके सहयोगी राजनीतिक दलों की सरकारें हैं। 

    सरकारों का काम नफरत की राजनीति करना या उसे प्रोत्साहित करना नहीं होता। कांग्रेस ने भी अतीत में तुष्टिकरण का राजनितिक अपराध किया लेकिन नफरत न फैलाई और न फैलने दी। नेहरू से लेकर मोदी के पहले तक के किसी प्रधानमंत्री ने नफरतकी राजनीति पर ऐसा मौनवृत नहीं साधा जैसा कि मोदी ने साधा है। ये मौन देश के पूर्व नौकरशाहों की अपील से टूटेगा इस पर मुझे संदेह है। संदेह इसलिए है क्योंकि सरकार असहमति का कोई स्वर सुनना ही नहीं चाहती। असहमति की बात शुरू होते हैं भगवन की भृकुटियां तन जाती हैं, मुख मुद्रा विकृत हो जाती है, आँखों में लाल डोरे तैरने लगते हैं। 

    सत्ता पर काबिज बने रहने के लिए देश को नफरत की आग में नहीं झौंका  जा सकता, सही अर्थों में ये ही राष्ट्रद्रोह है ,लेकिन हनुमान चालीसा पढ़ने का ऐलान करने को राष्ट्रद्रोह मानने वाली सरकार अपने अपराध को क्यों देखने चली ? अभी भी वक्त हैं ,आँखें खोलिये भगवन ,आँखें खोलिये ,कुछ तो बोलिये 'नफरत की राजनीति के खिलाफ। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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