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    अभी क्यों विदा हो गए शब्दों के जादूगर...

    अभी क्यों विदा हो गए शब्दों के जादूगर...

    ...अभी तो तुम्हें बहुत काम करने थे। हिचकी को ऊंचाइयों तक ले जाना था। आगरा के इतिहास से संबंधी कई पुस्तकें लिखनी थीं। साहित्योत्सव पुस्तक मेले को भी मुकाम तक पहुंचाना था।... पर तुम यह सब अधूरा ही छोड़ गए अमी।...बीमार होने से बस 15 दिन पहले ही घर आए थे, तब जाते समय, मैंने कहा था...जब भी इधर आओ तो फिर आना, तुम्हें फिर आना था न...पर....। मेरे रिटायरमेंट के बाद के लिए तुमने कई प्लानिंग की थीं, वह भी अधूरी छोड़ गए। हर कदम पर साथ दिया, पर अब क्यों, कहां चले गए।

    अमी, तुम जैसा शब्दों का जादूगर मैंने नहीं देखा था। तुम जब लिखते थे तो बस जादू ही होता था तुम्हारी कलम में। एक लय बना देते थे। हर पंक्ति में धुन गूंजती थी। शब्दों का जितना भंडार तुम्हारे पास था, उतना शायद की ही किसी के पास रहा हो। बीमार होने के एक सप्ताह पहले ही तो बेविनार पर तुमने मुझे जोड़ा था। तुम मुझे एक अलग क्षेत्र में पहचान दिलाना चाहते थे, पर अब क्या....।


    हजूरी भवन में दादाजी के प्रिय शिष्य थे। वहां के हर आयोजन में तुम ही हर सामाजिक व्यक्ति के केंद्र बिंदु हुआ करते थे। पर वह बिंदु ही अब अनंत में विलीन हो गई।

    जितना अच्छा लिखते थे, उतना अच्छा बोलते थे। जितना अच्छा बोलते थे, उससे अच्छा आचरण था। जितना अच्छा आचरण था, उससे अधिक व्यवहारिक थे। पर ये सब अब याद ही रह गईं।


    तुमसे मेरा परिचय कब हुआ यह तो याद नहीं, लेकिन स्वराज्य टाइम्स में जब तुमने पत्रकारिता शुरू की, तब विनोद भारद्वाज (स्वराज्य टाइम्स वालों) ने तुम्हारी पहली कापी मुझे जांचने को दी। मैंने कहा, क्या देखूं, एकदम परफेक्ट है। मैं काबिलियत पर आश्चर्यचकित व गौरवान्वित था। फिर तो तुम बढ़ते गए, चढ़ते गए एक सितारे की तरह, पर यह नहीं पता था कि एकदम चंद्रमा पर पहुंच जाओगे...।

    दैनिक जागरण में जब पहुंचे तो वहां भी बहुत ऊंचाइयां पाईं। शब्दजाल बुनने की कला में पारंगत होने के कारण मैंने स्वयं कई बार अपनी विशेष सांस्कृतिक रिपोर्टिंग की इंट्रो तुमसे लिखवाए। हर किसी के मदद के लिए हमेशा तत्पर रहे, पर अंतिम समय में तुमने अपनी मदद का मौका भी किसी को नहीं दिया। चुपचाप उस मार्ग पर चले गए, जहां से कोई लौट कर नहीं आता।


    सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और पत्रकारिता के क्षेत्र में तुमने कदम से कदम मिला कर चलना शुरू किया था, लेकिन तुम्हारे कदम तेज थे। हर क्षेत्र में सबसे आगे निकलना चाहते थे, लेकिन तुमसे इतने आगे निकलने की भी उम्मीद नहीं थी कि सभी को छोड़ कर चले जाओगे।


    ...क्या-क्या याद करूं, कहां तक लिखूं, समझ में नहीं आ रहा। पर तुमने जो दर्द मुझे ही नहीं, शहर के अनगिनत लोगों को दिया है, वह बहुत ही गलत है, लेकिन तुम्हारी इच्छा...हरि इच्छा...बस...बस...नमस्कार...राधास्वामी। तुम जहां भी रहो, मस्त रहो। ओम शांति।


    आदर्श नंदन गुप्ता

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