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    इंसानियत हुई खत्म, शहर बने श्मशान, पैसों के लालच में अंधा हुआ इंसान,

    इंसानियत हुई खत्म, शहर बने श्मशान, पैसों के लालच में अंधा हुआ इंसान,

    आपदा में अवसर ढूंढ रहे मानवरूपी शैतान, जब मरना हुआ मुश्किल तो क्या  जीना है आसान।

    कोरोना जैसी भीषण महामारी में भी अपनी इंसानियत बेंचकर खा चुके मानवरूपी शैतानों को श्रद्धांजलि देने का वक़्त आ गया है क्योंकि इंसान उनमें अब जीवित रहा नहीं तो उसे मानवीय संवेदनाओं से रहित मरा हुआ ही समझना चाहिए और प्राणरहित लिबास को हमारा समाज श्रद्धांजलि ही देता है। आज की जो भी स्थितियां हैं, उसके लिए लोग एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने में लगे हुए हैं। जबकि सच यह है कि देश की इस दुर्दशा के लिए हर कोई जिम्मेदार है। किसी की थोड़ी लापरवाही रही तो किसी की ज्यादा लेकिन लापरवाही इस समाज के हर तबके के लोगों द्वारा की गई। हमने पेड़ काटे, वनों को उजाड़ा। पशुओं का जीना दूभर कर दिया, नॉन-वेज खाकर अपनी शहंशाही दिखाने की जुगत खूब की। कुल मिलाकर प्रकृति को चैलेंज करने व उसे उजाड़ने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी और अब जब प्रकृति हमें पलटकर वह दे रही है, जो हमने अभी तक बोया है तो हम खून के आंसू रोने पर मजबूर हो गए। हां, ये बात अलग है कि किया किसी और ने जबकि उसे भुगतना सभी को पड़ रहा है। कुल मिलाकर इस समय प्रकृति पूर्ण रूप से विध्वंसक रूप ले चुकी है। प्रकृति का एक तमाचा भी इस संसार से झेला नहीं जा रहा है। हमने पेड़ काटकर स्वयं अपने संसार में ऑक्सीजन कम कर ली। अगर आज पृथ्वी पर पेड़ों का कटान न किया गया होता तो शायद वातावरण इतना प्रदूषित न होता, जितना कि आज है। 

    दूसरी तरफ, किसी की मजबूरी को अपना धंधा बना लेने वाले लोगों के भीतर का इंसान मर चुका है। 300 की दवाई 4000 में दी जा रही है। आक्सीजन सिलेंडर्स की कालाबाजारी की जा रही है और भी कई प्रकार से अमानवीय कार्य किये जा रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण है- हर जगह हर क्लीनिक/अस्पताल में बैठने वाले डॉक्टर का कोई न कोई मेडिकल स्टोर बंधा रहता है। वह वही दवाई लिखेगा, जो उसी मेडिकल पर मिलेगी। अब उसे उसमें कमीशन चाहिए तो दवाई तो मंहगी मिलेगी। अब इस समय तो मजबूरी में व्यक्ति कुछ भी करके दवाई तो लेगा ही, तो इसीलिए उससे मनमाने रुपए लिए जा रहे हैं। हालांकि हर स्टोर पर ऐसा नहीं है लेकिन अधिकांश ऐसा ही है। दूसरों को नियम तोड़ता देख उन्हें ज्ञान देने वाले, घर में बैठकर रामराज्य का सपना देखने वाले खुद ही राक्षस बने बैठे हैं। उन्हें तो बस मजबूरों को लूटकर अपनी तिजोरी भरनी है बस। भले ही वो उसे खर्च न कर पाएं। आजकल का यह ट्रेंड बन गया है कि येन केन प्रकारेण अपनी तिजोरी भरना।

    फेसबुक, व्हाट्सअप, ट्विटर पर इन जैसे लोगों का प्रतिकार करने वालों को जमीनी स्तर पर इनका विरोध करने की जरूरत है। फेसबुक पर दो शब्द लिखकर विरोध जता लेने से कोई बदलाव नहीं आने वाला। आजकल सोशल मीडिया की ताकत सबसे बड़ी है लेकिन तब, जब उसका सही दिशा में उपयोग किया जाए। जो लोग सस्ती चीजों को ज्यादा दामों में बेंचकर हमें लूट रहे हैं, ऐसे लोगों को तिलांजलि देने का वक़्त आ गया है। जरूरत है कि ऐसे लोगों से हम दवाई लेना छोड़ दें। किराने का सामान लेना छोड़ दें। ऐसी हर दुकान से सामान लेना छोड़ दें, जहां अधिक दाम में सामान मिलता है। हम एक ठेले पर सब्जी बेचने वाले से बीस तरह की बहस करके उससे 5 रुपए कम कराकर भी खुद को बहुत चालाक समझते हैं लेकिन असल में हम मूर्ख हैं। बड़ी दुकानों पर बहस करनी तो हमें आती नहीं क्योंकि हम खुद लुटवाने में ही खुश होते हैं। चलो हम ज्यादा दाम देने में समर्थ हैं तो दे देते हैं लेकिन जरा सोंचिए कि आपकी वजह से उन्हें भी ज्यादा दाम कर्ज लेकर देना पड़ता है, जो 150-200 रुपये रोज का कमा पाते हैं। इसमें दोष हम सबका है, किसी एक का नहीं। हम खुद ऐसे लोगों को प्रमोट कर रहे हैं। फेसबुक पर एक गरीब को अमीर होता देखकर हमारी आंखों से आंसू आ जाते हैं, हम बड़ा फक्र महसूस करते हैं और जब हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति घूमता नजर आता है तो हमें उसकी सहायता करने में अपनी बेइज्जती महसूस होती है। क्या ये भाव, संवेदनाएं सिर्फ वर्चुअल ही रह गयी हैं, एक्चुअल में कुछ नहीं। अगर ऐसा रहा तो धीरे-धीरे सिर्फ वर्चुअल दुनिया ही रह जायेगी। एक्चुअल दुनिया खत्म। कुछ लोग इन शब्दों को पढ़कर अपनी भौहें सिकोड़ेंगे और इसे इग्नोर कर देंगे। लेकिन कल आपके साथ भी ऐसा हो सकता है इसलिए यदि मजलूमों का सपोर्ट न करें तो कम से कम देश को बेंचकर खाने वाले लोगों को प्रमोट भी न करें।आप व्यवहार निभा रहे हैं और वो हम सबको बेंचकर खाए जा रहा है। क्या हम ऐसे लोगों का साथ देंगे। फैसला आप खुद लें और एक लंबी सांस लेकर इस विषय ओर अवश्य विचार करें।

    विजय लक्ष्मी सिंह
    एडिटर इन चीफ
    आईएनए न्यूज़ एजेंसी  

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