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    ज्ञान और अमल का प्रश्न....


    ज्ञान और अमल का प्रश्न....


    शैक्षिक समुदाय का क्या दायित्व बनता है, विशेष रूप से एक विधि विश्वविद्यालय में, जब विश्वविद्यालय की स्थापना के वर्ष, 2008 से कार्यरत सफाई कर्मचारियों को ठेका परिवर्तन के चलते निष्ठुरता से हटा दिया जाता है। विश्वविद्यालय अपने इस अमानवीय कार्य को सही ठहराने के लिए यह तर्क देता है कि चूँकि ये श्रमिक किसी ठेकेदार के आधीन काम कर रहे थे, इसलिए विश्वविद्यालय इनके प्रति जवाबदेह नहीं है। वह मजदूरों द्वारा लगायी गयी खून-पसीने की मेहनत को एक क्षण में भूल जाता है, मानों उनसे एकदम अनजान हो। अपने अवैध कार्यों, जैसे की ठेकेदारों के साथ कोई औपचारिक लिखित अनुबंध न होना व 12 सालों से लगातार इसी अवैध अनुबंध का निरंतर नवीनीकरण करना, को नजरअंदाज करते हुए, वह बड़ी आसानी से श्रमिकों की मांगों को ही अवैध घोषित कर देता है। 

    इस प्रकरण से कानून के दायरे में काम करने का दावा करने वाले संस्थानों का अभिजात व दोहरा चरित्र उजागर होता हैं। समतावादी सिद्धांतों की आड़ में यह श्रम कानूनों व मानवअधिकारों का उल्लंघन करते आये हैं। विडंबना यह है कि दिल्ली सरकार के श्रम व रोजगार मंत्री के कार्यालय को संबोधित पत्र में विश्वविद्यालय के उप-कुलपति कहते हैं कि, “क्योंकि यह एक विधि विश्वविद्यालय है और अपने छात्रों को कानून का सामाजिक पहलू भी सिखाता है, इसलिए प्रशासन ने ठेकेदार को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि पिछले ठेकेदार के कर्मचारियों को रोजगार मुहैया कराया जाए।”


    इस तरह के संस्थान मध्यम वर्गीय लोगों के पूर्वाग्रह और विशेषाधिकार को बरकरार रखने के लिए काम करते हैं। विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा का महँगा फॉर्म व कठिन परीक्षा गरीब या पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए पहले ही दरवाजे बंद कर देता है। यहाँ सिर्फ मध्यम या उच्च वर्ग से आये बच्चे दिखते हैं और इन सब कठिनाइओं से जूझकर अगर कोई पिछड़े वर्ग का बच्चा दाखिला लेने में सफल हो भी जाता है तो उसे अपना आत्मविश्वास बनाए रखने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इससे वंचित वर्ग के छात्र या मजदूरों को लगता है कि वे ऐसे स्थानों के लिए पैदा ही नहीं हुए हैं। विश्वविद्यालय की नींव रखने में अपनी महत्वापूर्ण भूमिका निभाने वाले श्रमिकों की बड़े पैमाने पर छंटनी का मामला जो एक मजबूत असहमति की आवाज की मांग करता है, वहां मध्यम वर्ग चुप्पी साधे रखने में अपना हित समझता है। बुद्धिजीवी वर्ग और शैक्षिक समुदाय, जो मजदूर वर्ग में व्यापक गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी और कुपोषण की समस्याओं से अवगत हैं, भी ऐसे मुद्दों की ओर लगातार आँखें मूंदे हुए हैं। वे विवादास्पद मुद्दे पर पक्ष लेते हुए नहीं दिखना चाहते। अधिकांश, यथास्थितिवादी प्रवृति के प्रभाव में, यह सोचते हैं कि प्रशासन अपनी जगह सही ही होगा और उसने कानून के अनुसार ही निर्णय लिया होगा। वे यह समझने में विफल रहते हैं कि कितनी बार प्रशासन अपने वर्चस्व के आधार पर, कानून की सीमाओं का पालन किए बिना आसानी से बच निकलने में सफल रहता है। छात्र, शोधकर्ता, अध्यापक और इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का प्रशासन अधिक जागरूक और विशेषाधिकार से उपजे उच्च नैतिक कर्तव्य के बावजूद भी उत्पीड़ितों पर अत्याचार जैसे मुद्दों पर चुप्पी की संस्कृति को बरकरार रखते हैं। ऐसे मुद्दों पर चर्चा एक कमरे की चारदीवारों के भीतर आयोजित सम्मेलनों तक ही सीमित रहती है। आम जनता के साथ संबंध स्थापित करने वाले जमीनी काम को यहां कोई महत्व नहीं दिया जाता, न ही उत्पीड़ित वर्ग की समस्याओं पर चर्चा के दौरान उसकी भागीदारी की कोई आवश्यकता महसूस की जाती है। जब तक सीधे उसका स्वार्थ प्रभावित नहीं होता, विशिष्ट वर्ग अपने आसपास हो रही घटनाओं से अनभिज्ञ रहता है। अभिभावक, शिक्षक और प्रशासन छात्रों को पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह देते हैं ताकि वे अपनी डिग्री प्राप्त कर अपने को जीवन में स्थापित कर पाएँ। कैरियरवादी सोच मध्यमवर्गीय मानसिकता पर हावी है। वे जोखिम लेने से कतराते हंै, खासकर तब जब उनके भौतिक सुख प्रभावित होते हैं। इसलिए परिवार, शिक्षा और प्रशासन जैसे शक्तिशाली संस्थानों के समर्थन से, विशिष्ट संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को, उन गरीबों के विपरीत जो लगातार प्रताड़ित हो रहे हैं और जिनके पास विरोध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, शायद ही कभी टूटी और जीर्ण-शीर्ण प्रणाली, जिसकी वजह से वे उन्नति करते हैं, के बारे में सोचने की जरूरत पड़ी हो। स्वार्थ से प्रेरित छात्र अपनी प्रतिक्रिया को उदासीनता या अफसोस तक सीमित रखने का विकल्प चुनते हैं जब कि वे वास्तव में व्यवस्था को जवाबदेह बनाने में सक्षम हैं।

    लेकिन यदि हम ईमानदारी से अपने शैक्षिक उद्देश्यों की जांच करें, तो हमारे आत्म-केन्द्रित रवैये पर सवाल उठना अनिवार्य है। क्योंकि इंसान कभी अलगाव में नहीं रहता है। वह एक सामाजिक प्राणी है और समाज की बेहतरी में ही उसकी व्यक्तिगत भलाई भी है। असल में मानव जीवन के जीने के विभिन्न स्तर हैं - व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रकृति। यदि इनमें से कोई एक भी असंतुलित होता है, तो उसका प्रभाव अन्य पर पड़ना अपरिहार्य है। अगर सामान्य रूप से हमारे जीवन का और विशेष रूप से हमारी शिक्षा का उद्देश्य असमानता रहित एक बेहतर समाज बनाना है तो हमारे लिए आसपास हो रहे मानवाधिकारों के हनन को अनदेखा करना ठीक उसी तरह असंभव होे जाता है, जिस तरह हमारे लिए परिवार में एक बीमार व्यक्ति को। इसलिए केवल आत्म-केन्द्रित तरीके से समाज को देखना उतना ही घातक है, जितना कि किसी का उत्पीड़न करना। अब समय है कि हम आसपास संघर्ष कर रहे पीड़ितों का संज्ञान लें, मुद्दों के मूल कारण को समझें, असहमति प्रकट करने के महत्व को समझें और हमारे आसपास हो रहे मानवाधिकार हनन के खिलाफ अपनी आवाज उठाएं, भले ही इसके लिए कोई कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े।

    विधि की पढ़ाई पढ़ रहे छात्रों के लिए यह और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि वे अपने सामने किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं होने दंे, यदि वे मानते हैं कि उनकी शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ अपने लिए करियर बनाना नहीं बल्कि न्याय को बहाल करना है। वे जो शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वह किसी अजायबघर में रखने की चीज नहीं है, बल्कि समय की मांग के अनुसार उसका उपयोग होना चाहिए। इसकी शुरुआत हमें अपने आसपास से ही करनी होगी। जब ज्ञान सैद्धाँतिक, तर्कसंगत और शक्तिशाली कार्रवाई में परिवर्तित नहीं होता है, तो प्रश्न पूरी शिक्षा पद्धति पर भी उठना चाहिए। कानून की पढ़ाई पढ़ने वाले छात्रों के लिए अपने विश्वविधालय में ही जाँच करना कि जो कानून उन्हें पढ़ाये जाते है, क्या वहां उनका अनुपालन हो रहा है या नहीं, इससे बेहतर इंटर्नशिप का कोई अवसर नहीं हो सकता। जो लोग इन प्रक्रियाओं में शामिल होंगे वे एक समृद्ध अनुभव के साथ अधिक संवेदनशील व्यक्तियों के रूप में बाहर आएँगे, जो अपने आसपास के समाज को बेहतर बनाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहेंगे। जो लोग अन्याय को देखकर अपनी आँखें बंद रखेंगे, वे अपना जीवन कूप-मंडूक की तरह जिएंगे जिसमें शायद भौतिक सम्पन्नता तो हो लेकिन वे उस भावनात्मक संतुष्टि से वंचित रहेंगे जो किसी को अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग समाज की भलाई के लिए करने से प्राप्त होती है।

    शैक्षिक समुदाय कोे तो मानव चेतना को उच्च स्तर पर ले जाकर इस समस्या का हल निकालने में एक सृजनात्मक भूमिका निभानी चाहिए थी। उदाहरण के लिए जब ’90 के दशक की शुरुआत में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर में ऐसी ही समस्या उभरी थी तो मजदूरों के साथ मिलकर प्राध्यापकों और छात्रों के एक समूह ने एक श्रमिक सहकारी समिति का गठन किया था। आई.आई.टी. कानपुर परिसर में कूड़ा उठाने के काम के लिए यह सहकारी समिति अभी भी कार्यरत है।

    हमें उम्मीद है कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली का शैक्षिक समुदाय, नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च, हैदराबाद की ’दृष्टि’ और ’लक्ष्य’ को अपनाएगा, जहां से विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति आए हैं और उन्हें विधि शिक्षा के प्रख्यात दोनों संस्थानों को स्थापित करने का श्रेय जाता है। नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की मुख्य इमारत की सामने वाली दीवार पर विश्वविद्यालय की दृष्टि अंकित है, “विधि और न्याय के बीच की दूरी को पाटना, सबसे हाशिए और बहिष्कृत के संघर्षों का समर्थन करना और सभी के अधिकारों की वकालत करना।” और लक्ष्य अंकित है, “विश्वविद्यालय की गतिविधियों का इस तरह से संचालन करना ताकि वह सामाजिक न्याय की वकालत करे।”

    लेखिकाएं एवं लेखकः विदुषी प्रजापति, एकता तोमर, संदीप पाण्डेय

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