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    शोधकर्ताओं ने कियाएविसेनिया मरीना मैंग्रोवकाजीनोम अनुक्रमण

    शोधकर्ताओं ने कियाएविसेनिया मरीना मैंग्रोवकाजीनोम अनुक्रमण

    नई दिल्ली : सागर तट पर स्थित एक ओर से बंद खारे जल के समूह ज्वारनदीमुख (Estuary), जिसका दूसरा सिरा अंत में खुले सागर से जुड़ा होता है,में एक या अधिक नदियाँ एवं झरने आकर मिलते हैं। ऐसे ही स्थानों परखारे पानी या अर्ध-खारे पानी में मैंग्रोव (Mangrove) नामक वृक्षों के समूह (जंगल) पाए जाते हैं, जो पारिस्थितिक तंत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए जाने जाते हैं। मैंग्रोव अक्सर मीठे और खारे पानी के मिश्रण वाले ऐसे तटीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं, जहाँ कोई नदी सागर में आकर मिल रही होती है।

    भारतीय वैज्ञानिकों के एक नये अध्ययन में अत्यधिक लवण सहिष्णु और लवण-स्रावितट्रू-मैंग्रोव प्रजातिएविसेनिया मरीना के संदर्भ-ग्रेड के एक पूरे जीनोम अनुक्रम का खुलासा किया गया है। यह अध्ययन भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) से संबद्ध इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेजभुवनेश्वर और एसआरएम-डीबीटी पार्टनरशिप प्लेटफॉर्म फॉर एडवांस्ड लाइफ साइंसेज टेक्नोलॉजीजएसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजीतमिलनाडु के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।

    वास्तव में, मैंग्रोव ऐसी पादप प्रजातियों का एक अनूठा समूह होता है, जो विभिन्न अनुकूल तंत्रों के माध्यम से उच्च स्तर की लवणता से बचे रहते हैं।मैंग्रोव, तटीय क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण आर्थिकसंसाधन हैं और पारिस्थितिक तंत्र में भी इनकी महती भूमिका है। ये समुद्री और स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र के बीच एक कड़ी का निर्माण करते हैंतटरेखाओं की रक्षा करते हैंऔर विभिन्न प्रकार के स्थलीय जीवों के लिए आवास प्रदान करते हैं।

    एविसेनिया मरीना - एक लवण सहिष्णु मैंग्रोव प्रजाति


    एविसेनिया मरीना भारत में सभी मैंग्रोव संरचनाओं में पायी जाने वाली प्रमुख मैंग्रोव प्रजातियों में से एक है। यह एक लवण-स्रावित और असाधारण रूप से लवणता को सहन करने में सक्षम मैंग्रोव प्रजाति है, जो 75% समुद्री जल में भी बेहतर रूप से बढ़ती है,  और >250% समुद्री जल को सहन कर सकती है। यह दुर्लभ पौधों की प्रजातियों में शामिल हैजो जड़ों में लवण के प्रवेश को बाहर करने की असाधारण क्षमता के अलावा लवण ग्रंथियों के माध्यम से 40% लवणों का उत्सर्जन भी कर सकती है।

    शोधकर्ताओं को अपने अध्ययन में 31 गुणसूत्रों में अनुमानित 462.7 एमबी ए. मरीना जीनोम के 456.6 एमबी (98.7% जीनोम कवरेज) के संयोजन की जानकारी मिली है। अंतराल में जीनोम का प्रतिशत 0.26% थाजिससे यह एक उच्च-स्तरीय संयोजन बताया जा रहा है। एमबी, डीएनए के टुकड़े की लंबाई की इकाई होती है। इस अध्ययन में एकत्रित ए. मरीना जीनोम लगभग पूर्ण हो चुका है, और इसे किसी भी मैंग्रोव प्रजाति के लिए अब तक रिपोर्ट किए गए विश्व स्तर पर और भारत से पहली रिपोर्ट के तौर पर संदर्भ-ग्रेड जीनोम के रूप में माना जा सकता है।यह अध्ययन शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस बायोलॉजी में प्रकाशित किया गया है।

    मैंग्रोव प्रजाति में लवण ग्रंथियां

    इस अध्ययन में, नवीनतम जीनोम अनुक्रमण और संयोजन तकनीकों का उपयोग किया गया है, और 31,477 प्रोटीन-कोडिंग जीन और एक "सैलिनोम" की पहचान की गई हैजिसमें 3246 लवणता-प्रतिक्रियाशील जीन और 614 प्रयोगात्मक रूप से मान्य लवणता सहिष्णुता जीन के होमोलॉग शामिल हैं। अध्ययन में, 614 जीनों की पहचान की गई हैजिसमें 159 प्रतिलिपि बनाने वाले कारकजो जीन के समरूप हैं, और जिन्हें ट्रांसजेनिक प्रणालियों में लवणता सहिष्णुता के लिए कार्यात्मक रूप से मान्य माना गया था, इसमें शामिल हैं।

    यह अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादकता सीमित पानी की उपलब्धता और मिट्टी एवं पानी के लवणीकरण जैसे अजैविक दबाव कारकों के कारण प्रभावित होती है। शुष्क क्षेत्रों में फसल उत्पादन के लिए पानी की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण चुनौती हैजो दुनिया के कुल भूमि क्षेत्र का लगभग 40 प्रतिशत है।

    विश्व स्तर पर लवणता करीब 900 मिलियन हेक्टेयर (भारत में अनुमानित 6.73 मिलियन हेक्टेयर) हैऔर इससे 27 बिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक नुकसान होने का अनुमान है। अध्ययन में उत्पन्न जीनोमिक संसाधन तटीय क्षेत्र की महत्वपूर्ण फसल प्रजातियों की सूखी और लवणता सहिष्णु किस्मों के विकास के लिए पहचाने गए जीन की क्षमता का अध्ययन करने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैंजो भारत के 7516 किलोमीटर लंबेसमुद्री तट और दो प्रमुख द्वीपों की व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।

    INA NEWS(Initiate News Agency)

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