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    देवबंद: कुरआन पाक सुनाना अल्लाह की इबादत और इबादत की कोई कीमत नहीं होती: मुफ्ती असद कासमी

    देवबंद: पवित्र रमजान माह की तरावीह में रकम तय करके कुरआन पाक सुनाना जायज नहीं है। उलमा का कहना है कि जो हाफिज इस तरह का मामला करते हैं वो गुनाह में शामिल होते हैं। क्योंकि कुरआन सुनाना एक इबादत है और इबादत की कोई कीमत नहीं होती।


    मंगलवार को मुफ्ती असद कासमी ने कहा कि तरावीह में कुरआन सुनाने के नाम पर पैसे देने और लेने वाला दोनों ही अल्लाह के नजदीक बड़े मुजरिम होते हैं। साथ ही उनका यह अमल नाजायज है। उन्होंने कहा कि कुरआन सुनाने वाले हाफिज को ईद मनाने के लिए कुछ दिया जा सकता है। लेकिन नीयत में यह न हो कि वह हाफिज को कुरआन सुनाने के नाम पर पैसे या कपड़ा दे रहे हैं। मुफ्ती असद कासमी ने कहा कि कुरआन के नाम पर लेनदेन तय करना सरासर नाजायज है। क्योंकि कुरआन एक इबादत है और इबादत की कोई कीमत नहीं होती। बता दें कि पवित्र रमजान के महीने में लोग मसजिदो घरों और प्रतिष्ठानों पर तरावीह का इंतजाम करते हैं। जिसमें कुरआन पाक सुनाने के लिए एक हाफिज रखा जाता है। जो सुविधा के मुताबिक १०, १५ या २८ दिन में कुरआन पाक पूरा करता है। कुरआन पाक सुनना रमजान माह का एक बड़ा हिस्सा है। लेकिन कुछ जगहों पर देखने में आया है कि लोग कुरआन पाक सुनाने के लिए हाफिज से रकम तय कर लेते हैं या फिर कहीं बाहर जाने के लिए हाफिज स्वयं पैसे की बात तय कर लेता है। उलमा ने इस अमल को नाजायज ठहराया है। 



    शिब्ली इक़बाल 

    आईएनए न्यूज़ एजेंसी, देवबंद 

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