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    महिला दिवस:- मिशन शक्ति को सार्थक बनाने में दें योगदान

    महिला दिवस पर विशेष...
    आजकल की स्थितियां बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण हैं। चेतना का मतलब है- मिट्टी के इस पुतले में मानवीय चेतनाओं का जागृत होना। सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि हम महामानव बनने की चाहत में अक्सर मानव यानी की एक अच्छा इंसान बनना भूल जाते हैं। हम बड़े बड़े मंचों पर जाएंगे, उद्बोधन देंगे लेकिन उन सब चीजों को खुद में नहीं उतारेंगे। माफ करें, मैं थोड़ा खुलकर बोलने का आदी हूं। आज एक महिला से जुड़े हर मिशन को चलाने से पहले हमें इस पर ध्यान देना चाहिए कि हमें महिलाओं के सम्मान को बरकरार रखने के मिशन को चलाने की जरूरत क्यों पड़ी। आखिर ऐसा कौन सा गंदा बीज आज की नस्ल में रोपित किया जा रहा है कि गांव गांव, शहर शहर, प्रदेश प्रदेश यहां तक कि पूरे देश में हमें महिलाओं के सम्मान को बचाने के लिए आज यह लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
           
    कारण तो इसके कई हैं लेकिन निवारण शायद कुछ भी नहीं। हम अगर शुरुआत खुद से करें तो काफी हद तक इसमें सफलता हासिल कर सकते हैं।

    सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक हम महिलाओं का कितना सम्मान करते हैं। यह खुद से बेहतर कोई नहीं जानता। हम घर में अपनी बहन-बीबी और मां को भले ही दिन भर में 20 बातें सुनाते हों, गालियां देते हों और मारते पीटते हों लेकिन घर के बाहर हम खुद को ऐसा दिखाएंगे कि हमसे ज्यादा महिलाओं का सम्मान करने वाला कोई नहीं। हम मंच पर खड़े होकर बड़े बड़े भाषण देंगे और लोग तालियां बजाकर खुश होंगे कि सामने वाला कितना अच्छा बोलता है। उसके बाद हम घर जाएंगे, और जब अगली सुबह उठकर नहाएंगे तो पानी की तरह सब अच्छाइयां नाली में बह जाएंगी और हम फिर से एक शैतानी कीड़े बन जाएंगे। अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक नहीं, दो नहीं, हजार नहीं, करोड़ों ऐसे मिशन चला लीजिए लेकिन महिला सम्मान हम वापस कभी नहीं ला पाएंगे। आजकल की पीढ़ी के दिमाग में जो गंदे विचारों का प्रवाह लगातार चलता है, इसकी मूल जड़ यही है।

    हमें अपने घर के भीतर का माहौल बदलना होगा। हम घर के भीतर 42 इंच की डिस्प्ले पर भद्दी पिक्चरें देखेंगे और बाहर आकर महिलाओं के सम्मान की बात करेंगे तो साहब, आप करते रहिए बात। कहीं भी कुछ होने वाला नहीं। सिर्फ वाहवाही लूट लीजिए बस।

    अगर सही अर्थों में हमें महिलाओं का सम्मान वापस दिलाना है तो सुबह से रात तक शेड्यूल, दिमागी सोंच और औरतों को देखने का नजरिया बदलना होगा। घर में औरत से प्रेम से बात करें। सहूलियत से उनकी बात सुनें। अगर वे कुछ गलत भी कहें तो प्यार से उन्हें समझाएं। गंदी फिल्मों के बजाए घर वालों के साथ कुछ अच्छा देखें। अपने बच्चों को टाइम दें और उनमें महिलाओं के प्रति अच्छी सोंच व अच्छे संस्कारों के बीज शुरू से ही डालें। मोबाइल और टीवी पर हो रही अश्लीलता को नकार दें और घर का माहौल बदलें। तब जाकर हम और आप इंसान की चेतना को जगाने में कामयाब हो सकेंगे।
    सौरभ सिंह राजपूत
    समाचार संपादक
    आईएनए न्यूज़ एजेंसी।

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