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    विदेशी जहरीली घास किसान की बनी सबसे बड़ी मुसीबत

    विदेशी जहरीली घास किसान की बनी सबसे बड़ी मुसीबत
    फसल के साथ ही इंसान व मवेशियों के लिए खतरनाक है यह घास
    सीतापुर.
    लगभग तीन दशक पूर्व अमेरिका व कनाडा से आयात किए गए खाद्यान्न गेहूँ के साथ आई विदेशी जहरीली घास किसानों के लिए एक मुसीबत बनती जा रही है, विशेषज्ञों की माने तो यह जहरीली घास फसलों सहित इंसानों व जानवरों के लिए अति घातक है | यह घास जिस भी खेत में पैदा हो जाती तो पूरी फसल को बर्बाद कर देती है, साथ ही मानव शरीर के संपर्क में आने पर यह घास तरह-तरह के चर्मरोग पैदा कर देती है |

    कृषि विभाग ने यदि समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए तो अन्नदाता किसान जंगली घास के चलते निश्चित तौर पर बदहाली का शिकार होगा। गाजर घास के कहर से किसानों को तो दो-चार होना ही पड़ेगा यह जहरीली घास वातावरण के साथ-साथ पुरुषों एवं पशुओं के लिए भी गंभीर समस्या पैदा कर सकती है । इस विनाशकारी खरपतवार को समय रहते यदि नियंत्रण न किया गया तो विनाश का कारण भी बन सकती है । बताते चलें कि आजकल खेतों एवं गांव के लिंक मार्गो गांव में खाली पड़ी जमीनों पर एवं हाईवे के किनारे किनारे जमीनों पर यह उग रही घास सहज ही देखने को मिल सकती है । इस विदेशी घास से किसान हकलाया हुआ है ।

    किसानों की माने तो यह गाजर घास मनुष्य एवं पशुओं के लिए जहां हानिकारक है वही खाद्यान्न फसल की पैदावार में भी कमी कर रही है । इस जंगली घास के चलते इसके पौधों में पाए जाने वाले विषाक्त पदार्थो के कारण फसलों के अंकुरण एवं वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ रहा है । वही दलहनी फसलों में यह खरपतवार जड़ ग्रंथियों के विकास को भी प्रभावित कर रहा है । किसान बताते हैं यह पौधा वर्ष में तीन-चार माह में अपना जीवन चक्र पूरा कर लेता है और पूरे वर्ष खूब फलता फूलता रहता है । इसका प्रकोप खाद्यान्न फसलों जैसे धान , ज्वार , मक्का , सोयाबीन ,मटर , तिल ,गन्ना, बाजरा ,सब्जियों एवं उद्यान फसलों में भी देखने को मिल रहा है । उक्त गाजर घास का पौधा रोएदार एवं अत्यधिक शाखा युक्त होता है । इसकी पत्तियां असामान्य रूप से गाजर की पत्तियों की तरह होती हैं । इस उगने वाली घास में फूलों का रंग सफेद होता है । जो सूक्ष्म बीज का निर्माण करता है । यदि जानकारों की माने तो एक हजार से पांच हजार तक अत्यंत महीन सूक्ष्म छोटे-छोटे बीज के रूप में जमीन पर गिरने के बाद थोड़ी सी नमी पाकर अंकुरित हो जाता है । जानकार बताते हैं इस खरपतवार की 20 प्रजातियां जो पूरे विश्व में पाई जाती हैं भारत में लगभग 3 दशक पूर्व अमेरिका कनाडा से आयात किए गए गेहूं के साथ यह बीज आया हुआ बताया जा रहा है । उक्त घास के लगातार संपर्क में आने से एक्जमा , एलर्जी , बुखार , दमा आदि की बीमारियों की प्रबल संभावना बनी रहती है । खास करके दुधारू पशुओं के लिए यह घास अत्यधिक नुकसान देह है । यदि समय रहते गैर कृषि क्षेत्र एवं कृषि क्षेत्र में इसके नियंत्रण के लिए रासायनिक एन्ट्राजिन का प्रयोग फूल आने से पहले किया जाए तो इस पर नियंत्रण किया जा सकता है । इसे यांत्रिक, रासायनिक , जैविक विधियों के द्वारा भी रोकने के लिए कृषि विभाग द्वारा व्यापक स्तर पर अगर प्रचार-प्रसार न किया गया तो निश्चित तौर पर किसानों के साथ साथ आमजन को भी भविष्य में भयावक्ता का सामना करना पड़ सकता है । कृषि विभाग को चाहिए कि कुकुरमुत्ता की तरह उग रही इस घास पर प्रभावी नियंत्रण के लिए तत्काल ठोस कदम उठाए ताकि अन्नदाता किसान सहित भविष्य में आमजन को होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।

    शरद कपूर / आलोक अवस्थी

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