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    कोरोना काल के अनुशासन को कायम रखें, यही हैं पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणाएं


    कोरोना काल के अनुशासन को कायम रखें, यही हैं पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणाएं 


    समझो प्रकृति का इशारा अब तो प्रकृति के इशारे समझ लेने चाहिए। कभी ओलावृष्टि की आफत, टिड्डी आक्रमण, भूकंप, आंधी-अंधड़, चक्रवात यह सब हो क्या रहा है? साल 2020 के प्रारम्भ से ही प्रकृति ने अपना विकराल रूप इंसान को दिखाया है। इतना ही नहीं कोरोना वायरस जैसे मामूली सूक्ष्मजीव से इंसान ने जिस प्रकार से घुटने टेक दिए है, अब यह अहसास कर ही लेना चाहिए कि हम सिर्फ इंसान हैं। प्रकृति प्रबल है। वर्तमान में इंसान अपने अपने इंसानीघरों में बंद था और वन्यजीव स्वच्छंद विचरण कर रहे थे, कभी इंसान ने ही इनको चिड़ियाघरों में बंद कर दिया था। लॉकडाउन के इस अनुशासन को जीवन में उतार लेना चाहिए। 

     ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने स्वच्छता अभियान की हुंकार भरी हो और हाल ही सृष्टि ने अपना नवसृजन किया हो!  "5 जून को पर्यावरण दिवस पर देखो प्रकृति कैसे मुस्कुरा रही है और पेड़ों पर पक्षियों के चहचहाट मन को हर्षित कर रही है। गदगद हो उठा है पर्यावरण। अब तक हम एक ऐसे दौर से गुजरे हैं जहां हमें प्रकृति की परिभाषा समझने का मौका मिला। निश्चित ही आज का दिन प्रकृति का सबसे बेहतरीन दिवस है। आज नदी नालों में सरसता का प्रवाह हो रहा है। स्वच्छ आसमान का सौन्दर्य और प्रात: काल के मुस्कुराते नजारे मन को भा रहे हैं। ना तो शहरों पर धुंधलाहट है और ना ही धुंओं के गुब्बारे। जल एवं वायु प्रदूषण में कमी आना हमारे लिए सकारात्मक संकेत दे रहा है। शहरों में प्लास्टिक का उपयोग कम हुआ है। वन्य प्राणी आम गलियों में स्वच्छंद विसरण करने चले हैं। यह कोई प्रकृति के नहलाने से कम नहीं है। मतलब कि जिन हाथों ने पर्यावरण का विनाश किया था कोरोना रूपी मातण्ड ने उन्हीं हाथों को धोने पर मजबूर किया।" 

     खामियाजा हम ही को भुगतना है दिनों दिन जिस गति से वन्यजीवों की विलुप्ति हो रही है। मानव इसका सबसे अधिक जिम्मेदार है। क्योंकि वनों का विनाश भी मानव द्वारा ही अपने स्वार्थ हेतु किया जा रहा है। वन्यजीवों के अभाव में जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश होता है। जैव विविधता तंत्र का मानव जीवन पर बहुत ही ज्यादा एहसान है। यह पर्यटन से आर्थिक मदद से लेकर इंसानों को रोजगार व आजीविका प्रदान करता है।

    सुनने में आया था कि ऑस्ट्रेलिया में ऊंटों को मारने के आदेश दिए गए। ऊंटों को मारने का केवल यही कारण बताया गया कि यह अन्य जीवों और पक्षियों के लिए साफ पानी को दूषित कर रहे थे। वहां हुए एक ऑपरेशन में 5000 ऊंटों को मार दिया। इससे पहले आदिवासी नेताओं ने सूखाग्रस्त इलाकों में पीने के पानी को बचाने के लिए दक्षिण ऑस्ट्रेलिया ने करीब 10,000 ऊंटों को मारने का आदेश दिया था। ऑस्ट्रेलिया के इस कृत्य की दुनिया भर में आलोचना हुई। ऑस्ट्रेलिया की सरजमीं पर यह उनके लिए तो ठीक ही होगा, लेकिन नुकसान तो आखिर प्राकृतिक संतुलन को भुगतना पड़ा है। यही कारण है कि कई बार इंसान द्वारा लिए गए आनन-फानन के निर्णय प्रकृति के लिए बहुत ही घातक साबित हुए हैं।

    ऐसे अनगिनत देश हैं जहां वन्यजीवों का शिकार बहुतायत से किया जाता रहा है। अफ्रीकी देशों में तो हाथी, गैंडा, शेर, तेंदुआ और भैंसा जैसे जानवरों का शिकार करवाया जाता है। वहां शिकार करवाने वाली निजी कंपनियां भी है और नामीबिया आदि देशों के उत्तरी हिस्सों में कई शिकारगाहें सरकार भी चलाती हैं। जिंबाब्वे में शिकार करना वैद्य है। इन देशों में शिकार के लिए जमीन के विशाल हिस्से मौजूद है। जहां हजारों हैक्टेयर जमीन पर शिकारी आकर खुले में शिकार करते हैं। यह कहीं ना कहीं प्रकृति का खिलवाड़ ही तो है। ऐसे में प्रकृति का प्रकोप झेलने के लिए भी इंसान को कतराना नहीं चाहिए और ना ही हाहाकार मचाना चाहिए। क्योंकि यह तो खुद के कर्मों का फल है, जिसे भुगतना ही है। दुनिया भर में वनों की कटाई रोज हो रही है। अपने स्वार्थ हेतु इंसानों द्वारा वन क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाया जा रहा था। नदियों, तालाबों, झीलों, जलीय स्रोतों को प्रदूषित किया जा रहा था। मानव को सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि पारिस्थितिक तंत्र के लिए भी सोचना चाहिए था।

     इस ईशारे को दुनिया अभी भी समझ जाए, अन्यथा जलवायु परिवर्तन, सूर्यताप, ग्लोबल वार्मिंग के परिणाम और भी घातक होंगे जिन्हें इंसान सहन नहीं कर पाएगा। आने वाले कल के लिए इंसान को तैयार रहना चाहिए अन्यथा अपनी हरकतों में परिवर्तन करना वर्तमान की मांग है।

     प्रकृति मुस्कुराई, तारे टिमटिमाए और परिंदे खुश हुए शहरों के बच्चे, जिन्होंने तारों को टिमटिमाते शायद पहली बार देखा है। छत पर जाने वाले बच्चों को आसमान का स्वच्छ दृश्य कभी नसीब नहीं हुआ था, ये आकाश गंगाएं, सप्तऋषि तारे, शायद कुछ लोगों ने पहली बार इतने टिमटिमाते हुए देखे होंगे। शहरों की धूंध गायब हो गई, नीला आसमान स्वच्छ हो गया। वनस्पतियों के चेहरे मुस्कुराने लगे हैं। शहरों की शामें भी सवेरों की तरह स्वच्छ हो गई। देखा जाए तो कोरोना का प्रभाव प्रकृति के लिए तो पॉजीटिव ही रहा है। यह इंसानों के लिए सुकून की बात है। 

    प्रदूषण के लिहाज से देखें तो लॉकडाउन का समय बहुत ही सकारात्मक रहा है। कई शहरों का प्रदूषण सामान्य स्तर पर पहुंच रहा है। पिछले दिनों जालंधर से धोलाधार हिमालय श्रेणी दिखाई देने की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होती दिखी है। भविष्य में भी कहीं ना कहीं जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए लॉकडाउन जैसे विकल्प सामने आएंगे। क्योंकि दिनों दिन बढते ग्लोबल वार्मिंग से पृथ्वी पर कई स्थानों पर ताप सहन ना कर पाने की स्थिति बन रही है। भूगोलवेत्ताओं का मानना है कि समुद्रीय जल का स्तर बढ रहा है। और तापक्रम में निरंतर बढोतरी होने से कई प्रजातियों में आनुवंशिक गुणों पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। और तो और अधिक प्रदूषण सहन ना कर पाने वाली प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकती हैं। सामान्यतः ऐसा देखा जा रहा है। तो इस वक्त जब एक वायरस के प्रभाव से पृथ्वी के ग्लॉबल वार्मिंग पर भी स्तरीय घटाव महसूस किया है, ये सब आंकड़े बता रहे हैं। 

    कोरोना महामारी से हर तरफ दहशत फैली हुई है। लॉकडाउन की स्थिति में शहरों के गलियारे सुनसान हैं, सड़कों पर सन्नाटे हैं। ऐसा लगता है कि इस सृष्टि का नवसृजन हाल ही हुआ हो। ना होर्न, ना साधनों की आवाजें। सड़कें इतनी साफ कि मानो स्वच्छता पखवाड़ा चल रहा हो। जी हां, यह प्रकृति द्वारा चलाया जाने वाला स्वच्छता अभियान है। इसमें इंसान कुछ हस्तक्षेप नहीं कर सकता। क्योंकि अब अलग राजा और अलग प्रजा है। अब दौर है पर्यावरण की सुन्दरता बढाने वाले चहकते पक्षियों का। सत्ता भी उनकी और शासन, प्रबंधन भी। सुबह व शाम के समय पक्षियों की चहचहाहट इतनी मधुर लगती हैं, जैसे हम किसी पक्षी अभ्यारण्य में खड़े हो। कहीं ना कहीं जहन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर इतने मधुर बोलने वाले पक्षी इतने दिनों तक कहां थे और अब हमारे चारों तरफ कहां से आ गए हैं। जी नहीं, ये पक्षी कहीं नहीं गए थे और ना ही कहीं से आए हैं, बल्कि ये यहीं थे। हम अपनी भौतिकताओं में अंधे, बहरे और बेपरवाह हो चुके थे। धनार्जन की चाह में हम इतने खो गए थे कि प्रकृति की सुन्दरता का अहसास भी नहीं कर पा रहे थे। 

    पक्षियों को बाधा पहुंचाने हेतु ना तो साधनों का जहरीला धुंआ है और ना ही चिमनियों की बदबू। हर तरफ स्वच्छ वातावरण है। आसमान के अदृश्य हुए रंग रूप साफ दिख रहे हैं। रात्रिकालीन आकाशगंगाएं मानों पृथ्वी पर फूल बरसा रही हो। पक्षियों के उड़ने व करतब करने को पूरा जहां खाली है। पेड़ों की शीतल छाया, प्रदूषण रहित हवा के मंद मंद झोंके, पक्षियों को पूरा माहौल देते हैं। इस वक्त परिंदों को पहली बार लग रहा है कि यह संसार सिर्फ उनका है। 

    कई घूमने के आदि लोग घर में बैठे बैठे क्या करें, तो उन्हें कुछ पक्षियों के लिए भी कर्तव्य अदा करने का समय मिला, दाना पानी की व्यवस्थाएं जोरों पर हैं। सारे लोग घरों में बंद हैं और बाहर की दुनिया सिर्फ परिंदों की है। तीतर बटेर, तोते, मैनाएं, गौरैया, मोर, मोरनी पहली बार छतों पर आ रहे हैं। इनके साथ साथ पशु भी कहां पीछे रहने वाले, पशुओं ने भी गांवों व शहरों में स्वच्छंद विसरण बढाए हैं। अब बिना रोकटोक गलियों में घूमते मिलते हैं। ये सोच रहे होंगे कि सारे इंसान गए कहां? हर रोज हमारे महकमें का कोई ना कोई पशु सड़क दुर्घटना में आहुति दे देता था, अब तो सारी सड़कें खाली हैं, यदाकदा ही कोई दिखता है। कुछ पशु पक्षियों ने तो यह भी सोच लिया होगा कि हमारी बारी गई और अब तो इंसानों को चिड़ियाघरों में बंद किया है। अब अपने भी सैर सपाटे के अच्छे दिन आए हैं। कुछ थके दुबले गाड़ियों व कारों के झपट्टे मात्र से कांपने वाले पशु तो भगवान का शुक्रिया अदा करते होंगे कि हे ईश्वर तूने हमें भी घुमने फिरने का मौका दिया। जरा कुछ दिन और शहरों की हवा खाने देना, क्या पता कल ये सब सड़कों पर निकल जाएं और हमें जंगलों का रूख करना पड़े। फिर तो दिनभर प्रदूषित हवा से सांसें थमनी ही हैं। इसी हवा ने हमारी बिरादरी के कई पशुओं की जिन्दगी लील ली।

    लॉकडाउन में दिखी पशु पक्षियों की इस खुशी से साफ जाहिर है कि आखिर प्रकृति प्रबल है। इसके सारे जीव जन्तु इंसानों के क्रियाकलाप से दुखी हैं। ये ही जीव प्रकृति की सुन्दरता के अनमोल आभूषण हैं। इनमें से कुछ जीवों की प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं जिससे प्रकृति के ये सुन्दर नगीने धुलमिल रहे हैं, इससे प्राकृतिक व पारिस्थितिक सुन्दरता का हनन होता जा रहा है। दुनिया ने स्पष्ट रूप से समझ लिया है कि जलवायु परिवर्तन का गुनहगार इंसान ही है। क्यों ना कोरोना के बाद भी दुनिया के देशों द्वारा साल के कुछ निश्चित दिनों में लॉकडाउन अनिवार्य कर दिया जाए। जिससे इन पशु पक्षियों को हमेशा एहसास होता रहे कि यह संसार उनका भी है।

    अरविन्द सुथार, वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण लेखक, जालौर 

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