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    राष्ट्र चिंतन- वंशवाद को दिखाया आईना

    राष्ट्र चिंतन- वंशवाद को दिखाया आईना 

    सोनल मोदी का प्रकरण अखबारों की सुर्खियां क्यो नही बना, न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम का सब्जेक्ट क्यो नहीं बना? अखबारों की सुर्खियां बननी चाहिए थी, न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम का सब्जेक्ट बनना ही चाहिए था। यह कोई साधारण प्रकरण नहीं था, असाधारण प्रकरण था। यह प्रकरण देश के वंशवादी राजनीति और वंशवादी मानसिकता पर सीधा चोट करता है, प्रहार करता है,आईना दिखाता है, प्रेरणा लेने का सबक देता है।काश ऐसी चोट, ऐसा प्रहार, ऐसा आईना , ऐसी प्रेरणा हर राजनीति पार्टी देती तो निश्चित तौर पर देश के अंदर में वंशवादी राजनीति और मानसिकता पर जरूर लगाम लगती, हमारा लोकतंत्र भी स्वच्छ, सुंदर और जनपक्षिय होता, राजनीति पर कुछ वंशवादी घरानों के वर्चस्व से भी मुक्ति मिलती।

                                     आज के वंशवादी राजनीति के वर्चस्व की मानसिकता के दौर में क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी को नगर परिषद का चुनाव लडने से वंचित कर दिया गया। पर आपको विश्वास करना ही होगा। यह सच है।वह भी एक ऐसा सच जो न केवल आश्चर्य करने वाला है बल्कि ऐसा उदाहरण भारतीय राजनीति में और कहा मिलता है। यह उदाहरण किसी और ने नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने दिया है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर वंशवाद और भाई भतीजा वाद पर चाबुक चलाकर भारतीय राजनीति को प्रेरणा दी है।


    सोनल मोदी; फोटो- आईएनए|

                           सोनल मोदी कौन है? उसकी विशेषता क्या है? सोनल मोदी कोई आम मनुष्य की श्रेणी में नहीं आती हैं, वह तो विशेष मनुष्य की श्रेणी में आती है। आखिर वह प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी जो ठहरी। नरेंद्र मोदी के बड़े भाई प्रहलाद मोदी की बेटी है सोनल मोदी। सोनल मोदी की राजनीतिक आकंक्षा बहुत ही छोटी थी, उसकी राजनीतिक उड़ान की इच्छा बहुत ही सीमित थी। वह कोई सांसद, विधायक बनने का सपना भी नहीं देखा था। वह तो नगर निगम का चुनाव लडना चाहती थी, इसके लिए वह लंबे समय से तैयारी भी की थी। सोनल मोदी गुजरात के अहमदाबाद में रहती है इसलिए सोनल मोदी अहमदाबाद नगर परिषद का चुनाव लडना चाहती थी, उसने बीजेपी प्रदेश कमिटी को आवेदन भी दिया था। भाजपा ने सोनल मोदी को नगर परिषद का चुनाव लडने के लिए टिकट नहीं दिया। अगर सोनल मोदी को नगर परिषद का चुनाव लडने का टिकट दे दिया गया होता ती फिर नरेंद्र मोदी का परिवार को राजनीति और सत्ता से दूर रखने की प्रेरक राजनीति का विध्वंस हो जाता, नरेंद्र मोदी पर भी  वंशवाद और भाई भतीजा वाद का आरोप लगता। सोनल मोदी को टिकट से वंचित करने का फैसला प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का ही होगा। नरेंद्र मोदी की स्वीकृति के बिना गुजरात प्रदेश भाजपा की कमिटी इतना बड़ा फैसला और निर्णय के है नहीं सकती है।

                 भारतीय राजनीति की वंशवादी मानसिकता की स्थिति देखिए। मोतीलाल नेहरू ने जो वंशवाद का जहर घोला था वह जहर आज देश की राजनीति और लोकतंत्र  को प्रदूषित कर रहा है, उसके जहर से आम आदमी कराह रहा है, आम आदमी की राजनीति  में सहभागिता सुनिश्चित होने के मार्ग में संकट उत्पन्न हुआ है। मोतीलाल नेहरू की वंशवादी जहर जवाहर लाल नेहरू,इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी ,प्रियंका गांधी के रूप में  लोकतंत्र  को कलंकित और लहूलुहान कर रहा है। मोतीलाल नेहरू की जहर फसल आज पूरी भारतीय राजनीति में लहरा रही है। तथ्य देख लीजिए। लालू का बेटा तेजस्वी यादव, मुलायम का बेटा अखिलेश यादव, प्रकाश सिंह बादल का बेटा सुखबीर सिंह बादल, राजशेखर रेड्डी का बेटा जगन मोहन रेड्डी, देवीलाल का खानदान, करुणानिधि खानदान, शिबू सोरेन खानदान वंशवादी राजनीति के बदबूदार उदाहरण है। क्या इन वनवासी घरानों और पार्टियों को आम आदमी चुनौती देने में सक्षम हो सकता है। क्या कांग्रेस, राजद, सपा, बसपा, अकाली दल, आदि पार्टियों का प्रमुख आम आदमी हो सकता है? इसका उत्तर कदापि नही है।

                           यह भी सही है कि नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी भी वंशवाद का शिकार नहीं है, ऐसा नहीं है। बीजेपी में वंशवादी मानसिकता का असर दिख रहा है। जब हम राजनाथ सिंह, कल्याण सिह, वसुंधरा राजे, रमन सिंह के बेटे विषयक और संसद का टिकट पा जाते है और इनकी राजनीतिक पिता की विरासत और छत्रछाया में चमकने लगती है तब हमे विश्वास हो जाता है कि बीजेपी भी अन्य पार्टियों से अलग नहीं है। पर थोड़ा फ़र्क है। हमे तुलनात्मक तौर पर फर्क करना सीखना चाहिए। बीजेपी का वंशवादी जमात बीजेपी पर उस तरह कब्जा करने में सक्षम नहीं हो सकते है जिस तरह अन्य वंशवादी पार्टियों में वंशवादी लोग कब्जा कर बैठ जाते है। क्या सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, सुखबीर सिंह बादल, जगन मोहन रेड्डी, ओम प्रकाश चौटाला जैसा कोई उदाहरण है? जनसंघ से लेकर भाजपा के इतिहास में कई अध्यक्ष बने और हटे पर उनका वारिस भाजपा पर आधिपत्य स्थापित करने का वावा तक किया है क्या? कम्युनिस्ट पार्टियां भी वंशवाद से मुक्त है पर  उनके अंदर सबसे बड़ी और घटिया बुराई तानाशाही की है जहा लोकतंत्र की कोई उम्मीद ही नहीं होती है।

                निश्चित तौर पर मोदी का परिवार एक आदर्श और प्रेरक परिवार है। प्रधान मंत्री पद की बात छोड़ दीजिए। साधारण विधायक, सांसद बने व्यक्ति का परिवार रातो रात सातवे आसमान पर पहुंच जाता है। चमचमाती गाडियां, आलीशान कोठी सहित सुख सुविधाओं से पूरी तरह लैस हो जाते हैं। धन की बारिश होती है। इनकी अमीरी इतनी ठसक वाली हो जाती है कि फिर गरीब को मुंह चिढ़ाती है। उनके साथ सरकारी और निजी सुरक्षा का घेरा होता है। कहने का अर्थ है कि फिर ऐसे लोग  यका एक आम से खास हो जाते है।

    नरेंद्र मोदी, पीएम भारत; फोटो- आईएनए|

                      तुलनात्मक अध्ययन और तथ्य यह है कि नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री है पर उनका परिवार आज भी आम ही है, साधारण जिंदगी जीते है, तड़क भड़क से दूर है, भारी सुरक्षा से दूर है। इनके भाई और परिवार के कई सदस्य पांच दस हजार की साधारण नौकरी करते हैं। मोदी के परिवार के सदस्य पेट्रोल पंप पर भी नौकरी करने से शर्म महसूस नहीं करते है। प्रधान मंत्री पद का फायदा उठाना भी मोदी परिवार को स्वीकार नहीं है। आजतक ऐसी एक भी खबर नहीं मिली है जिसमें प्रतीत होता है कि मोदी का परिवार किसी गलत काम में लगा हो, अनैतिकता का सहचर हो, या फिर प्रधान मंत्री पद का धौंस किसी को दिखाया हो। सबसे बड़ी बात सरकारी सुरक्षा और सुविधा को लेकर है। मोदी का परिवार कई प्रकार की सरकारी सुविधा और सुरक्षा लेने का अधिकार रखता है। जानना यह जरूरी है कि प्रधान मंत्री पद पर आसीन व्यक्ति के परिजनों को अनेक प्रकार की सरकारी सुविधा और सुरक्षा मिलती है।

                        महान कौन होता है, प्रेरक कौन होता है, इतिहास कौन बनाता है? महान और प्रेरणा का स्रोत वह होता है,इतिहास वह बनाता है जो त्याग करता है, जिसका व्यक्तिगत और परिवार हित गौण होता है। क्या महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह , नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आदि का कोई व्यक्तिगत और परिवार हित था? अगर इन महापुरषों का भी कोई व्यक्तिगत और परिवार हित होता तो फिर ये प्रेरणा के प्रतीक नहीं बनते, भारत के लोग इन्हें अपना आदर्श नहीं मानते।महात्मा गांधी चाहते तो फिर मोतीलाल नेहरू की तरह अपना कुनबा राजनीति में खड़ा कर सकते थे। अगर ऐसा महात्मा गांधी करते तो फिर वे महात्मा नहीं कहलाते, शांति और अहिंसा के पुजारी नहीं कहलाते, दुनिया उनकी इज्जत भी नहीं करती।

                      नरेंद्र मोदी ने अपनी भतीजी सोनल मोदी का टिकट काटकर अपनी पार्टी ही नहीं बल्कि मोतीलाल नेहरू की वंशवादी फसल के जहर सहित सभी वंशवादी राजनीति को एक सीख और प्रेरणा दी है, आईना दिखाया है। सबसे बड़ी वंशवादी पार्टी कांग्रेस आज किस बुरी दुर्गति को प्राप्त की है,  यह भी किसी से छिपी हुई बात भी नहीं है। जनता जागरूक हो रही है, अब जनता वंशवादी राजनीति और मानसिकता को ठोकर भी मारना सीख रही हैं, यह भारतीय राजनीति और लोकतंत्र के लिए जरूरी अच्छी बात है।

                    इसीलिए तो नरेंद्र मोदी देश की जनता के दिलों में राज करते हैं। अगर विरोधी  पार्टियां और राजनेता मोदी की इस शक्ति को समझ लेे तो फिर उनका ही भला होगा। अन्यथा मोदी तो अपराजित ही है।

    लेखक- विष्णुगुप्त(राजनीति विशेषज्ञ/वरिष्ठ पत्रकार)

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