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    पं उमादत्त सारस्वत दत्त की 115वीं जयन्ती मनायी

    पं उमादत्त सारस्वत दत्त की 115वीं जयन्ती मनायी

    सीतापुर.
    संस्कार भारती बिसवां इकाई के तत्वावधान में नगर की महान विभूति, हिंदी मर्मज्ञ श्रेष्ठ कवि एवं साहित्यकार  तथा कवि रत्न व साहित्याचार्य उपाधि से सम्मानित  पं उमादत्त सारस्वत की  115वीं जयंती के उपलक्ष में आनलाइन श्रद्धांजलि गोष्ठी का आयोजन दत्त जी के पौत्र डा सुनील कुमार सारस्वत द्वारा किया गया जिसकी अध्यक्षता हिन्दी मर्मज्ञ व संस्कार भारती बिसवां इकाई के संरक्षक पूर्व प्रधानाचार्य दिनेश चन्द्र पाण्डेय के द्वारा की गयी ।मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय कवि कमलेश‌ मौर्य मृदु व मुख्य वक्ता के रुप में कलाकुंज पत्रिका के संपादक व वरिष्ठ साहित्यकार पद्मकान्त शर्मा प्रभात रहे। संचालन संस्था के महामंत्री घनश्याम शर्मा के द्वारा किया गया।
    कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था के साहित्य विधा प्रमुख आनन्द खत्री के द्वारा प्रस्तुत मां वाणी की वन्दना के साथ हुआ।
    राष्ट्रीय कवि कमलेश मौर्य मृदु ने दत्त जी को काव्य पुष्प अर्पित करते हुए कहा कि

    जिनका जीवन‌ सरल सुसंस्कृत सतत प्रवाहित सरिता सा।
    शूचि सहित्य गगन में जिनका काव्य प्रकाशित सविता सा।

    सुकवि संदीप सरस ने  आदरणीय दत्तजी के व्यक्तित्व व‌ कृतित्व पर काव्यपुष्पांजलि अर्पित करते हुए कहा कि

    कोयल किरण किसलय व प्रवासी पति
    मंदोदरी के सृजक, वन्दन है आपका।
    अंबर के रवि आप शब्द दीप मेरे व्यर्थ
     पूज्य उमादत्त अभिनन्दन है आपका।

    सुकवि आनन्द खत्री'आनन्द' ने श्रद्धेय दत्त जी के व्यवहारिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए काव्य सुमन अर्पित करते हुए कहा  कि

    सहज सुशील व चरित्रवान शिक्षक थे,
    स्वाभिमान युक्त देश हित में प्रवृत्त थे।
    साधक विचारक समाज के सुधारक थे , 
    धर्मवान ज्ञानवान ईश्वर के भक्त थे ।

    सुकवि घनश्याम शर्मा ने कहा कि मैं जो कुछ भी हूं ये सब आदरणीय दत्त जी का ही आशीर्वाद है।शर्मा जी ने अपने काव्य गुरु दत्त जी के चरणों में काव्यांजलि अर्पित करते हुए कहा कि

    जिन पद पंकजो की सुषमा निहार कर 
    घनश्याम नित ही अमित सुख पाता था।
    जिनके मधुर वचनों का रसपान कर
    तन-मन से सदैव बलि बलि जाता था।

    संस्था के अध्यक्ष भगवत शरण श्रीवास्तव ने  काव्य पुष्प अर्पित करते हुए कहा कि

    बिसवां की पुण्य भूमि कवियों का चमन है।
    बाबा विश्वनाथ का ये आशीर्वचन है।
    उपजे यहां साहित्यकार संत व कवि
    कवि श्रेष्ठ उमादत्त को करबद्ध नमन है।

    मुख्य वक्ता पद्मकान्त शर्मा प्रभात ने श्रद्धेय दत्त जी के जीवन चरित्र पर विस्तार से चर्चा की उन्होंने  कहा कि आदरणीय दत्त जी का जीवन एक आदर्श कवि के रूप में एक आदर्श शिक्षक के रूप में व एक आदर्श पिता के रूप में था। उनका दृष्टिकोण   आशावादी था। उन्होंने कहा कि दत्त जी अतुलनीय काव्य सृजन के महारथी थे तथा नगर की कई पीढ़ियों का काव्य व शिक्षा  के माध्यम से मार्ग प्रसस्त किया था।
    हिन्दी सभा सीतापुर के अध्यक्ष आशीष मिश्रा ने श्रद्धेय दत्त जी के लिए कहा कि आदरणीय दत्त जी अपने हास्य व्यंग्यो के माध्यम से सामाजिक व राजनीतिक स्थितियों का सहज दर्शन‌ कराने वाले एक श्रेष्ठ रचनाकार थे।
    कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व प्रधानाचार्य दिनेश चन्द्र पाण्डेय ने पं दत्त जी के व्यक्तिव व कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रद्धेय दत्त जी को दत्त उपनाम उनके गुरु पं कन्हैया लाल जी के द्वारा प्रदान किया गया था।  सेठ जयदयाल इं कालेज की वाणी पत्रिका के सन् 1961के अंक में  पं जी के परिचय का एक  छंद  प्रकाशित हुआ था जो इस प्रकार था कि

    मुस्कान में मानव के जो बसी 
    वह मादकता बिना तौल हूं मैं।
    उर की छिपी बात जो देते बता
    वह आंसू महा अनमोल हूं मैं।

    कार्यक्रम में उपस्थित कवि दिनेश मिश्र राही ,प्रवक्ता राजेश‌पाण्डेय,डॉ वेद प्रकाश अग्निहोत्री डॉ अनिल सारस्वत, इं अम्बरीष अम्बर, शिवरतन शुक्ल ,राजकुमार तिवारी  शिवेन्द्र मिश्र शिव,  शशि शुक्ला  ,सरस कपूर ,शिव प्रताप सिंह चौहान अंशुल शर्मा आदि ने भी भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
      कार्यक्रम संयोजक डॉ सुनील सारस्वत ने  पं उमादत्त सारस्वत जी के कृतित्व की चर्चा करते हुए कहा  कि पंजाब शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा 5 के पाठ्यक्रम में वीर जवाहर , बसंत तथा शुष्क लता रचनाएं आज भी पढ़ाई जा रहीं हैं तथा  कानपुर , रुहेलखंड व बनारस विश्व विद्यालय में पं उमादत्त सारस्वत के साहित्यिक योगदान पर शोध विद्यार्थियों द्वारा शोध कार्य किया जा रहा हैं।
    अंत में डॉ सुनील कुमार सारस्वत के द्वारा पटल पर उपस्थित सभी अतिथियों के प्रति आभार प्रकाशन‌ किया गया।

    शरद कपूर / आलोक अवस्थी
     सीतापुर

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