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    आलेख। अंग्रेजों ने रचा था भारत में जाति, धर्म और रंग के संघर्ष का षड्यंत्र

    आलेख। इन दिनों पूरे देश में अचानक वर्ग, वर्ण, समाज, जाति, धर्म और पंथ प्रतिद्वंद्विता के समाचार बढ़ने लगे हैं। कहीं-कहीं तो सड़क पर संघर्ष की घटनाएं भी घटी हैं। इसमें विदेशी घुसपैठ वाले सीमा प्रांतों में ही नहीं मध्य प्रदेश जैसे शाँति के टापू कहे जाने वाले राज्य में भी ऐसी घटनाएं घटीं हैं। भारत में वर्ग-उप वर्ग, जाति, भाषा और पंथ के ऐसे संघर्ष का षडयंत्र अंग्रेजों ने रचा था। जो अंग्रेजों की विदाई के 73 वर्ष बाद भी खूब फल-फूल रहे हैं। कुछ व्यक्ति और कुछ संगठन योजनाबद्ध ऐसे अभियान चला रहे हैं और जिनसे सामान्य जनों को उलझा रहे हैं।

    हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। अमृत महोत्सव यानी अमृतत्व की ओर यात्रा का उत्सव। कोई भी स्वाधीन राष्ट्र अमृतत्व की ओर कब अग्रसर होता है ? जब उसमें स्वत्व और स्वाधीनता का भाव प्रबल होता है । भारत में स्वत्व का अतीत सामाजिक एक जुटता में निहित है, भावनात्मक समरसता निहित है, लेकिन भारत में इसके विपरीत काम हो रहा है । जिन विघटनकारी नीतियों और बातों की बदौलत विदेशियों ने अपने पैर जमाये थे, आज उसी विभाजनकारी राहों पर कुछ व्यक्ति और संगठन चल रहे हैं । वे वर्ग, वर्ण, समाज और धर्म के आधार पर गोलबंदी की ऐसी बातें करते हैं जिससे समाज और राष्ट्र को ही नहीं स्वयं उनका भी अहित होने वाला है। आज वे ऐसी ही विभेद उत्पन्न करने वाले विषयों में ही अपनी सफलता और सशक्तता मान रहे हैं। इसीलिए वे पूरी शक्ति से यही प्रतिबिंब उभारने में सारी शक्ति लगाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि विभाजन की इस राजनीति से देश को कितना नुकसान हुआ है।


    इसका जन्म अंग्रेजों ने इसलिये दिया था कि वे संख्या में कम थे। यदि वे विभाजनकारी नीतियों की नींव न रखते तो लगभग दो सौ साल तक शासन न कर पाते। भारतीय एकजुट रहते तो यहाँ उनकी दाल नहीं गल सकती थी। इसलिये उन्होंने पहले अपने एजेंट तैयार किये, जिन्होंने देश में विभाजन और वैमनस्य का सामाजिक और सार्वजनिक वातावरण बनाया। फिर विभिन्न जाति, समाज और पंथ के विभाजन को स्थायी बनाने वाले कानून बनाये। और भारतीय जनमानस उनमें फंसता चला गया। उन कानूनों के पीछे के षड्यंत्र को समझकर जो लोग संघर्ष के लिये सामने आये उनके संघर्ष के कारण ही भारत स्वतंत्र हो सका। लेकिन आज कुछ शक्तियाँ उनके बलिदान से मिली स्वाधीनता यह विभेद वाली बातें ग्रहण लगा रहीं हैं। समाज, वर्ग, वर्ण या धर्म के पृथक-पृथक संगठन होना अनुचित नहीं है। इन संगठनों में यदि स्वस्थ और सकारात्मक स्पर्धा हो तो इससे देश गतिमान होगा। हमारी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव और प्रकाशमान होगा। लेकिन समाज में विभेद होगा उनमें आक्रामकता से भरी स्पर्धा होगी हो, तो यह राष्ट्र की स्वाधीनता को संकट उत्पन्न करते हैं। इस समय जो रहा है वह स्वाधीनता की अमृत यात्रा में अवरोध होंगे।

    आज इस विभाजनकारी बातों का सबसे अधिक शोर उत्तर प्रदेश में हो रहा है। वहां पांच महीने बाद विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। कुछ व्यक्तियों और संगठनों को लगता है कि वे जाति, वर्ग उपवर्ग और धार्मिक आधार पर भावनाएँ भड़का कर ही लोगों को संगठित कर पायेंगे, उत्तर प्रदेश की सत्ता को प्राप्त करने के लिये इसी को स्वर्ण पथ मान रहे हैं। इसलिये वे खुलेआम वर्ग, वर्ण, जाति और धर्म की आवेशात्मक बातें कर रहे हैं। कोई मुसलमानों को एकजुट करने में लगा है तो कोई वनवासी समाज को, कोई दलित समाज को, तो कोई ब्राह्मणों को एकजुट होने का आह्वान कर रहा है तो कोई यादव और पिछड़े समाज की बात कर रहा है। एक देश, एक प्रदेश और एक समग्र समाज की बात मानों गायब हो गयी है।

    उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं इसलिये वहाँ भाषणों में इस गर्मी को माना जा सकता है लेकिन मध्य प्रदेश में तो विधानसभा चुनाव अभी बहुत दूर है फिर भी यहाँ ऐसी गर्मी पैदा की जा रही है, तनाव और टकराव का वातावरण बनाया जा रहा है। ऐसा माहौल महाकौशल, बुन्देलखण्ड और मध्यभारत में दिखने लगा है। इन क्षेत्रों में पिछले पन्द्रह दिनों में दर्जन भर ऐसी घटनाएं घट चुकीं हैं जहां पुलिस और प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा। कोई कल्पना कर सकता है कि क्षत्रिय समाज के ही दो उप वर्ग हाथों में हथियार लेकर सड़क पर डटे और पुलिस को बीचबचाव करना पड़े, प्रशासन को धारा 144 लगानी पड़े। यह सब मध्य प्रदेश के मुरैना में हुआ जहाँ गुर्जर समाज और राजपूत समाज लामबंद हो गये। उनमें संघर्ष इस बात पर हुआ कि राजा मिहिर सेन गुर्जर थे या राजपूत। वहीं महाकौशल क्षेत्र में वनवासी बंधुओं को नगरवासियों के विरुद्ध लामबंद किया गया, रोज नयी सभायें हो रही हैं। प्रशासन को अपनी सक्रियता बढ़ानी पड़ी।

    वनवासियों और नगरवासियों में संघर्ष कराने का षडयंत्र अंग्रेजों ने 1804 के आसपास ईसाई मिशनरियों के माध्यम से आरंभ किया था। बाद में वामपंथी भी इसी मार्ग पर चले। भारत में यह अंग्रेजों ने स्थापित किया कि भारत के वनवासी मूल निवासी हैं, और नगरवासी बाहरी। इसके लिये उन्होंने वनवासियों के लिये ट्राइव शब्द गढ़ा जिसे उन्होंने हिन्दी में आदिवासी कहा। जबकि नगरवासियों को बाहरी बताने के लिये आर्यों की कहानी गढ़ी। आर्य शब्द ऋग्वेद से आया है। ऋग्वेद में आर्य आदर्श नागरिकता का प्रतीक है। सत्य धर्म, अहिंसा और परोपकार पर चलने वाले नागरिकों का प्रतीक। तभी ऋग्वेद में उद्घोष किया गया कि विश्व को आर्य बनाना है। लेकिन अंग्रेजों ने आर्य को एक नस्ल बताना शुरू किया। ऐसी नस्ल जो आक्रमण करके भारत में घुसी। यह प्रचार भारत के सभी वनक्षेत्र एक समान हुआ। लगभग सभी मिशनरी कार्यकर्ताओं के शब्द शैली एक सी थी मानों वनवासियों में यह प्रचार करने के लिये मिशनरियों ने कोई प्रशिक्षण लिया हो। अंग्रेजों ने यह रणनीति अपने पचास वर्ष के अनुभव के बाद बनाई थी।

    1757 में प्लासी युद्ध के बाद अंग्रेजी सत्ता मजबूत हुई और 1803 में दिल्ली सल्तनत के पतन के साथ वे लगभग पूरे देश के शासक बन गये । प्लासी से दिल्ली तक की यात्रा में अंग्रेजों को वनवासियों के तगड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा । उन्होंने अपने संघर्ष में भय और लालच में बहुत लोगों अपने पक्ष में किया यहाँ तक कि उनकी सेना में बहुत बहुत भारतीयों का हो गया लेकिन वे वनवासियों को नहीं तोड़ पाये । इसीलिये उन्होंने अपने दुष्प्रचार का लक्ष्य वनवासियों को बनाया। उन्हें अपनी सत्ता स्थायी बनानी थी, भारत वासियों के प्रतिरोध और संघर्ष की धार कम करनी थी। इसके लिये रणनीति चर्च ने तैयार की। 1804 में कलकत्ता, मुम्बई और मद्रास के चर्च ने सर्वेक्षण आरंभ किया । यह सर्वेक्षण लगभग दो वर्ष चला । इस सर्वेक्षण के बाद ही ईसाई मिशनरियाँ वन क्षेत्र में सक्रिय हुईं।

    अंग्रेज यहीं तक न रुके उन्होंने एक और रणनीति बनाई। अपने प्रशिक्षित लोगों को पुरातत्व सर्वेक्षण के काम में लगाया और इसे आधार बनाकर भारत के इतिहास को नये सिरे से लिखने का काम। उन दिनों के बंगाल में आज का बिहार और उड़ीसा प्रांत भी में शामिल था। कलकत्ता चर्च से जुड़ी मिशनरियाँ इन क्षेत्रों में सक्रिय हुईं। और मुम्बई के चर्च ने महाराष्ट्र के साथ मध्य प्रदेश के महाकौशल और मालवा तक अपने पैर फैलाये जबकि मद्रास के चर्च ने केरल, तमिलनाडु आदि को अपने हाथ में लिया । भारत के जंगलों में सक्रिय मिशनरियों ने एक ओर अंग्रेजी सत्ता को मजबूत करने के लिये विभाजन कारी बातें फैलाना आरंभ किया और दूसरी ओर धर्मांतरण करके वनवासियों को ईसाई बनाने का अभियान चलाया।

    चर्च को लगता था कि यदि वनों का ईसाईकरण हो जाये तो वनवासी अंग्रेजों की सत्ता के समर्थन में आ जायेंगे और समूची वन संपदा पर अंग्रेजों का अधिकार हो जायेगा। चर्च का अभियान तेज चले इसके लिये अंग्रेजों ने एक कानून बनाया और कहा- वनवासियों का अपना कोई धर्म ही नहीं है। यदि वे ईसाई बनते हैं, चर्च में जाते हैं तो यह उनका धर्मान्तरण नहीं है बल्कि धर्म के मार्ग पर चलने की शुरुआत है । वनवासियों को शेष भारतीय समाज से अलग करने के लिये उन्होंने सबसे पहले रंग को आधार बनाया। उनका तर्क था वनवासी काले हैं और नगरवासी गोरे। हालांकि भारत में रंग को लेकर कोई विभाजन न था। सभी रंग के लोग भारत में मिलते हैं । एक ही घर में दो रंग के लोग मिल जाते हैं । रामजी का रंग साँवला और लक्ष्मण जी का रंग गोरा है। भारत में एक देवी कालिका जी हैं। एकदम काला रंग। लेकिन अंग्रेजों का प्रचार इतना प्रबल था, कि भारतीय जनों का विवेक शून्य ही हो गया। वे अंग्रेजों की चला में फंसने लगे। वहीं पुरातत्व सर्वेक्षण के नाम पर इतिहास लेखन हुआ उसमें विभिन्न वर्गों और उप वर्गों में नकारात्मक प्रतिद्वंद्विता पैदा होने लगी। कहीं ब्राह्मणों को दलित समाज के विरुद्ध तो दलित समाज को अन्य वर्गो के विरुद्ध भड़काया । बात यहाँ तक ही न रुकी । क्षत्रिय समाज के भी दो उपवर्गो को सामने सामने खड़ा कर दिया।

    उम्मीद की जा रही थी कि अंग्रेजों के जाने के बाद उनके षडयंत्र उनके साथ ही चले जायेंगे । लेकिन उनके जाने के 72 साल बाद भी उनके द्वारा रोपी गयीं विष बेलें फैल रही हैं । यह विभाजन वादी प्रचार का ही परिणाम है कि यदि उत्तर प्रदेश के तीन स्थानों पर यादव और, ब्राह्मणों के बीच में खिंचाव उत्पन्न हुआ तो मध्य प्रदेश के मुरैना में गुर्जर और राजपूत समाज आमने सामने आ डटे । प्रशासन को धारा 144 लगाना पड़ी। वहीं छतरपुर में यादव समाज और करणी सेना आमने-सामने है तो सागर के एक गाँव में एक प्रेम प्रसंग के चलते हुई दुर्घटना ने यादव और ब्राह्मणों के बीच वैमनस्य पैदा कर दिया।

    किसी एक व्यक्ति द्वारा कोई अपराध करना या मर्यादा हनन करना एक बात है लेकिन उस व्यक्ति या घटना के बहाने समाज को एक जुट करके आक्रामक बनाना बिल्कुल दूसरी बात । इन दिनों भारत में यही सब हो रहा है। जाति, रंग, धर्म क्षेत्र और भाषा के आधार पर बांटने का काम हो रहा है। हम यह समझ ही न पा रहे कि अंग्रेजों ने तो बाकायदा 'बाँटो और राज करो" का मंत्र तैयार किया था । लेकिन उनके जाने के बाद तो इस नारे और इस नीति को धरती के भीतर गाढ़ दी जाने चाहिए थी । लेकिन कुछ लोगों ने इसे सहेज कर रखा हुआ है । और पद प्रतिष्ठिता प्रभाव बढ़ाने के लिये यही फार्मूला अपनाया जा रहा है । यदि कोई सभी "भारतीयों के एक डीएनए" होंने की बात कह दे तो उस पर हमले होते हैं । शाब्दिक और आरोपात्मक हमलों की बाढ़ आ जाती है । कोई "सबका साथ सबका विकास" का नारा लगाये तो शोर किया जाता है। इतना शोर कि कुछ साफ न दिखाई दे न सुनाई दे।

    एक आश्चर्यजनक बात यह है कि वामपंथी भले पूरी दुनियाँ में साम्यवाद का नारा लगायें लेकिन वे भारत वर्ण संघर्ष का ताना बाना बनाते हैं । तालिबानी मानसिकता के लोग भी सनातनी समाज के दो फाड़ करने के लिये दलित मुस्लिम एकजुटता का नारा लगाते हैं। यदि इस प्रकार विभाजन के नारे लगे, वर्ग वर्ण और समाज को बांटने के नारे लगेंगे तो कैसे स्वाधीनता का अमृत महोत्सव सार्थक होगा। स्वाधीनता केवल राजनैतिक नहीं हो सकती, केवल सत्ता प्राप्त करने भर के लिये संघर्ष न हुआ था। संघर्ष स्वाधीनता के लिये हुआ था। उस संघर्ष में कोई भेद न था।

    भला चंद्रशेखर आजाद ने भगतसिंह को जाति धर्म पूछकर अपने समूह में सम्मिलित किया था या सुखदेव और राजगुरु ने अशफ़ाकउल्ला से जाति धर्म पूछा था ? या रानी लक्ष्मीबाई झलकारी देवी ने। या मिहिर सेन के संघर्ष में क्या केवल गुर्जर या राजपूत ही थे ? शिवाजी महाराज के संघर्ष में भी सभी थे। महाराणा प्रताप के साथ प्राण देने वाले अधिकांश सैनिक भील वनवासी थे। तब इन वीरों और बलिदानियों के नाम पर वर्ग वर्ण भेद की बात क्यों होती है। लेकिन कुछ ऐसी बातें करते हैं। ऐसे अभियान चलाते हैं। वह केवल इसलिये कि स्वतंत्रता के बाद से अबतक के वर्षों में अंग्रेजों के षडयंत्र को उजागर तो किया गया पर इतना पुरजोर नहीं कि समाज उस षडयंत्र के सत्य को समझ सके। आज हम जब स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो उत्सव मनाने के साथ षडयंत्र के तत्व भी उजागर होने चाहिये तभी भारतीय स्वाधीनता के अमृतत्व की यात्रा सफल होगी।

    रमेश शर्मा


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