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    सीतापुर से शरद कपूर की गुरु पूर्णिमा पर विशेष रिपोर्ट

    सीतापुर से शरद कपूर की गुरु पूर्णिमा पर विशेष रिपोर्ट

    गुरु पूर्णिमा (रविवार- 5 जुलाई)

       दिनाँक 5 जुलाई को उपछाया चंद्र ग्रहण है, (सुबह 8:37 से 11:22 तक) परंतु इस उपछाया चंद्र ग्रहण का कोई भी शास्त्रीय महत्व नहीं है.
     है। किसी भी प्रकार का दोष, निषेध बिल्कुल भी नहीं है। आप यह समझें कि कोई ग्रहण है ही नहीं। अत: गुरु पूजन और साधना के लिए यह उत्तम समय है।           

     हिंदू धर्म में आषाढ़ पूर्णिमा  व्यास पूर्णिमा गुरु भक्ति को समर्पित पवित्र दिन भी है। भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु को सर्वोपरि माना है। वास्तव में यह दिन गुरु के रूप में ज्ञान की पूजा का है। गुरु का जीवन में उतना ही महत्व है, जितना माता-पिता का।

     माता-पिता के कारण इस संसार में हमारा अस्तित्व होता है। किंतु जन्म के बाद एक सद्गुरु ही व्यक्ति को ज्ञान और अनुशासन का ऐसा महत्व सिखाता है, जिससे व्यक्ति अपने सतकर्मों और सद्विचारों से जीवन के साथ-साथ मृत्यु के बाद भी अमर हो जाता है। यह अमरत्व गुरु ही दे सकता है। गुरु पूर्णिमा को अनुशासन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।

     इस प्रकार व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास गुरु ही करता है। जिससे जीवन की कठिन राह भी आसान हो जाती है। सार यह है कि गुरु शिष्य के बुरे गुणों को नष्ट कर उसके चरित्र, व्यवहार और जीवन को ऐसे सद्गुणों से भर देता है। जिससे शिष्य का जीवन संसार के लिए एक आदर्श बन जाता है।

     गुरु पूजन:- स्नान आदि से शुद्ध पीले या सफेद वस्त्र पहनकर आचमन, प्राणायाम करके संकल्प करें । गणपति , कुलदेवी को प्रणाम कर गुरुजी का आवाहन करें। उनका पंचोपचार (पुष्प धूप दीप नैवेद्य चढ़ा कर) पूजन करें।।   

     गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः |
    गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||

    ध्यानमूलं गुरुर्मूर्ति पूजामूलं गुरोः पदम् |
    मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा 
    अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्
    तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।

    त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव
    त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ||
    ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
    द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम्।
    एकं नित्यं विमलं अचलं सर्वधीसाक्षी भूतम् |
    भावातीतं त्रिगुण रहितं सदगुरुं तं नमामि।  

    नारायणो त्वम निखिलेश्वरो त्वम,माता पिता गुरु आत्म त्वमेवं ब्रह्मा विष्णु रुद्रश्च त्वमेवं, सिद्धाश्रम त्वम गुरुवं प्रणम्यं। 

    इसके बाद गुरु मंत्र या  नमः शिवाय अथवा निम्न गुरु- गायत्री का यथा शक्ति  जप करें।

    गुरूदेवाय विदमहे पर ब्रह्माय धीमही तन्नो गुरु प्रचोदयात।

    आरती करें। दक्षिणा जरूर चढ़ाए  क्षमा प्रार्थना करें, शांत पाठ करें।
     महिमावान श्री सदगुरुदेव के पावन चरणकमलों का पूजन करने से साधक-शिष्य का हृदय शीघ्र शुद्ध और उन्नत बन जाता है ।

    यदि गुरु सम्मुख नहीं है तो मानस पूजा इस प्रकार कर सकते हैं |

     मन ही मन भावना करो कि हम गुरुदेव के श्री चरण धो रहे हैं … सर्वतीर्थों के जल से उनके पादारविन्द को स्नान करा रहे हैं | खूब आदर एवं कृतज्ञता पूर्वक उनके श्रीचरणों में दृष्टि रखकर … श्रीचरणों को प्यार करते हुए उनको नहला रहे हैं … उनके तेजोमय ललाट में शुद्ध चन्दन से तिलक कर रहे हैं … अक्षत चढ़ा रहे हैं … अपने हाथों से बनाई हुई गुलाब के सुन्दर फूलों की सुहावनी माला अर्पित करके अपने हाथ पवित्र कर रहे हैं … पाँच कर्मेन्द्रियों की, पाँच ज्ञानेन्द्रियों की एवं ग्यारहवें मन की चेष्टाएँ गुरुदेव के श्री चरणों में अर्पित कर रहे हैं
     कायेन वाचा मनसेन्द्रियैवा बुध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् |
    करोमि यद् यद् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि
    शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से, बुद्धि से अथवा प्रकृति के स्वभाव से जो जो करते  हैं वह सब समर्पित करते हैं | हमारे जो कुछ कर्म हैं, हे गुरुदेव, वे सब आपके श्री चरणों में समर्पित हैं … हमारा कर्त्तापन का भाव, हमारा भोक्तापन का भाव आपके श्रीचरणों में समर्पित है |

     इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की कृपा को, ज्ञान को, आत्मशान्ति को, हृदय में भरते हुए, उनके अमृत वचनों पर अडिग बनते हुए अन्तर्मुख हो जाओ … आनन्दमय बनते जाओ …मङ्गल मय हो जाओ
    हाथ खोलकर आशीर्वाद लें।

        देहि सौभाग्य आरोग्य देहि मे परम सुखं, रुपम देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।


     शरद कपूर
    आई एन ए न्यूज़ सीतापुर  - उत्तर प्रदेश

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