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    महत्वपूर्ण दवा लक्ष्यों की सक्रियता का पता लगाने के लिए डिजाइनर बायोसेंसर

    महत्वपूर्ण दवा लक्ष्यों की सक्रियता का पता लगाने के लिए डिजाइनर बायोसेंसर

    नई दिल्ली(इंडिया साइंस वायर।
    डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली लगभग आधी दवाएं हमारे शरीर में जी-प्रोटीन युग्मित रिसेप्टर्स (जीपीसीआर) के जरिये काम करती हैं, जो दवा लक्ष्यों का एक बड़ा परिवार है। एक ताजा अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ऐसे सिंथेटिक एंटीबॉडी खोजे हैं, जो जीपीसीआर के सक्रिय होने एवं संकेतक के रूप में उनके कार्य को दर्शाने वाले बायोसेंसर की तरह कार्य करते हैं। यह अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर, यूनिवर्सिटी ऑफ मान्ट्रियल कनाडा और इंपिरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
    जीपीसीआर और बीटा-अरेस्टिन की सक्रियता और
    परस्पर संपर्क की निगरानी के लिए एंटीबॉडी-आधारित
    नया बायोसेंसर। मानव भ्रूणीय किडनी कोशिकाओं में
    जीपीसीआर के सक्रिय होने पर हरे फ्लोरोसेंट
    प्रोटीन से संलग्न एंटीबॉडी अंश (हरे रंग)
    बीटा-अरेस्टिन (लाल रंग) की गतिविधि का अनुसरण करते हैं।

    शोधकर्ताओं ने बताया कि शरीर में कोशिकाएं एक लिपिड झिल्ली से घिरी रहती हैं। इस झिल्ली में पाए जाने वाले प्रोटीन अणुओं के विशिष्ट वर्ग को रिसेप्टर कहते हैं। रिसेप्टर प्रोटीन; कोशिकाओं पर लिपिड झिल्ली में सूचनाओं के संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए, कोशिकाएं जब किसी रसायन के संपर्क में आती हैं, तो रिसेप्टर उचित प्रतिक्रिया के लिए कोशिका के भीतरी हिस्से को संदेश भेजते हैं। इन रिसेप्टर्स को उनके आकार और संरचना के आधार पर विभिन्न समूहों में बांटा जा सकता है, जी-प्रोटीन युग्मित रिसेप्टर (जीपीसीआर) उनमें से एक है।

    अधिकतर दवाएं रिसेप्टर्स के विस्तृत समूह जी-प्रोटीन युग्मित रिसेप्टर (जीपीसीआर) को चालू अथवा बंद करने पर आधारित होती हैं। इनमें उच्च रक्तचाप, हार्ट फेल होने, मोटापा और मानसिक विकारों की दवाएं शामिल हैं। रिसेप्टर जब सक्रिय होते हैं तो वे कोशिका के भीतर प्रोटीन के एक अन्य वर्ग बीटा-अरेस्टिन से बंध जाते हैं। यह संपर्क रिसेप्टर के सक्रिय होने के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे कोशिकीय प्रतिक्रिया और रिसेप्टर; दोनों नियंत्रित होते हैं। रिसेप्टर कब चालू या फिर बंद होते हैं, इसका पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों को आमतौर पर रिसेप्टर अथवा बीटा-अरेस्टिन, या फिर इन दोनों को संशोधित करना पड़ता है। लेकिन, ऐसा करने पर उनकी कार्यप्रणाली में परिवर्तन होने की चुनौती रहती है।

    आईआईटी कानपुर के बायोलॉजिकल साइंसेज और बायो-इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ता डॉ अरुण कुमार शुक्ला ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “रिसेप्टर अथवा बीटा-अरेस्टिन में संशोधन से उनकी कार्यप्रणाली में बदलाव से संबंधित बाधा को दूर करने के लिए, हमने ऐसे एंटीबॉडी उत्पन्न किए हैं, जो बीटा-अरेस्टिन को उस वक्त नियंत्रित करते हैं, जब वे जीपीसीआर से बंध जाते हैं। इस तरह बिना किसी संशोधन के रिसेप्टर के सक्रिय होने की निगरानी की जा सकती है।”

    डॉ शुक्ला ने बताया कि “इस तरह के अध्ययनों के लिए आमतौर पर एंटीबॉडी चूहों, भेड़ और बकरियों जैसे जानवरों में लक्षित प्रोटीन के इंजेक्शन के उपयोग से उत्पन्न की जाती हैं।

    हालांकि, इस अध्ययन में, पशुओं पर बिना टीकाकरण के प्रोटीन-डिजाइन की पद्धति से बीटा-अरेस्टिन के खिलाफ प्रयोगशाला में बैक्टीरिया पर एंटीबॉडी तैयार किए गए हैं। इनमें से कुछ एंटीबॉडी चुनिंदा तौर पर बीटा-अरेस्टिन से बंध जाते हैं, जब वे रिसेप्टर्स के संपर्क में होते हैं। हमने फिर इन एंटीबॉडी में प्रतिदीप्ति (फ्लूअरेसन्स) प्रोटीन संलग्न किया और माइक्रोस्कोप के उपयोग से जीवित कोशिकाओं में उनके किसी स्थान विशेष पर केंद्रित होने की प्रक्रिया का अध्ययन किया है।”

    शोधकर्ताओं ने पाया कि इस अध्ययन में विकसित एंटीबॉडी जीपीसीआर के व्यापक सेट के लिए रिसेप्टर के सक्रिय होने की जानकारी देने वाले शक्तिशाली बायोसेंसर के रूप में कार्य करते हैं। उनका कहना है कि इन बायोसेंसर्स की मदद से जीवित कोशिकाओं के भीतर रिसेप्टर्स और बीटा-अरेस्टिन की गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है। एक महत्वपूर्ण, मगर कुछ हद तक अप्रत्याशित तथ्य यह उभरकर आया है कि विभिन्न रिसेप्टर्स एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं तो वे बीटा-अरेस्टिन के समग्र आकार को अलग-अलग रूप में प्रभावित करते हैं। यह विभिन्न जीपीसीआर के चयनात्मक लक्ष्य की संभावना को दर्शाता है। 

    डॉ शुक्ला ने बताया कि “भविष्य में रिसेप्टर्स के अध्ययन के लिए पशुओं के ऊतकों में इन बायोसेंसर्स का उपयोग किया जा सकता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पशुओं के उपयोग बिना एंटीबॉडी उत्पन्न करने की यह तकनीक अन्य प्रोटीन रूपों पर भी लागू की जा सकती है। इससे लाइफ साइंस से संबंधित शोधों में उच्च गुणवत्ता वाले एंटीबॉडी उत्पन्न करने की चुनौती से निपटने के लिए नए समाधान मिल सकते हैं।”

    यह अध्ययन शोध पत्रिका जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल केमिस्ट्री में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं में आईआईटी कानपुर के डॉ अरुण शुक्ला के अलावा मिथु बैद्य, पुनीता कुमारी, हेमलता द्विवेदी-अग्निहोत्री, शुभी पांडेय, आशीष श्रीवास्तव, देब्रती रॉय, मधु चतुर्वेदी; कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ मान्ट्रियल के बद्र सोकरत व मिशेल बोउविएर और इंपिरियल कॉलेज लंदन की सिल्विया स्पोसिनी एवं ऐलिन सी. हैन्यालोग्लू 
    शामिल हैं।


       उमाशंकर मिश्रा
    (इंडिया साइंस वायर)

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