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    ई-काव्य संगोष्ठी की रिपोर्ट


    ई-काव्य संगोष्ठी की रिपोर्ट


    आज "माँ दुर्गा साहित्यिक संस्था, लखनऊ" के तत्वावधान में एक सद्भावना व कोरोना के प्रति जागरण से सम्बंधित काव्य गोष्ठी का संयोजन आशुतोष 'आशु' ने तथा अलका अस्थाना के संचालन में उद्घाटन हुआ। इस उद्घाटन काव्य गोष्ठी के अध्यक्ष केवल प्रसाद सत्यम, मुख्य अतिथि अनिल कुमार जैसवाल 'बेअदब लखनवी' की उपस्थिति में हुई।  माँ वीणापाणि की वंदना के बाद अपने काव्य पाठ में कवियत्री निरुपमा मेहरोत्रा ने प्रकृति दोहन व समाज की दोहरी नीति को  अपनी निम्न कविता से उजागर किया-

    "प्रकृति से खिलवाड़ की कीमत चुका रहे हैं सब महामारी के तांडव पर हाहाकार मचा रहे हैं अब।"
    (निरुपमा मेहरोत्रा)

    अगले कवि के रूप में प्रतापगढ़ के अंजनी अमोघ ने अपना मुक्तक छन्द, घनाक्षरी व मनहर दोहों से सबका दिल जीत लिया। कविता की एक बानगी देखिए-

    "मैं हूँ दिनकर का अनुगामी,ललकारो को लिखता हूँ।
    जयचन्दो के आचरणों पर,प्रतिकारों को लिखता हूँ।।
    वीर शिवा लक्ष्मी बाई के ,तलवारों को लिखता हूँ
    राणा प्रताप की हल्दी घाटी के ,अंगारो को लिखता हूँ।।"
     आशुतोष 'आशु' ने अपनी हास्य व्यंग्य घनाक्षरी  छन्दों से खूब तालियाँ अर्जित की।
    एक घमक्षरी का अवलोकन करें-

    "राणा प्रताप अब्दुल हामिद बिस्मिल से बलिदानी हैं. 
    भारत  माता की अजमत में दे  देते कुर्बानी हैं. 
    जाति धर्म के नाम पे कोई हमको  बाँट नही सकता,
    हिन्दू मुस्लिम  सिख्य से पहले हम हिंदुस्तानी हैं।"

    आज के कार्यक्रम की कुशल संचालक अलका अस्थाना ने अपनी विधा की लीक से हट कर एक सांई वन्दना का गीत पढा जो बहुत ही हृदयस्पर्शी व मर्म स्पर्शी था। गीत के बोल हैं-

    "चलो भई  शिर्ड़ी  नगरी पावन  होते पांव जहा  पनघट भर  घट घट है वहां"

    एक बार फिर हास्य-व्यंग्य के मंचीय कवि अनिल कुमार जैसवाल 'बेअदब लखनवी' जो कि आज के मुख्य अतिथि भी रहे। अपने चिरपरिचित अंदाज़ में हास्य से सराबोर कविताएँ सुनाई। एक बन्द प्रस्तुत है-

    "दिया फकीर को तुमने जो घर चलाने को ,
    लगा के आग वो कहता है अब बुझाने को !
    वो जिनके दिल में दिया नफरतों का जलता है, 
    चले हैं आज मेरे नाज़ वो उठाने को  ।"

    अंत में काव्यगोष्ठी के अध्यक्ष केवल प्रसाद सत्यम ने एक समीक्षात्मक व्याख्यान देते हुए। अपने उत्कृष्ट दोहा छन्द से काव्य प्रारम्भ किया। इसके बाद कलाधर छन्द से समाप्त किया।  

    "बलई बुधई रामधन, बैठ टीन की छाँव।
    मोबाइल पर देखते, छप्पर नीम अलाव।।

    भूखों को लगती नहीं, अब यह खुलकर भूख।
    पिज़्ज़ा  बर्गर  के  बिना,   बच्चे  जाते  सूख।।

    इस सफल काव्य गोष्ठी का स्थगन घोषणा से पूर्व आशुतोष आशु ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।  अलका अस्थाना जी जो इस संस्था की संस्थापक अध्यक्ष हैं ने भी सम्मिलित सभी अतिथियों के प्रति अपने आदर्शपूर्ण उद्देश्य, उद्गार व साभार धन्यवाद प्रकट किया।

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