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    "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्त फलां: क्रिया"।।

    मातृशक्ति...

    "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।

    यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्त फलां: क्रिया"।।

    अर्थात जहां मातृशक्ति की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं और जहाँ सम्मान नहीं होता वहाँ समस्त यज्ञार्थ क्रियाएं भी व्यर्थ होती है।

    यह विचार भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ रहा है। मातृशक्ति समाज का दर्पण होती है।यदि किसी देश अथवा समाज की स्थिति को देखना है तो वहांँ मातृशक्ति की स्थिति को देखा जाता है। स्त्रीत्व एक प्रकृति है और वह नित सृजन कार्य करती है। 

    मातृशक्ति किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं है बस उसे जागरूक एवं स्वावलंबित होने की जरूरत है। नारी संवेदनशील , सुकुमार है तो वह पहाड़ों का सीना चीरने का जज़्बा भी रखती है। वर्तमान नारी चाँद पर पहुँच गई है । नारी देश के उच्च राजनीतिक एवं प्रशासनिक पदों पर आसीन हैं और अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं।आज नारी के कदम घर की चारदीवारी से बाहर की और बढ़ रहे हैं। नारी को शक्ति का प्रतीक माना जाता रहा है और वह अपने अदम्य साहस का परिचय आज हर क्षेत्र में देकर विजय श्री का झंडा फहरा रही है। वर्तमान में मातृशक्ति स्वतंत्र होकर अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित कर रही है।वह शिक्षा का अधिकार प्राप्त कर आत्मनिर्भर एवं अधिकारों के प्रति सजग हो रही है।नारी को भोग्या मानने वाले समाज में नारी ने साबित कर दिया है कि वो भी इस पुरुष प्रधान समाज में अपना लोहा मनवा सकती है।आज उसकी प्रतिभा किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं_ साहित्य,खेल, चिकित्सा, विज्ञान, राजनीति, सरकारी सेवाओं , सामाजिक क्षेत्र इत्यादि में वो अपनी पहचान का विजय पताका फहरा रही है। समाज में विरोधाभाष की स्थिति भी आज हमे देखने को मिलती है।एक तरफ मातृशक्ति को देवी का दर्जा देते हैं वहीं उसे शोषण का शिकार बनाया जाता है । नारी सहनशीलता की प्रतिमूर्ति होती है लेकिन उसे अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए ,उसे कानून की मदद लेनी चाहिए। नारी को अपनी पहचान, चरित्र और निष्ठा को कभी खोने नहीं देना चाहिए यहीं उसके सौन्दर्य का आभूषण होता है।ग्रंथों में नारी को संसार की जननी कहा गया है। इतिहास के साथ वर्तमान में भी देश की महान नारियों ने अपने शौर्य ,शील व तेजस्विता का परिचय दिया है। सृष्टि रचना में नारी पुरुष दोनों का महत्त्व रहा है व एक दूसरे के पूरक हैं।स्त्री कभी अबला थी ही नहीं बल्कि उसके अधिकारों और आवाज को दबा उसे अबला बना दिया जाता है।स्त्री आज अपने अंदर निहित शक्तियों को शिक्षा के बल निखार दुनिया के समक्ष रख रही है और सशक्त होने का प्रमाण अंतरिक्ष ही नहीं हिमालय के दुर्गम पर्वतों को पार करते हुए शिखर पर भारतीय तिरंगा फहरा रही है।

    राष्ट्र की प्रतिष्ठा उसकी समृद्धि से नहीं बल्कि उस राष्ट्र के सुसंस्कृत व चरित्रवान नागरिकों से होती है और समाज को ये संस्कार मातृशक्ति देती है जो मांँ,बेटी,बहन और पत्नी का रूप होती है,जगत निर्मात्री है ।आज भी अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर जब देश की बेटियों को दहेज जैसे दानव के लील जाने

    की खबर पढ़ते है पैरों तले जमीन खिसक जाती है ।जब मासूम बेटियों के साथ आए दिन बलात्कार की घटनाएं पढ़ने व सुनने को मिलती है तो मन में प्रश्न उठता है क्या हम उसी समाज में रहते हैं जहांँ नारी को दुर्गा के रूप में पूजा जाता है? पुरूष क्यों अपनी मर्यादा लांघ हैवान का रूप धारण कर जाता है ? उसने भी मांँ की कोख से जन्म लिया है ,बहन से कलाई पर रक्षाबंधन को राखी बंधवाई है फिर कैसे भावहीन होकर आसमान से धरा पर उतरे गिद्ध का रूप धारण कर बेटियों को सूनी राह में कोमल शरीर को नोचकर खा जाता है? वर्तमान में मातृशक्ति को आत्मरक्षा हेतु शिक्षा के साथ साथ जूड़ो,कराटे जैसे आत्मरक्षा के गुर सीखने चाहिए ताकि समय पर इस हथियार का प्रयोग कर दुर्गा स्वरूप में ऐसे समाजकंटकों को मुंँहतोड़ जवाब देकर नारीशक्ति और उसके अस्तित्व को याद दिला सके वो दुर्गा,काली का अवतार एवं रानी लक्ष्मीबाई , दुर्गावती ,कर्मावती ,माता पन्नाधाय जैसी वीरांगनाओं का अंश है।


    स्वरचित एवं मौलिक

    सुमन राठौड़

    झाझड

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