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    कृषि उन्नति में ही बदलते भारत का भविष्य निहित

    अरविन्द सुथार, कृषि एवं पर्यावरण लेखक, जालौर।

    Initiate News Agency(INA)


    --गांवों की बदलती तस्वीर और किसानों की आत्मनिर्भरता ही होगी राष्ट्र के नवसृजन की नींव 

    --"धानी चुनरिया ओढ़ाकर, धरती का मान बढ़ाऊं मैं,

    चलता रहूं, बस बढ़ता रहा हूं, धरतीपुत्र कहलाऊं मेैं।।" -किसान 


    कृषि का सर्वांगिण विकास और भारत की आत्मनिर्भरता

    भारतवर्ष की कृषि विभिन्नताओं को एक पटल पर लाकर उनमें निखार लाना होगा। भविष्य में नवीन कृषि आयामों की तलाश करनी होगी। उन्नत बीजों के मामले में किसानों को आत्मनिर्भर करना होगा। हर गांव को आदर्श कृषि मोडल के प्रारूप में रखकर कार्य करना होगा। यदि औद्योगिक आत्मनिर्भरता से पहले कृषि उत्पादन, भण्डारण व प्रोसेसिंग के मामले में आत्मनिर्भरता इजाद की जाए तो निश्चित ही इसका परिणाम औद्योगिक क्रांति पर पड़ेगा। ग्रामीण आत्मनिर्भर में जल संरक्षण पर भी विशेष ध्यान देना होगा। 

    क्योंकि जल है तो कल है। निकट भविष्य में जल संकट का खतरा नहीं आए, इस हेतु धरातलीय प्रयास करने होंगे, जल संरक्षण को कृषि विकास की योजनाओं में वर्तमान से भी अधिक मजबूती से शामिल करना होगा। किसानों को जल संरक्षण की अनिवार्यता हेतु कार्य करवाना होगा। किसान वही आत्मनिर्भर होगा जिसके खेत में जल संरक्षण होगा। वर्षा जल के संरक्षण करने हेतु पारम्परिक जल संरक्षण पद्धतियों पर विश्वास करना होगा। इसके बाद मृदा की उर्वरता को बनाए रखने हेतु व्यापक प्रयास आवश्यक होंगे। 

    घटती मृदा उर्वरता भी कृषि उत्पादन में रोड़ा डाल रही है। किसानों को तहसील या जिला स्तर पर सीधे उपभोक्ता से जोड़ने के प्रयास करने होंगे, जैविक, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने हेतु व जैविकता को जनमानस तक पहुंचाने हेतु हर जिले में मॉडल जैविक ग्राम की संकल्पना पर कार्य करना होगा। इन्हें चाहें तो कृषि पर्यटन से भी जोड़ सकते हैं, ताकि इस मॉडल को देखकर अन्य किसान भी अपने स्तर पर कुछ सुधारात्मक गतिविधियों की स्थापना कर सकें। किसानों को स्वयं बीज उत्पादन करने, इसके भंडारण व उपयोग के लिए मार्गदर्शन देना होगा। 

    गांवों में ऐसे खेतों का चयन करना होगा जो किसान खेत स्कूल के रूप में विकसित किये जा सकें ताकि प्रभावी कृषि विस्तार सेवाओं में इजाफा हो। लघु, सीमान्त व् किराए पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसानों की आय वृद्धि पर और कार्य करना शेष है। क्योंकि जोतों का आकार छोटा होने से लागत बढती जा  रही है। जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर मौसम आधारित पूर्वानुमान जानकारियां, उपयोग करने लायक कृषि सलाह, जलवायु अनुकूलन बीज आदि किसानों तक पहुंचाने के बारे में कार्यों को और गहराई से योजनाबद्ध करना होगा। 

    फसल की क्षति को रोकने हेतु किसान स्तरीय गतिविधियों में सुधार करना होगा। प्राकृतिक आपदा का किसान द्वारा कैसे सामना किया जाए व किसान स्वयं ही कैसे उभर सके इसके लिए अनुसंधान की आवश्यकता है। क्योंकि भारत जैसे एक कृषि प्रधान देश की समृद्धि का रास्ता गांव के खेत खलिहानों की समृद्धि से होकर ही जाता है। ऐसे में किसान को बुवाई से मार्केट व आय तक सुरक्षित बनाना होगा। आज के समय में खेती व किसान का आर्थिक विश्लेषण किया जाए तो यह पाएंगे कि आजीविका के लिए निश्चित रूप से खेती सबसे अच्छा कार्य नहीं रह गया है। इस वजह से बहुत सारे किसान ऐसे हैं जो खेती छोड़ देना चाहते हैं।

    आखिर समस्या कहां है? खेती को क्यों अंधी बेरोजगारी मान लिया गया है, क्या इसमें बदलाव के प्रयास मिथ्या साबित हो रहे हैं? कृषि के कई सारे सेक्टर हैं, क्या प्रत्येक सेक्टर पर मार झेलनी पड़ती है? यह मान लिया कि" खेती एक क्रिकेट का मैदान है।" जहां कौन सी गेंद पर कब खेल बदल जाए कुछ कह नहीं सकते। किसान की आय बढ़ाने का देश व्यापी आह्वान होने के बावजूद भी किसान का रुतबा फीका सा क्यों है? 

    फसलों की तेजी से बढती मांग, मौसम की मार, बाजार की अल्प उपलब्धता, उत्पादक से उपभोक्ता का अधिक फासला, फसल मूल्य, उत्पादन लागत, जोतों का आकार आदि कृषि की मुख्य समस्याएं हैं। किसान की आत्मनिर्भरता बहुत मायने रखेगी। क्योंकि किसान आजकल बाजार पर निर्भर है। इससे विपरीत किसान को बाजार निर्माण करने के कौशल पर ध्यान देना होगा। आजकल किसान इतने मेहंगे बीजों, उर्वरकों और अन्य आदानों का उपयोग करके फालतू की लागत बढाने की ओर बढ रहा है। जैविक आदानों के नाम पर बाजार में होड़ है। हर कोई किसान की तलाश में है। 

    ताकि वो अपने जैविक खाद व बीज किसान को बेच सके। बाजार में कई तरह के लुभावनी योजनाएं चल रही है। डायरेक्ट मार्केटिंग के लिए किसानों को उकसावा दिया जा रहा है। किसान को महंगे उत्पाद बेचकर यह लालच दिया जा रहा है कि इनके उपयोग से आपको कमीशन मिलेगा। तो कौनसा तरीका है बाजारीकरण का। किसान को ही हर कोई क्यों लक्ष्य बना रहा। उच्च गुणवत्तायुक्त बीज सही दामों में किसान को उपलब्ध हो पाना एक बड़ी चुनौती रहती है। महंगे बिकने वाले पेस्टिसाइड से कीटों पर नियंत्रण होता है, फसलों की उत्पादकता बढ़ जाती है। 

    पर जैविक या प्राकृतिक खेती की अपेक्षा ये रासायनिक खेती किसान का खर्चा बढ़ाने के साथ मिट्टी की उर्वरक क्षमता, पर्यावरण, विलुप्त होती प्रजाति , किसान व उपभोक्ता के स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत घातक सिद्ध होते हैं। एक बार इनका प्रयोग करने पर, जमीन इनकी आदि बन जाती है, फिर इनको बार-बार इस्तेमाल करना पड़ता है। किसान इनको बहुत महंगे दामों पर खरीदने को मजबूर रहता है। इन सब के लिए किसानों की बाजार पर निर्भरता खेती की लागत को बहुत ज्यादा बढ़ा रही है। 27 ऐसे पेस्टिसाइड हैं जो भारत सरकार ने हाल ही में प्रयोग करने पर पाबंदी जारी की है। 


    महंगे बीजों को भी पाबंदी के दायरे में लाने होंगे, ये भी आर्थिक जहर हैं। खेतों में काम के लिए मजदूरों का मिलना एक बड़ी समस्या बन गई है। एकल परिवार होने के चलते अब छोटे किसानों को भी मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है। परिवारों में बंटवारे के चलते भी पीढ़ी दर पीढ़ी खेती की जोत का आकार घटता जा रहा है। देश के लगभग 85% किसान परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। इससे भी प्रति एकड़ खेती की लागत बढ़ जाती है। मौसम की मार से किसान को बहुत भारी नुकसान होता है।

    किसान का खेत क्रिकेट के मैदान की तरह होती है, कब, कौनसी गेंद पर खेल बदल जाए कुछ कह नहीं सकते। बेमौसमी बारिश, ओलावृष्टि, बाढ़, सूखा, चक्रवात, टिड्डी आक्रमण आदि ऐसी कई प्राकृतिक आपदाएं हैं जिससे किसान दब जाता है। पिछले कई सालों से खेती करने की लागत जिस तेजी से बढ़ती जा रही है। उस अनुपात में किसानों को मिलने वाले फसलों के दाम बहुत ही कम बढ़े हैं। किसान को फसल मूल्य के रूप में अपनी वास्तविक लागत का आधा या चौथाई भी वसूल नहीं हो पाता या किसान को कौड़ी के भाव अपने फसल उत्पाद फेंकने पड़ जाते है। 

    लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि उपभोक्ता को फसल उत्पाद सस्ते में मिल जाते हैं। असल में किसान के खेत से लेकर उपभोक्ता तक आने तक की प्रक्रिया में फसल उत्पाद कई बिचौलियों और व्यापारियों के हाथो में से होकर आती है। बिचौलिए का काम ही होता है किसान से सस्ते से सस्ते दाम में खरीद कर महंगे से महंगे दाम में आगे बेचना। इस पूरी प्रक्रिया में ज्यादातर असली मुनाफा बिचौलिए खा जाते है और किसान व उपभोक्ता दोनों ठगे से रह जाते हैं। किसी फसल उत्पाद के लिए उपभोक्ता जो मूल्य देता है, उसका बहुत ही कम हिस्सा किसान को मिल पाता है। बाजार मूल्य का कभी कभी तो 20 से 30% तक का हिस्सा ही किसान तक पहुंचता है। 

    कई बार ऐसा भी होता है कि फसल का घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य फसल की लागत से भी कम होता है, और किसान को लगभग फसल में नुकसान उठाना पड़ता है। यह स्थिति सर्वविदित है कि अधिकांश किसान अभी भी झोलाछाप व्यापारियों पर निर्भर है। क्योंकि यह बात कोरोना के लॉकडाउन काल में समझ आई। इस वक्त व्यापारियों के अभाव में फसल उपज खराब हुई। देखा जाए तो देश में कुछ किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ ले पाते और बाकी किसान बिना किसी न्यूनतम समर्थन मूल्य के ही फसल उत्पाद बेचते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि सरकारी खरीद की बहुत धीमी है। 

    ऐसे में गरीब तबके के छोटे किसान इंतजार नहीं कर सकते, यह प्रक्रिया तो कुछ किसानों को अखरती भी है। क्योंकि किसान को साल भर बाद किसी की उधारी चुकानी है, ट्रैक्टर का किराया देना है, खाद बीज व किराणा वालों का बकाया चुकाना है। ये छोटी छोटी आवश्यकताएं किसान को मजबूर कर देती है। इसलिए किसान सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले सकता। किसान की स्थिति यह है कि अगर उत्पादन कम गुणवत्ता का है तो भी किसान का नुकसान, और अगर ज्यादा उत्पादन हो जाता है तो भी फसलों के दाम गिर जाते हैं, और तब भी किसान को नुकसान होता है।

    किसान की आत्मनिर्भरता ही देश के नव सृजन की नींव होगी, किसान की आमदनी दोगुनी से भी अधिक होगी और कृषि के लिए युवाओं की होड़ लगेगी। आइए हम ऐसे ही कुछ प्रयासों पर विचार करते हैं, और क्या क्या हो सकती हैं आत्मनिर्भर भारत  की संभावनाएं 

    बाजारोन्मुखी कृषि और महिला सशक्तिकरण 

    बदलते परिवेश में किसान की अवधारणाओं को बदलना होगा। किसान की हमेशा से धारणा रही है कि वह केवल उत्पादक है। अन्न उपजाना उसका कार्य है, व्यापार विपणन तो व्यापारियों व पूंजीपतियों का काम है। किसान आत्मनिर्भर तभी होगा जब उसकी मानसिकता में उद्यमिता का विकास होगा। हर गांव में युवा कृषक उद्यमी तैयार करने होंगे। इस हेतु केन्द्र सरकार को देशभर में अलग अलग राज्य सरकारों के साथ कार्य कर कृषि विविधता के सुन्दर रूप को एक राष्ट्रीय पटल पर लाना होगा। किसानों में उद्यमिता के कौशल से उत्पादन के साथ साथ विपणन में सुधार होगा, छोटे बड़े ग्रामीण उद्यमों का विकास होगा, जिससे गांव हाइटेक बनेंगे। गांवों की अपनी अलग पहचान बनेगी। फसल उत्पादन से लेकर विपणन तक कार्य गांवों में ही होने लगेगा। उपभोक्ता सीधे नजदीकी गांवों से आवश्यक वस्तुएं खरीद सकेंगे।  

    इतना ही नहीं युवाओं की कृषि के प्रति नई रूचि जाग्रत होगी। इस प्रकार से भारत की आत्मनिर्भरता अवधारणा निश्चित ही ग्रामीण भारत को प्रोत्साहन देगी। क्योंकि विदेशी सस्ते उत्पादों ने हमारी मानसिकता को घेर लिया था, हमने उन्हें दिनचर्या के अनिवार्य स्तम्भ बना दिए थे, हम इस बात से वाकिफ हैं कि ग्रामीण भारत में महिलाओं की स्थिति दयनीय है। महिलाओं के सर्वागीण विकास पर अभी बहुत सारा विचार मंथन शेष है। पुरुष प्रधान समाज में, खासकर कृषि की बात करूं तो महिलाओं के महत्व को नजरअंदाज ही किया जाता रहा है। जिससे उनके सशक्तिकरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ग्रामीण महिलाओं में बहुत अधिक कौशल होता है। 

    खेतीहर महिलाएं खासकर खाद्य पदार्थों के परंपरागत प्रसंस्करण के लिए जानी जाती है। आत्मनिर्भर भारत कल्पना से इन प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का मंडीकरण या बाजारीकरण हो सकेगा और ठेठ ग्रामीण व परंपरागत उत्पादों को अच्छे उपभोक्ता मिल सकेंगे व इनकी गुणवत्ता में निखार आएगा। आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को ग्रामीण भारत, महिला सशक्तिकरण के उत्थान की दृष्टि से देखना होगा। देर सवेर निश्चित ही हमारे गांव बाजार का रूप लेंगे। ग्रामीण हाट बाजार मजबूत होंगे और शहरों से गांवों की और पलायन होगा।

    डेयरी में आत्मनिर्भरता 

    गांवों में डेयरी विकास की संभावनाएं प्रबल है। यदि हर 5-7 गांवों के समूह में एक डेयरी उत्पाद प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना हो। अभी वर्तमान में गांवों को केवल दूध संकलन का जरिया माना जा रहा है। गांवों से दूध संकलित करके नजदीकी बाजारों में पहुंचा दिया जाता है। परिवहन में समय लग जाने से दूध की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है। इसके लिए गांवों में ही दूध की प्रोसेसिंग की यूनिट्स लगवाकर कृषकों को इसका अधिक लाभ दिया जा सकता है। 

    डेयरी प्रोसेसिंग से दूध के पाउच पैकिंग, छाछ, दही पैकिंग, मिठाई, पनीर या घी बनाना व पैकिंग करने संबंधित कार्य छोटे स्तर पर शुरू हो सकते हैं व नजदीकी बाजारों में आउटलेट बनाकर बेच सकते हैं। बशर्ते ये सभी कार्य दूध के प्रोक्यॉरमेन्ट से लेकर मार्केटिंग तक ग्रामीण किसान के द्वारा ही किए जाएं। और इसमें विपणन में ग्रामीण संस्कृति को आधार बनाया जाए, तो निश्चित ही किसान की मार्केटिंग कार्यकुशलता बहुत फायदेमंद होगी।

    प्रोसेसिंग, कृषि उद्यमिता और युवाओं का रूझान 

    फलों की प्रोसेसिंग, जैम, जेली, अचार, मुरब्बा और अन्य सभी उत्पाद जो फलों द्वारा तैयार होते हैं। फूलों की खेती जिन गांवों में होती है। वहां पर इत्र व प्राकृतिक रंग व गुलाल बनाने का कार्य हो सकता है। इसके लिए ग्रामीण महिलाओं को मौका दिया जाए जिससे महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकें। ग्रामीण महिलाएं नियमित क्रम में निर्धारित समय के अनुसार इस प्रकार के प्रोसेसिंग प्लांट में सेवाएं दे सकती हैं। साथ ही इन महिलाओं को फलोत्पादों की मार्केटिंग में भी हाथ बंटाने का मौका मिले, तो निश्चित ही ग्रामीण रोजगार का हम स्थाई ढांचा तैयार कर सकते हैं। गांवों में पशुआहार निर्माण की छोटी छोटी इकाइयां शुरू की जा सकती हैं। इसके लिए युवाओं को मौका दिया जाए। 

    साथ अन्य सभी प्रकार के गैर कृषिगत उत्पादों का निर्माण भी गांवों में ही हो, तो निश्चित ही गांव आत्मनिर्भर बनेंगे। देश का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण भारत के रूप में जाना जाता है। गांवों में बायोगैस प्लांट, गोबर से लकड़ी व गत्ते बनाना, कंपोस्ट निर्माण व अन्य जैविक कीटनाशकों का निर्माण भी करवाया जा सकता है। प्रत्येक जिले के जिला उद्योग केन्द्र व कृषि एवं उद्यान विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों के सांझा प्रयासों की आवश्यकता होगी। सबसे पहला कार्य तो युवाओं को प्रशिक्षण देने का होगा, प्रशिक्षण भी गांवों में ही दिया जाए, ताकि ग्रामीण महिलाएं भी इसमें हिस्सा ले सकें। 

    जैविक खेती को मिले बढावा 

    जैविक खेती कृषि में नई संभावनाओं से भरपुर है। यह कृषि पर्यटन के अलावा शहरी उपभोक्ताओं को गांवों की और आकर्षित करने का एक माध्यम भी है। जैविक खेती जिन गांवों में होती है, उन किसानों को फसल विविधीकरण पर कार्य करवाया जाए, जैविक दूध, शहद से लेकर फल फूल व खाद्यान्न तक के पूरे उत्पादन को खेत पर ही बेचा जा सकता है। या ऑनलाइन मार्केटिंग करके जैविक खेती में आत्मनिर्भरता कायम की जा सकती है। इसके लिए जैविक खेती करने वाले किसान को कुछ उपभोक्ता के आवेदन आमंत्रित करने चाहिए ताकि वह साल भर अपने कृषि उत्पाद उन उपभोक्ताओं तक पहुंचा सके। और फैमिली फार्मर के रूप में सेवाएं दे सके। 

    कृषि उत्पादन के साथ हो विपणन 

    कृषि को व्यावसायिक रूप देकर भी गांवों में कृषिगत रोजगार बढा सकते हैं। जिसमें मधुमक्खी पालन, रेशम कीटपालन, और पशुपालन को संरक्षित खेती के विषयों से जोड़ना होगा, इस प्रकार के प्रयोग करने होंगे कि ये विपरीत मौसमी परिस्थितियों में भी उत्पादन दे सकें। शहद उत्पादन कृषि में पशुपालन की तरह सहायक सिद्ध हो सकता है। लेकिन शहद के उचित प्रसंस्करण व प्रोसेसिंग करने की इकाइयां गांवों में खुले। जिन जिलों में शहद उत्पादन की संभावनाएं तलाशी जा रही है, वहां शहद के फिल्टर और पैकेजिंग की कोई राह दिखाई नहीं देती। मैने जो बात संरक्षित उत्पादन की लिखी, इस बात पर गौर करना होगा, क्योंकि इनके पालन में वातावरण का काफी असर रहता है। गांवों इस प्रकार के कृषिगत कुटीर उद्योंगों के विकास से गांवों का आत्मनिर्भर होना तय है।

    जहां किसान वहीं बाजार 

    एक ऐसा कौशल किसान को आजमाना है, जिससे किसान अपने कृषिगत उत्पादों को बेचने हेतु ऑनलाइन मार्केटिंग डायरेक्ट सेलिंग आदि कई प्रकार की लुभावनी व आकर्षक योजनाएं लेकर बाजार में उतरे। किसान स्वयं अपने खेत से उपजे गेहूँ से देशी आटा व सरसों से देशी सरसों तेल डायरेक्ट सेलिंग के माध्यम से बेच सकता है। जो निजी कम्पनियों के लोग किसान के पास अपने उर्वरक, खाद, बीज, कीटनाशक आदि बेचने आते हैं, उन्हीं का उपयोग किसान करना सिखे, उन्हें किसान द्वारा लक्ष्य बनाया जाए। इस प्रकार की व्यावसायिक बुद्धिमत्ता से किसान को उपभोक्ता समझना बंद कर उद्यमी समझना शुरू करेंगे। यही आज के समय की मांग है। किसान सब्सीडी, सरकारी सहयोग की लालचा किए बिना बाजार पर राज करना सिखे। 

    हर जिले में कृषि औद्योगिक गांवों का विकास 

    सरकार को हर जिले में ऐसे कुछ गांवों को चिन्हित करके उन्हें औद्योगिक क्षेत्र का दर्जा देना होगा, जहां अच्छा, घना व विविध कृषि उत्पादन होता हो, उस गांव के आस पास के गांवों के काफी किसान अच्छी क्वालिटी की फसलों का उत्पादन करते हो, ऐसे कुछ केन्द्र में स्थित गांवों को कृषि औद्योगिक क्षेत्र का दर्जा देकर हाइटेक करना होगा। जिस प्रकार से जिलों में रिको इण्डस्ट्रीयल एरिया विकसित किया जाता है। ऐसे ही केवल कृषिगत एग्रो इण्डस्ट्रीय एरियाज विकसित करने होंगे। जिसका सीधा लिंक जिले के तमाम किसानों से हो, साथ ही किसानों व ग्रामीण युवाओं को ही उनमें रोजगार मिले। 

    इस प्रकार के कार्यों से फल, सब्जी व अन्न की खराबी बहुत कम होगी। विकट परिस्थितियों में भी ऐसे कारोबार चल सकेंगे। क्योंकि कृषि उत्पादन नही रूकता तो कृषि उद्योग कैसे रूक सकेगा। सरकार को हर जिले में ऐसे गांव विकसित करके औद्योगिक दृष्टि से सारे तामझाम लगाने होंगे। साथ ही उनमें कुछ नियमों के द्वारा उन्हें ही कार्य करने का मौका दिया जाना होगा, जो किसान है, फसल उत्पादक है। अन्यथा ऐसे क्षेत्रों पर पूंजीपतियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। 

    कृषि पर्यटन व स्मार्ट खेती 

    कृषि पर्यटन एक नवीन अवधारणा है। शहरों के लोग बंद मकानों में रह रहकर तंग आ गए हैं। वो महिने में एक दो दिन नजदीकी गांवों में भ्रमण को जाना चाहते हैं। गांवों की गोबर मिट्टी की संस्कृति में रहकर खुले में निवास करना चाहते हैं। यही एक ऐसा मोड़ है जहां से ग्रामीण कृषि एवं पर्यावरण पर्यटन को बढावा मिल सकेगा। कृषि पर्यटन के लिए हर जिले के एक दो गांवों को चयनित करके विकसित किया जा सकता है। 

    ग्रामीण किसानों की फसल बुवाई व उत्पादन से लेकर प्रोसेसिंग तक का हर एक पहलु कृषि पर्यटन का मजबूत स्तम्भ है। खेती में दर्शनीयता का विकास करना होगा। इससे गांवों में रोजगार बढेगा व ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर हो सकेगा। गांवों को बाजार व एग्रो टूरिज्म के साथ साथ एग्रो मार्केटिंग टूरिज्म के रूप में भी विकसित करने होंगे। गांवों में हाट बाजारों व साप्ताहिक बिक्री मेलों का आयोजन व अच्छे प्रचार प्रसार से शहरों के लोगों को भी आकर्षित करना होगा। प्रायोगिक तौर पर कुछ मॉडल गांव विकसित किए जा सकते हैं। 

    जहां जल संरक्षण के अच्छे तरीके देखने लायक हो, फार्मिंग सिस्टम, समन्वित कृषि प्रणाली, आधुनिक, स्मार्ट व संरक्षित खेती के स्थल मौजूद हो, उस गांव में उपजी हर उपज की प्रोसेसिंग उसी गांव में होती हो। वहां के किसान केवल गांव पर ही निर्भर हो, तो निश्चित ही ऐसे गांव एक नई अवधारणा एग्रो मार्केटिंग टूरिज्म के लिए पहचान बनाते हुए आत्मनिर्भर बन सकेंगे। जब तक किसान आत्मनिर्भर नहीं होगा, गांव आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। और जब तक गांव आत्मनिर्भर नहीं होगा, देश के आत्मनिर्भर बनने में समस्याएं आएगी। गांवों को विदेशी हवा से जोड़ना होगा, 

    कृषि विकास मंथन हेतु हर राज्य में हो अनोखी कमिटी 

    कृषि विकास के लिए हर राज्य में स्पेशियल कमिटी गठित करनी होगी, जिसमें आइसीएआर, राज्य कृषि विश्वविद्यालय, कृषि की उपशाखाओं के विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केन्द्रों, प्रगतिशील नवाचारी किसानों, कृषि के दायरे को स्पर्श करने वाले अन्य विभागों के विचारकों, देश के खोजी कृषि पत्रकारों, खासकर कृषि विपणन व कृषि अर्थव्यवस्था के जानकारों आदि को शामिल करके हर राज्य में कृषि विस्तार व विमर्श हेतु कमिटी गठित करके राज्यस्तरीय वितीय सहायता करके उन्हें कृषि मामलों में गांवों को विकसित करने, गांवों को उन्नत बाजार से जोड़ने, कृषि लागत एवं आमदनी के अनुपातों का सही विश्लेषण करने, आपदा प्रतिरोधी गतिविधियों का प्रसार करने के लिए कार्ययोजना बनाने के लिए प्रयास करने चाहिए। 

    कृषि बाजार की गतिविधियों पर क्षेत्रीय अनुसंधान 

    कार्यरत क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्रों को विकसित करना होगा, उन्हें ग्रामीण व कृषि विकास पर कार्य करने के नए लक्ष्य देने होंगे। तथा अनुसंधान लक्ष्यों को स्वैच्छिक रखना होगा। क्योंकि अनुसंधानकर्ता जिस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं उस क्षेत्र को कैसे विकसित किया जाए, उस क्षेत्र में किस प्रकार का परिवर्तन आवश्यक है यह ग्राउण्ड लेवल पर तय करने की स्वैच्छिकता देनी होगी। 

    खासकर किसान कौशल विकास और बाजारी कौशल का विकास हेतु गतिविधियों को सम्पन्न करने की सुविधाएं मुहैया करानी होगी। जो किसान अच्छा कार्य कर रहे हैं उन्हें भी कुछ जिम्मेदारी दी जा सकती है। ताकि अन्य किसानों तक उनकी मानसिकता पहुंचे। कृषि में परिवर्तन शिक्षा के अलावा अनुभव से अधिक अच्छा हो सकता है। अत: किसानों को छोटे छोटे समूह बनाकर अनुभव विस्तार का मौका दिया जाना चाहिए.

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