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    ‘बॉयकाट चाइना’


    ‘बॉयकाट चाइना’


    सीमा पर भारतीय सेना चाइनीज ड्रैगन पर विजय प्राप्त करने का प्रयास कर रही है और यहां देश के अंदर हम देश के नागरिक चीन की वस्तुओं का बहिष्कार करके इस मुहिम में अपनी भागीदारी दे रहे हैं। 

    कोरोना के समय में भी प्रधानमंत्री जी ने हमें लोकल पर वोकल का नारा दिया है और स्वदेशी अपनाने को कहा है । स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नई योजनाओं की घोषणा की है।

    लेकिन प्रश्न उठता है कि "बॉयकॉट चाइना" क्या इतना आसान है? इससे पहले भी बहुत से देशों ने प्रयास किया कि विश्व के व्यापारिक नक्शे से चाइना का प्रभुत्व कम हो सके लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समय के साथ चाइना उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में और ताकतवर होता जा रहा है। उसकी व्यापारिक क्षमता और क्षेत्रफल समय के साथ बढ़ता जा रहा है।

    आखिर ऐसा क्यों है? चाइना ने हमेशा ही उत्पादन और अविष्कार के क्षेत्र में स्वयं को विश्व के समक्ष अग्रणी रखने का प्रयास किया है। और इसका सीधा कारण है उसका एक व्यापक इंटीग्रेटेड सिस्टम के साथ काम करना। उसने बहुत ही सुनियोजित तरीके से खुद को विश्व के समक्ष एक प्रोडक्टिव यूनिट के रूप में स्थापित कर लिया है।

    हाल ही का उदाहरण ले लें ।हजारों नेगेटिव रिव्युज के बाद हफ्ता भर से ज्यादा लगा टिकटॉक की रेटिंग साढ़े चार से 1.2 करने में,  और दो दिन लगे प्ले स्टोर को नेगेटिव रिव्युज हटाकर टिकटॉक की रेटिंग वापस लाने में|
     तो क्या अब आप प्ले स्टोर को भी बॉयकॉट करेंगे? इतनी जल्दी ये
     प्रैक्टिकली संभव नहीं।

    चाइना ने केवल मार्केट या व्यापार जगत ही नहीं लोगों के दिमाग में भी कब्जा किया हुआ है। और विश्व के उपभोक्ता बाजार के एक बड़े हिस्से पर अपना शिकंजा कसा हुआ है। चाइना के मुकाबले में खोज अविष्कार अनुसंधान और उत्पादन के लिए किसी भी देश को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन यही एक रास्ता है विश्व बाजार से उसका प्रभुत्व खत्म करने का।| 

    चाइना भारत को बाहर से चौतरफा स्ट्रैटेजिक पॉइंट पर घेरने की कोशिश करता है और उसकी कोशिश रहती है कि सस्ते और आसानी से उपलब्ध होने वाले सामान से मार्केट भरा रहे। और उपभोक्ता जब बाज़ार जाए तो उसे चारों और चाइनीज उत्पाद दिखाई दे। उसने भारतीयों के पर्व और विशेष आयोजनों पर बराबर नजर बनाए रखी। और उसके अनुरूप प्रोडक्ट बाजार में उतारकर भारतीयों को चाइनीज प्रोडक्ट की आदत का शिकार बनाया।  

    बस इसी प्रक्रिया को सिस्टमैटिक अप्रोच से बदलना है। देश की इकॉनमी को सही करने के लिए यह प्रयास होना चाहिए कि आयात कम हो और निर्यात ज्यादा हो।

     भारत को चाइना की तरह ही सस्ते सुंदर प्रोडक्ट बनाने चाहिए लेकिन साथ ही वे टिकाऊ भी हो तो वह विश्व मार्केट में चाइना को आसानी से रिप्लेस कर सकता है।  

    और इसके लिए भारत की उत्पादक कंपनियों का अधिक से अधिक जोर अनुसंधान और उत्पादन पर होना चाहिए। इससे देश के युवाओं को रोजगार भी मिलेगा और कारपोरेट जगत में एक क्रांति आएगी। प्रोडक्ट डिजाईन पेटेंट के एप्लीकेशन का प्रतिशत बढ़ना चाहिए।

    मई में लॉकडाउन के दौरान जब भारत में लाखों लोगों की नौकरियों पर संकट आ गया था तब भी रीयलमी ने 12000 की कीमत वाला अपना नया फोन मार्केट में उतारा था और हाथों हाथ उसकी सत्तर हज़ार यूनिट बिक गई थी। यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा जब तक भारतीय कंपनिया इससे कम कीमत में बेहतर फीचर्स वाले फोन को मार्केट में नहीं उतारती। यही एकमात्र विकल्प है चीन के विश्व व्यापार डोमिनेंस को खत्म करने का और इंडियन मार्केट को विश्व स्तर पर  मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने का।

    यही अन्य उत्पादों के साथ भी होना चाहिए। भारतीयों को प्रत्येक सेक्टर में खोज ,अनुसंधान ,अविष्कार और उत्पादन करके अपने कॉटेज इंडस्ट्री को भी मजबूत करना है । तभी हम लोकल से वोकल बन पाएंगे , भारत आत्मनिर्भर होगा और बॉयकॉट चाइनीज पूरी तरह समभाव हो पाएगा।

    भावना वरदान शर्मा - 
    एडिटर
    आईएनए न्यूज़ एजेंसी

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