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    देवबंद: क्यों मनाया जाता है अहोई का त्यौहार ?

    देवबंद: अहोई माता की कथा के बारें में पंडित संदीप शर्मा ने बताया कि प्राचीन काल में एक साहूकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थी। इतना ही नही साहुकार के एक बेटी भी थी जो दिपावली पर अपने मायके आयी हूई थी। 

    उन्होने बताया कि दीपावली पर घर को लीपने के लिये सातों बहुएंे मिटटी लाने के लिये जंगल गई तो ननद भी उनके साथ चल दी। साहूकार की पुत्री जंहा पर मिटटी काट रही थी उस स्थान पर स्याहु साही अपने बेटो के साथ रहती थी मिटटी काटते हुये गलती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से स्याहू का एक बच्चा मर गया स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली मै तुम्हारी कोख बांधूगी। 

    स्याहू के वचन सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातो भाभीयो से एक एक विनती करती है कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा ले। सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है उसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चा होता, वो सात दिन बाद मर जाता, सात पुत्रो की इस प्रकार मृत्यृ होने के बाद उसने एक पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी। 

    उन्होने बताया कि सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और उसे स्याहु के पास ले जाती हैॅ रास्ते मे थक जाने पर दोनो आराम करने लगते है अचानक साहूकार की छोटी बहु की नजर एक ओर जाती है वह देखती है कि सांप गरूड पंखनी के बच्चो को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है इतने मे गरूड पंखनी वहा आ जाती है और खून बिखरा हुआ देख उसे लगता है कि छोटी बहू ने उसके बच्चे को मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोच मारना शुरू कर देती है छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है गरूड पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हे स्याहु के पास पहुंचा देती है स्याहू छोटी बहू की प्रसन्न होकर उसे सात पुत्रो और सात बहू होने का आर्शीवाद देती है स्याहू के आर्शीवाद से छोटी बहू का घर पुत्र और पुत्र वधुओं से हरा भरा हो जाता है। उन्होने बताया कि अहोई का अर्थ एक प्रकार से अनहोनी को होनी बनाना भी होता है।



    Initiate News Agency(INA), देवबंद

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