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    चन्द्रशेखर, भारतीय राजनीति की खुली किताब...

    चन्द्रशेखर, भारतीय राजनीति की खुली किताब...

    पूर्व प्रधानमंत्री जननायक चन्द्रशेखर जी की चौदहवीं पुण्यतिथि पर विशेष-

    आ गयी 8 जुलाई श्रद्धेय चन्द्रशेखर जी का चौदहवाँ निर्वाण दिवस, आज ही के दिन सन् 2007 में इस महा मनीषी का हुआ था महा प्रयाण। आज उनकी याद हमारे जैसे उनके समर्थकों, प्रशंसकों तथा राजनैतिक विश्लेषकों के मानस पटल पर उभर आना स्वभाविक है। उनके द्वारा भारतीय राजनीति में स्थापित नैतिक आयाम, निष्पक्ष तथा निस्पृह मानवतावादी विचारों की अनुगूँज भारत के राजनैतिक क्षितिज पर आज भी गुंजायमान हो रही है।

    उनके जीवन काल में राष्ट्र के कोने कोने में फैले उनके प्रशंसकों को उनके जन्म दिवस 17 अप्रैल का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहा करता था। श्रद्धेय चन्द्रशेखर का सानिध्य पाकर उनके चेहरे पर जो प्रसन्नता दिखाई पड़ती थी उससे लगता था कि चन्द्रशेखर जी दिलों पर राज करना जानते थे और वे षदिल के राजा भी थे। आज भी हम उनको इसी भावना से याद करते हैं। पर अब उसमें उनके पुण्यतिथि की एक तारीख 8  जुलाई  और जुड़ गई। जब हम उनके समाधि, स्मृति प्रतीकों तथा उनकी तस्वीर पर फूल मालाएं चढ़ाकर उनके कृतित्व तथा व्यक्तित्व का स्मरण करते हैं। आज पूरे देश में फैले हम साथियों में से अधिकांश में भोंडसी आने का वह उत्साह नही रहता है| जो उनके जीवन काल में रहता था वे अपने अपने यहां ही इस परम्परा का निर्वाह कर सन्तुष्ट हो लेते हैं।

    गंगा-सरयू के पावन जल से अभिसिंचित उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के इब्राहीम पट्टी गांव की पावन गरिमामय उदार माटी में एक साधारण किसान बाबू सदानन्द सिंह के घर माँ द्रौपदी की कोख से बालक चन्द्रशेखर ने जन्म लिया। ऐसा लगता है कि चन्द्रशेखर जी को अपने बचपन में ही सामाजिक विकृतियों, शोषण, ऊँच-नीच की भावना तथा गरीबी का अति निकटता से साक्षात्कार हुआ। उनमें तात्कालिक-सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था के प्रति विद्रोही तेवर का आगाज हो गया। छात्र जीवन में आचार्य नरेन्द्र देव, लोक नायक जयप्रकाश नारायन जैसे समाजवादी मनीषियों से घनिष्ठता ने उन्हें समाजवादी समाज के रचना हेतु अपना सारा जीवन अर्पित करने की प्रेरणा दी।

    उन्होंने अपना सारा जीवन पूर्णकालिक समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में समाजवादी आन्दोलन को समर्पित कर दिया तथा अपने जीवन के 64वें साल यानी 1990 के 10 नवम्बर को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

     चन्द्रशेखर एक निराले व्यक्तित्व के स्वामी थे। यह निराला व्यक्तित्व उन्होंने अपने दृढ़ संकल्प, विचारों के प्रति प्रतिबद्धता, उसके अनुसार निर्णय लेने की प्रबल क्षमता, परिणाम की चिन्ता किये बगैर अपने तय रास्ते पर चलते रहने का साहस जैसे सद्गुणों के माध्यम से निर्मित किया था। उनका सारा जीवन ही प्रेरक प्रसंगों, साहसिक फैसलों, वैचारिक संघर्ष की कहानियों से परिपूर्ण है। वे वर्तमान पीढ़ी के लिये शिक्षण हेतु एक खुली किताब हैं। उनको पढ़ना, उनको समझना तथा साहस बटोर कर उनके रास्ते पर चलने का प्रयास करना ही आज की अपरिहार्य आवश्यकता है तथा उनके लिये सबसे बड़ी श्रद्धाजंलि है।

            चन्द्रशेखर जनमानस की पीड़ा, बेबसी, गरीबी, असमानता, शोषण, अमानवीय व्यवहार तथा समाज के अन्य बुनियादी समस्याओं को लेकर हमेशा व्यग्र तथा चिंतनशील रहे। इस अति संवेदनशीलता, व्यग्रता तथा विद्रोही उग्र तेवर का कारण सिर्फ और सिर्फ यह था कि-

    उन्होंने इन समस्याओं का केवल साक्षात्कार ही नही किया था, इनके प्रभावों को भुगता भी था।

            जहां तक मेरा अनुभव है चन्द्रशेखर अपने स्वाभिमान के प्रति अति संवेदनशील व्यक्ति थे साथ ही वे दूसरे के स्वाभिमान का भी उतना ही ख्याल रखते थे। मेरे ख्याल से यह उनका जन्मजात गुण था तथा स्वाभिमान पर आघात उनको कतई बरदाश्त नही था वे उसका तुरन्त प्रतिकार बिना यह विचार किये करते थे कि आघात करने वाला व्यक्ति कौन है।

            चन्द्रशेखर जी की संसदीय राजनीति में गहरी आस्था थी। लोकतांत्रिक पद्धति को वे समस्याओं के समाधान का सबसे अच्छा माध्यम मानते थे। राजसत्ता उनका अभीष्ट कभी नही रहा, उनके लिये सत्ता मंजिल तक पहुंचने का पड़ाव मात्र थी।

            आलोचना तथा अलोकप्रिय होने का भय कभी उनको अपने विचार प्रकट करने से रोक न सका तथा जनसमर्थन की लालसा मात्र कभी उनको अपना मन्तव्य प्रकट करने के लिये प्रेरित न कर सकी। वे एक बेलौस, बेबाक वक्ता थे।

            यही कारण था सम सामयिक समस्याओं के सन्दर्भ में उनके द्वारा प्रकट किये गये तर्कोचित विचारों एवं गम्भीर परिस्थितियों में समय-समय पर उनके द्वारा लिये गये राजनैतिक निर्णयों ने उनको एक निस्पृह, प्रतिबद्ध, दृढ़ संकल्पित, निर्विवाद राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित कर दिया और आज भी वे स्थापित हैं। क्योंकि उनकी राजनैतिक यात्रा औरों से एकदम भिन्न थी।

                   चन्द्रशेखर जी के राजनैतिक जीवन सबसे महत्वपूर्ण लोक प्रिय पड़ाव उनके द्वारा की गयी पद यात्रा थी जो बाद में भारत यात्रा के नाम से विख्यात हुई। यह पद यात्रा गांधी मण्डपम् कन्या कुमारी से 6 जनवरी 1983 को प्रारंभ हुई तथा तामिल नाडु,केरल,कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश को पार करके 4260 किलो मीटर की दूरी तय करते हुए पांच महीने बीस दिन लगातार चलती रही। अंत में  25 जून 1983 को गांधी समाधि राज घाट नई दिल्ली पहुँची।

    जहाँ तक मै समझता हूँ, चन्द्रशेखर जी की यह मान्यता थी कि भारत की समस्या यह नहीं है कि यहां कि आम जनता शोषण तथा अन्याय और कुप्रबंधन का शिकार हैं और सामाजिक भेदभाव के चलते अमानवीय व्यवहार सहने के लिये मजबूर है|

    बल्कि असल समस्या यह है कि उसको इन दुरूह परिस्थितियों का एहसास ही नहीं है ऐसी समस्याओं को मानवीकृत न मानकर ईश्वर की देन मान कर संतोष कर लेने की प्रवृत्ति उसके अंतर्मन में घर कर गयी है तथा दूसरी मान्यता यह थी कि जब समस्याओं का समाधान ढूढना एक दम कठिन हो जाये तो सीधे जनता के बीच जाकर खोजना चाहिये। इन्हीं आस्थाओं ने उन्हें केरल से आये श्री एन. जे. एंटनी तथा राज मोहन जैसे दो नौजवान दोस्तों की भारत पद यात्रा करने के सुझाव पर गम्भीरता से विचार करने के लिए प्रेरित कर दिया और अंततः तमाम अंतर्विरोधों के वावजूद उन्होने पद यात्रा करने का फैसला कर लिया।

     उस समय मै उत्तर प्रदेश जनता पार्टी के महामंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहा था और मैने स्वयं निर्णय लेकर उत्तर प्रदेश के अधिकांश जनपदों का सायकिल यात्रा के जरिये भ्रमण कर पार्टी संगठन को मजबूत करने का काम कर रहा था। जिसकी सूचना समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के माध्यम से अध्यक्ष जी को यानी चन्द्रशेखर जी को मिलती रहती थी, तब तक मेरी कोई बहुत घनिष्ठ परिचय अध्यक्ष जी से नहीं था फिर भी उन्होने मुझे दिल्ली बुलाया और पद यात्रा में चलने का निमंत्रण दिया जो मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया और साथी ब्रह्म दत्त गौड़ को लेकर कन्याकुमारी रवाना हो गया। 6 जनवरी 1983 को गांधी मण्डपम् कन्या कुमारी से भाई वैद्य पूर्व गृह मंत्री महाराष्ट्र सरकार , सुधीन्द्र भदौरिया, ब्रह्म दत्त गौड, बच्चा राय,उमेश चतुर्वेदी  धुरेन्धर प्रसाद तथा एन. बाल सुब्रमण्यम, के.राजेन्द्रन्, मोहन बाल सुब्रमण्यम, सभापति जैसे सैकड़ों दक्षिण भारतीय साथियों के साथ चन्द्रशेखर जी की अगुवाई में  पद यात्रा की शुरूआत हो गयी। हजारों जन सभाओं को संबोधित करते हुए करोड़ो देश वासियों से सम्पर्क साधते हुए उनकी बोली, वाणी, रहन-सहन तथा संस्कृति उनकी वास्तविक समस्याओं का परिचय लेते हुए हम साथी नई दिल्ली पहुंचे। पद यात्रा की विशेषता यह थी कि इस पद यात्रा का नेतृत्व जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चन्द्रशेखर जी कर रहे थे और स्वागत सभी राजनैतिक दल सामाजिक संस्थाये तथा आम जन कर रहे थे, हजारो लोग पद यात्रा में जगह-जगह साथ देकर हमारा उत्साह वर्धन कर रहे थे। पद यात्रा प्रारंभ होने के दो चार दिन ही बीते थे कि कर्नाटक विधान सभा के चुनाव का नतीजा आ गया और कर्नाटक में जनता रंगा गठबंधन की सरकार राम कृष्ण हेगडे के नेतृत्व में बन गयी।

      अंततः पद यात्रा से यह निष्कर्ष निकल कर आया कि यदि हम भारत के समस्त नागरिकों के लिए शिक्षा की,पीने के लिये स्वच्छ पानी की, बच्चो तथा गर्भवती महिलाओं को कुपोषण से बचाव की व्यवस्था के साथ सांप्रदायिक सद्भाव तथा हरिजन और आदिवासियों को मानवीय मर्यादा के साथ जीवन जीने का वातावरण निर्मित कर सके तो हम  नये भारत के निर्माण की दिशा कुछ कदम आगे बढ़ सकते हैं। यह पंच संकल्प लगते तो अति साधारण है पर बाद में इन्ही मुद्दों पर राष्ट्र का ध्यान आकर्षित करने में हमे सफलता मिली।

    इन्ही पांच संकल्पों की घोषणा के साथ भारत यात्रा ट्रस्ट की स्थापना कर इस यात्रा की निरंतरता बनाये रखने का प्रयास हम सभी साथी आज भी  कर रहे हैं। भारत यात्रा ट्रस्ट मे सर्व श्री एस एम जोशी ( महा राष्ट्र), राम कृष्ण हेगडे ( मुख्यमंत्री कर्नाटक सरकार) ,ओमप्रकाश श्रीवास्तव जी, बेनी प्रसाद माधव जी,सुधीन्द्र भदौरिया, वी एल शंकर (कर्नाटक )विजय राघवन् (तामिल नाडु), अयूब साहब (विहार), सुश्री रोजलीन पंजीकरण, (केरल),के साथ मै भी एक ट्रस्टी मनो नीत किया गया जिसके अध्यक्ष श्रद्धेय चन्द्रशेखर जी बने।

    भारत यात्रा केन्द्र यात्रालयम्  भुवनेश्वरी (भोंडसी)देव ग्राम पयाग पुर बहराइच,  जय प्रकाश पट्टण परंदवाडी पूना, शेवराय हिल एयरकाड सेलम (तामिल नाडु)अगली केरल पृथ्वी पुर टीकमगढ़ मध्य प्रदेश के केन्द्रो पर ऐसा ही विनम्र प्रयास आज भी चल रहा है। 

          उनके राजनैतिक जीवन का अहम मोड़ तब आया जब योजना आयोग को सर्वदलीय सर्वानुमति से गठित किये जाने की समाजवादियों द्वारा सन 1950 की  कि गयी मांग को मानते हुए सन 1963 में जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने वरिष्ठ समाजवादी नेता श्री अशोक मेहता को योजना आयोग का उपाध्यक्ष मनोनीत किया तो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने उनको पार्टी से बहिष्कृत कर दिया। चन्द्रशेखर ने इसका खुला सैद्धांतिक विरोध किया तथा पार्टी की राष्ट्रीय कार्य समिति से त्याग-पत्र दे दिया। बाद में वे भी पार्टी से निकाल दिये गये तथा कांग्रेस पार्टी में सम्मिलित हो गये।

            कांग्रेस में शामिल होने के ततपश्चात उन्होंने संवाद के दौरान श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके प्रशनों का जवाब देते हुए कहा कि मैं कांग्रेस को समाजवादी बनाने का प्रयास करूंगा। यदि नही बनी तो इसे तोड़ने का प्रयास करूंगा। श्रीमती इंदिरा गांधी उनके इस बेबाक विचार को सुनकर विस्मित नेत्रों से उन्हें निहारती रह गयी।

            अपने संसदीय जीवन के प्रारम्भिक काल में ही उन्होंने प्रताप सिंह कैरो से सम्बन्धित एक कमेटी की रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखने की मांग की तथा देश के सर्वमान्य नेता देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू द्वारा उसे पार्टी का मामला बताते हुए पटल पर न रखने की मजबूरी जाहिर की तो चन्द्रशेखर ने उन पर गलत बयानी का आरोप लगाकर संसद को गुमराह करने का आरोप जड़ दिया। बाद में पंडित जी ने यह कहते हुए सफाई दी कि मैं अपने नवजवान दोस्त को बताना चाहता हूँ कि मैं स्मृति के आधार पर बोल रहा था मैंने जानबूझकर गलत बयानी नही की है, फिर मामला समाप्त कर दिया गया।

            कतिपय कारणों से श्री मोरार जी देसाई के बारे में चन्द्रशेखर जी की राय अच्छी नही थी। लोक नायक जय प्रकाश नारायन के प्रयास से मोरार जी देसाई जनता पार्टी के सर्वसम्मत नेता चुने गये तथा देश के प्रधानमंत्री बने। जे0पी0 चाहते थे कि चन्द्रशेखर मोरार जी के मंत्रिमण्डल में सम्मिलित हों, चन्द्रशेखर जी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नही किया। जय प्रकाश जी के द्वारा कारण पूछने पर उन्होंने कहा कि अगर किसी के विचारों से किसी की सहमति न हो तो उसको उसके मंत्रिमण्डल में शामिल नही होना चाहिए। इसमें न तो नैतिकता है और न ही ईमानदारी और यही एक ऐसी उनकी मान्यता थी जिसके चलते वे श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री मोरार जी देसाई तथा विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे प्रधानमंत्रियों के मंत्रिमण्डल में शामिल नही हुए।

            मैं स्वयं साक्षी हूँ जब प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह शपथ ग्रहण करने के दूसरे दिन चौ0 देवी लाल जी को चन्द्रशेखर जी के पास मंत्रिमण्डल में सम्मिलित होने का निवेदन लेकर, भारत यात्रा केन्द्र भोंडसी भेजा, चन्द्रशेखर ने उनके प्रस्ताव पर असहमति व्यक्त करते हुए यही तर्क दिया था।

            चन्द्रशेखर की सलाह को दरकिनार कर तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकनायक जय प्रकाश नारायन से सम्वाद करने के बजाय आपातकाल लगाना ज्यादा उचित समझा साथ ही अपने वरिष्ठतम साथी चन्द्रशेखर को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। यह घटना स्वयं सिद्ध करती है कि चन्द्रशेखर को अपने बीच रखकर वे अपने तरीके से सरकार नही चला पायेगी इसी डर से उनको गिरफ्तार करने का निर्णय लेना पड़ा। चन्द्रशेखर उनके रास्ते पर चलने को तैयार नहीं थे नतीजा जो हुआ सर्वविदित है। चन्द्रशेखर जी ने काली कोठरी में जीवन बिताना पसन्द किया, पर अपनी मान्यताओं से समझौता नही किया।

            1990 में भारत विषम परिस्थितियों के दौर से गुजर रहा था। श्री वी0पी0 सिंह की सरकार गिर चुकी थी। पूरे देश में जातीय विद्वेष, दंगा-फसाद, घृणा का वातावरण व्याप्त था। राष्ट्रपति महोदय ने कम से कम एक साल तक सरकार चलाने के आश्वासन के साथ दिये गये कांग्रेस के समर्थन से चन्द्रशेखर के नेतृत्व में सरकार का गठन किया। पहले दिन से ही कांग्रेस की बैशाखी पर टिकी चन्द्रशेखर सरकार के निर्णय लेने की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया। लेकिन मात्र चार महीने में ही सरकार की सक्रियता, नीतिगत फैसले लेने की क्षमता ने ब्रिटेन के एक समाचार पत्र को यह लिखने के लिये मजबूर कर दिया कि चन्द्रशेखर की सरकार ने उसके बारे में किये गये सारे राजनैतिक कयासों को गलत सिद्ध कर दिया है। वह पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार की तरह ही नीतिगत फैसले लेने में सक्षम है और ले रही है।

            घबराई कांग्रेस ने हरियाणा पुलिस के सिपाहियों पर जासूसी करने का मामूली आरोप लगाकर संसद का बहिष्कार कर दिया। उन्हें अपेक्षा थी कि चन्द्रशेखर उनकी शर्तें मानकर समझौता करेंगे और उनकी सरकार एक कठपुतली सरकार की तरह काम करती रहेगी। चन्द्रशेखर जी ने गलत शर्तों को मानकर सरकार चलाने के बजाय त्यागपत्र देना ज्यादा उचित समझा और त्यागपत्र दे दिया।

            वर्तमान में राजनीति को तात्कालिकता से जोड़ दिया गया है। कुछ ऐसे लोग हैं जो राजनीति में आ गये हैं जिन्हें आज के अलावा कल दिखाई नही पड़ता। उनका मानना था कि राजनीति केवल आज के लिये नही होती यह भविष्य के लिये होती है आज की राजनीति कल के निर्माण की भूमिका है। कल के निर्माण की भूमिका बनाकर वे 8 जुलाई 2007 को हमारे बीच से चले गये आज वे सशरीर हमारे पास नहीं हैं, पर उनके विचार हमेशा हमको राजनीति की सुचिता के प्रति सचेत करते रहेंगे और हम सचेत रहें यही वर्तमान की अपेक्षा है।

    नोट - लेखक भारत यात्रा ट्रस्ट के ट्रस्टी वरिष्ठ समाजवादी एवं चन्द्रशेखर जी के भारत यात्रा के सह पदयात्री रहे हैं।

    लेखक- सूर्यकुमार

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