Header Ads

  • INA BREAKING NEWS

    30 मई 1866 को हुई थी दारुल उलूम देवबंद की स्थापना

    30 मई 1866 को हुई थी दारुल उलूम देवबंद की स्थापना

    आज दारुल उलूम को हुए 155 साल, इसलामिक विश्व विख्यात संस्था का इतिहास और उसकी बेमिसाल खिदमात

    देवबंद/सहारनपुर उत्तरप्रदेश : आज से लगभग 150वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के जनपद सहारनपुर के कस्बा देवबंद में एक छोटे से मदरसे से शुरू हुआ दीनी इदारा आज  दारुल उलूम देवबंद के नाम से विश्व में अपनी एक पहचान रखता हे जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इस्लामी तालीम के लिए पूरी दुनिया में अपना परचम बुलंद कर रहे इस प्रसिद्ध इदारे की स्थापना 30 मई वर्ष 1866 में हुई।

    करीब 150 वर्षों से दुनिया भर को दीन व इस्लाम की तालीम की रोशनी से सराबोर कर रहे दारुल उलूम देवबंद की स्थापना दिवंगत हज़रत हाजी आबिद हुसैन व मौलाना कासिम नानौतवी ने छत्ता वाली मस्जिद में स्थित एक अनार के छोटे से पेड़ के नीचे मदरसा इस्लामी अरबी की बुनियाद रखी। इस छोटे से मदरसे ने वट वृक्ष का रूप धारण किया और अब पूरा विश्व इस संस्था को दारुल उलूम देवबंद के नाम से जानता है। इस मदरसे के कारण यहां से प्रमुख इस्लामिक देवबंदी विचारधारा का प्रवाह हुआ। दारुल उलूम की स्थापना में मौलाना रफीउद्दीन, मौलाना जुल्फकार और मौलाना फजलुर्रहमान उस्मानी की विचार धारा भी प्रमुख रूप से शामिल थी।

    ******

    दारुल उलूम का देश की आजादी में है अहम योगदान...

    दारुल उलूम देवबंद धार्मिक शिक्षण संस्था होने के साथ साथ अपने गर्भ में देश की आजादी की लंबी मुहिम भी संजोए है। शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन, मौलाना हुसैन अहमद मदनी मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी सहित सैकड़ों ऐसे उलेमा है। जिन्होंने देश की जंगे आजादी में अहम रोल अदा किया।

    ******

    शेखुल हिंद महमूदुल हसन और उनकी रेशमी रुमाल तहरीक...

    देश की आजादी की लड़ाई में विश्व प्रसिद्ध इस्लामिक संस्था दारुल उलूम देवबंद व उलेमा की आजादी की लड़ाई में दी गई कुर्बानियों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। दारुल उलूम के प्रथम छात्र मौलाना महमूदुल हसन ने रेशमी रुमाल तहरीक चलाकर आजादी की लड़ाई को नई धार दी।

    ******

    दारुल उलूम की स्थापना क्यों की गई...

    दारुल उलूम के प्रथम उस्ताज़ मुल्ला महमूद और प्रथम शागिर्द मौलाना महमूद हसन देवबन्दी थे जो बाद में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, रेशमी रुमाल आंदोलन के प्रमुख संचालक और हज़रत शैख़ उल हिन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए। दारुल उलूम की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य इस्लाम धर्म की शिक्षा के साथ-साथ,अंग्रेजों के विरुद्ध लामबंदी,देशभक्ति,एकता,भाई चारे का सन्देश भी देशवासियों को दिया। दारुल उलूम ने निःशुल्क शिक्षा, निशुल्क आवास, निशुल्क भोजन, छात्रवर्ती, निशुल्क लिहाफ, मिट्टी तेल, चीनी, रात्रि शिक्षा, आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराई। जिसको आज वर्ल्ड बैंक जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं गर्व के साथ चला रही हैं।

    शिबली इक़बाल, देवबंद/सहारनपुर उत्तरप्रदेश
    INA NEWS(Initiate News Agency)

    Post Top Ad


    Post Bottom Ad


    Blogger द्वारा संचालित.