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    बड़े व्यापारियों का लॉक डाउन शुरू, छोटे व्यापारियों कॉम डाउन शुरू..


    बड़े व्यापारियों का लॉक डाउन शुरू, छोटे व्यापारियों कॉम डाउन शुरू..


    जिला प्रशासन भी झाड़ रहा पल्ला कि हमने कोई आदेश ही नहीं जारी किया सिर्फ स्वीकृति दी

    नामी-गिरामी बड़े व्यापारियों के साथ बैठक कर प्रशासन ने ले लिया निर्णय तो फिर छोटे दुकानदारों को क्या व्यापारियों की श्रेणी में नहीं रखा जाता..

    हरदोई/उत्तर प्रदेश।  हम बात कर रहे हैं सिर्फ अपनी चमकाने में लगे व्यापार मंडल के उन चंद व्यापारियों की। जिन्हें छोटे व्यापारियों से कोई लेना देना नहीं है। सिर्फ 04-06 लोगों ने बैठकर बात चीत कर ली और कर लिया फैसला जिले/प्रदेश में लॉक डाउन करने का। क्या किसी छोटे व्यापारी(किराना, सब्जी, फल आदि) से कोई मशविरा किया गया। जरूरत ही नहीं है न यह सब करने की। क्योंकि सब्जी, किराना और फल आदि बेंचने वाले व्यापारी हैं ही नहीं इनकी नजर में। ये सब बस अपनी चमकाने व मीडिया पर छा जाने के लिए निर्णय करके किनारे हो गए। क्या किसी व्यापारी ने उस छोटे दुकानदार का दर्द जानने की कोशिश की, जो दिन भर में 300 रुपए के फल बेंचकर 70-80 रुपए बचा लेता है। क्या उस छोटे दुकानदार के बारे में सोंचा, जिसके चेहरे पर झुर्रियां पड़ चुकी हैं लेकिन बेबस है बेचारा सब्जी आदि बेंचने को। क्या उसे पागल कुत्ते ने काटा है जो कोरोना महामारी के बीच भी अपने जीवन को दांव पर लगाकर, रोजाना पुलिस वालों की गालियां खाकर भी ठेला लगाकर 100-50 रुपए कमा लेता है और शाम को जाकर पूरे परिवार सहित साधारण सब्जी और 02 रोटी खाकर सो जाता है। कहाँ थे ये बड़े व्यापारी तब, जब लॉक डाउन की शुरुआत हुई थी। इनमें से कोई भी किसी गरीब की सहायता करते नहीं नजर आया था एक-दो को छोड़कर।

    क्या समझते हैं आप कि लोग कुछ नहीं जानते। अरे इन बड़े व्यापारियों ने लॉक डाउन के बीच में ही खूब कालाबाजारी की और खूब पैसे कमाए। बात करते हैं लॉक डाउन की। अगर ये इतने ही हितैषी हैं तो चेक कर लिए जाएं इस सबके एकाउंट मार्च से लेकर अब तक के और देख लिए जाएं कि कितना ट्रांसक्शन हुआ है 04-05 महीनों में। पता चल जाएगा कि इन्होंने व्यापार किया या नहीं। 

    प्रशासन ने भी जरूरत नहीं समझी छोटे दुकानदारों से बात करने या सलाह लेने की। प्रशासन को भी कोई मतलब नहीं है गरीब के दुःख दर्द से।

    ये जो व्यापारी हैं न। ये सोंच और कर्मों से बहुत छोटे होते हैं। अगर इनमें जरा भी इंसानियत होती तो कम से कम एक बार छोटे दुकानदारों को अपना भाई मानकर उनसे पूंछते कि कोई दिक्कत तो नहीं लॉक डाउन से। लेकिन क्या जरूरत है। 10-12 मूँछतंडे पालकर लगे संगठन चलाने। यह भी सोंच नहीं आयी कि आखिर कैसे क्या खाएंगे आर्थिक तंगी से जूझ रहे वे लोग, जो बेचारे पिछले 04 महीनों से लॉक डाउन की मार झेल रहे हैं। किसी भी गरीब के पास इतना पैसा बचत में नहीं होता कि वो घर बैठकर 05 महीने अपने परिवार का ख़र्च चला सके। सारे नियमों को अपनी रखैल बनाकर रख दिया है इन लोगों ने। मजाक बनाकर रख दिया रूल्स का।

    लॉक डाउन से कौन जी रहा है, कौन मर रहा है, इसकी कोई चिंता नहीं है इन लोगों को। बस अपनी कॉलर ऊंची हो और अपनी दुकान चलनी चाहिए। साहब! भी वैसे ही निकले, उन्होंने भी किसी से जानने की कोशिश नहीं की, क्या कमाएगा और क्या खायेगा एक छोटा व्यापारी। क्या उसका परिवार नहीं है, उसके बीबी-बच्चे नहीं हैं। या उसके घर में चूल्हा नहीं जलता है।

    ऐसी मनमानी करने से अच्छा है कि सड़कों पर भूखों मरने के लिए छोड़ दो। सबसे बड़ी समस्या मध्यम वर्ग के लोगों के साथ है, जो कहने को तो मध्यम वर्ग के हैं लेकिन वे भी बहुत परेशान हैं। ऐसे लोग न तो किसी के आगे मदद के लिए हाथ फैला सकते हैं और न ही भूखे मर सकते हैं। इससे ज्यादा बेबसी और क्या होगी।

    अगर ऐसे ही लॉक डाउन करना है तो फिर प्रशासनिक तौर पर इन बड़े व्यापारियों से कहा जाए कि जिले के अंतर्गत आने वाले सभी गरीबों/जरूरतमंदों की लिस्ट निकालकर उनके घर 02 महीने का राशन पहुंचाएं। फिर लॉक डाउन करें आराम से।

    सबसे ज्यादा हराम की कमाई इन्हीं व्यापारियों ने की लॉक डाउन के दौरान। आंटा, दाल-चावल, दवाइयां सब महंगे रेट में बेंचे। क्योंकि गरीब तो मरने के लिए ही है। अरे तलवार लेकर सारे गरीबों के सिर कलम कर दो। किस्सा ही खत्म कर दो। क्यों मार रहे हो ऐसे तड़पा-तड़पाकर।

       विजय लक्ष्मी सिंह
       एडिटर इन चीफ
    आईएनए न्यूज़ एजेंसी

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