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    लखीमपुर खीरी: दीपावली पर लोगों को भा रही चाइनीस लड़िया, मिट्टी के दिए हो रहे गायब

    लखीमपुर खीरी: दीपावली का त्यौहार भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। इस दिन हर घर में दीपमाला अर्थात दीयों की माला घरों में बनाई जाती है लेकिन आज के समय में इस त्यौहार में भारतीय दीए यानि मिट्टी के दीए आलोप होते नजर आ रहे हैं। दीयों के इस त्यौहार का स्थान चीन की बनी बिजली लडिय़ों ने ले लिया है। हालात ये हैं कि अब लोग दीयों के स्थान पर बिजली की लडिय़ों को अधिक पसंद करने लगे हैं। हर घर में बस एक-आध दीया रस्मी तौर पर ही लाया जाता है। 

    दीयों की अहमियत को भूलकर लडिय़ों को दे रहे हैं। आधुनिकता की चकाचौंध ने त्यौहारों की खूबसूरती को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है, जिस कारण आज हर एक क्षेत्र में पुरानी रिवायती चीज अपना वजूद गंवाती जा रही है।आधुनिकता के इस दौर में दीपावली का त्यौहार भी अब दूर होता जा रहा है। मिट्टी के दीए बनाकर उनको रंगों से चमकाने वाले प्रजापत कारीगरों की जिंदगी अब बेरंग हो रही है। 

    लोग मिट्टी के दीयों की अहमियत व रिवायत को भूलकर बिजली से चलने वाली रंग-बिरंगी लडिय़ों को पहल दे रहे हैं। दीपावली पर दीयों से दिन-ब-दिन दूर हो रहे लोग अब इनको चुबारे काले करने वाला कहकर इनसे किनारा कर रहे हैं, जिसका सीधा असर दीए व अन्य मिट्टी के बर्तन बनाने वालों की जिंदगी पर पड़ रहा है।

    समाज का अटूट अंग हैं प्रजापत

    हमारे समाज का ही अटूट अंग प्रजापत भाईचारा दशकों से मिट्टी के बर्तन बनाने कारण मशहूर है। आज अपना पुश्तैनी काम छोड़कर अन्य कार्यों को पहल देने में लगा है। प्रजापत बरादरी के कुछ लोग बेशक अपने  पुश्तैनी काम का वजूद बचाने के लिए अभी भी संघर्ष कर रहे हैं लेकिन उनमें भी अब पहले वाला उत्साह दिखाई नहीं दे रहा। 

    मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों के साथ जब हमारे INA के संवादाता शाहनवाज गौरी द्वारा गोवर्धन लाल प्रजापत से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि मिट्टी के दीए व अन्य बर्तन अब सिर्फ तस्वीरों पर ही सिमट कर रह गए हैं। आज लोग मिट्टी के दीए व अन्य बर्तनों को सिर्फ शौंक के तौर पर ही खरीदते हैं। पहले ये बर्तन लोगों की जरूरत हुआ करते थे।

    महंगाई भी कारीगरों पर पड़ी है भारी

    कारीगरों ने बताया कि उनके लिए पुश्तैनी काम अब घाटे का सौदा है। मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए प्रयोग की जाने वाली काली मिट्टी की ट्राली 3 हजार रुपए में मिलती है। पहले उनको मुफ्त में ही मिल जाती थी। महंगाई बढऩे से अब उनका खर्च कमाई से अधिक हो गया है। 

    गोवर्धन लाल प्रजापत

    दीए व चाइनीज लड़ी के रेट

    मिट्टी का एक दीया मार्कीट में 2 रुपए में बिक रहा है। कारीगर को प्रति दीए सिर्फ 20 पैसे ही बचत होती है। दूसरी तरफ चाइनीज लडिय़ों का रेट 35 रुपए प्रति लड़ी है। इसी तरह भारतीय लड़ी 80-90 रुपए की है। चीन की लड़ी 35 दीयों वाली  लगभग 80 रुपए है जबकि भारतीय लड़ी का रेट 200 रुपए है। इसी कारण लोग चाइनीज सामान को ही तवज्जो दे रहे हैं।




    Initiate News Agency(INA)

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