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    मां के अनमोल पल...

    मां के अनमोल पल...

    विभा चतुर्वेदी, लखनऊ की काव्य-रचना...

     

    माँ ओ माँ सुन ना आज कहना है तुझसे
    कोई है नही तुझ जैसा हां हम हैं सिर्फ तुझसे
    तूने कैसा जादू किया माँ
    पाल पोस के ऐसे कैसे बडा किया माँ
    समझ आया तेरा वो प्यार जब तू दूर हुई
    काश फिर रहु तेरे पास विश ये अब ना मंजूर हुई
    क्यों रह नही सकती मैं तेरे पास
    तेरा वो नरम नरम पेट जिसको टटोलती थी मैं बिंदास
    तेरा वो गरम गरम पराठे बनाके खिलाते जाना
    खुद खाती थी तू ठंडा कैसे आज खाके याद आया वो ज़माना


    माँ ओ माँ सुन ना आज कहना है तुझसे
    तेरा वो बालों में तेल लगाना बहुत याद आता है
    आज बालों में तेल लगाएं एक अरसा गुज़र जाता है
    पूछा करती थी अक्सर सखियाँ क्या है इन बालों का राज़
    आज समझ आया कुछ और न था, था वो मेरी माँ का साज
    बहुत खुश होती हूं जब कोई कहता है मैं हूँ बिल्कुल तेरे जैसी
    तेरी परछाई बनने में भी उतना ही सुकून है
    जैसे मिल गयी हो दुनिया पहले जैसी


    माँ ओ माँ सुन ना आज कहना है तुझसे
    तेरा वो सोते हुए भी खिलाना की मैं ना सोउ भूखी
    और बिना मेरे कहे समझ जाना कि मैं ना खा पाउ रूखी सुखी
    वो स्कूल जाते वक्त मेरे बाल बनाना
    और मेरे नखरे करने पे मुझे डांटना मनाना



     

     

     

     

     

     

     

    माँ फिर से तेरी वो डांट याद आती है
    और फिर हर रात तेरी याद रुला जाती है
    डरती थी जब रात में सो ना पाती अकेले कभी
    तेरी बाँहो में सोने में मिल जाती मुझको ज़न्नत तभी
    कोई नही है अब तो पूरी रात डर के निकल जाती है
    काश फिर आये तेरी वो बाहें जो महफूज़ घेरा बनाती हैं


    आज बन के माँ पाया वो एहसास
    जो तूने लुटाया मेरे आस पास
    जीवन मे एक खाली जगह जो भर नही सकता
    तेरा वो अमूल्य प्यार कोई हर नहीं सकता
    माँ ओ माँ सुन ना आज कहना है तुझसे
    कोई है नही तुझ जैसा हां हम हैं सिर्फ तुझसे

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