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    जैविक खेती की धुन में बजा रहे आय की बंशी

    जैविक खेती की धुन में बजा रहे आय की बंशी 
    (किसान बंशीलाल धाकड़ की सफलता की कहानी)
     अरविन्द सुथार, वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण लेखक, जालौर। 

    मीरा ने कहा था, "काश! मैं बंशी बन हर वक्त तुम्हारे होंठों पर रहती। तुम छेड़ते तान मेरी, मैं फिजा में महक जाती।" जी आदिवासी बाहुल फिज़ा में जैविक खेती की महक बिखेरने वाले एक किसान जिनका नाम आजकल काफी लोकप्रिय व जाना पहचाना है। हम बात कर रहे हैं बंशीलाल धाकड़ की। बंशी प्रतापगढ़ जिले की छोटी सादड़ी तहसील के गाँव राजपुरा के निवासी हैं। बंशीलाल विगत 7-8 साल से गौ आधारित जैविक खेती कर रहे हैं। केवल खेती ही नहीं बल्कि खेती के साथ साथ जैविक खेती की कई तकनीकियां भी इजाद कर रहे हैं। आपका कहना है कि मैं पहले परम्परागत खेती करता था, जिसमें लागत व मेहनत अधिक व आमदनी सामान्य ही थी। परंपरागत प्रश्न कुछ ऐसी थी उनमें यूरिया डीएपी डालना जरूरी हो जाता था, जिससे लागत और भी ज्यादा बढ़ जाती थी। कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रशिक्षणों, टीवी पर कृषि कार्यक्रमों ने मुझे व मेरी खेती को बदल दिया, मैंने कैसे भी करके अपने खेत में जैविक खेती की शुरुआत कर दी। हालांकि प्रारम्भ में लगता था कि उत्पादन नहीं हुआ तो क्या करूंगा, लेकिन मन में एक जुनून और हौंसला भी था कि नहीं मुझे जैविक खेती ही करनी है। पहले साल तो मैने मिट्टी की जांच करवाई। इसके बाद समय पर जुताई करके कृषि अपशिष्टों को मिट्टी में दबाए तथा हरी खाद उगाकर जमीन की उर्वरा शक्ति बढाने का कार्य किया। उसके बाद रबी सीजन में जैविक गेहूं उगाया। गेहूं में मेरे कोई समस्या नहीं आई, केवल नाइट्रोजन की कमी आई। ऐसे में हमारे यहां पर कृषि विभाग में कार्यरत राधेश्याम धोबी हमारे खेत पर आए, उन्होंने मुझे जीवामृत बनाना सिखाया। मैने गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन व पीपल के नीचे की मिट्टी लाकर इसे बनाना जारी रखा, देखते ही देखते नाइट्रोजन की पूर्ति हो गई।


           बंशीलाल आगे बताते हैं कि जब जीवामृत से फायदा हुआ तो मैने ठान ली की अब गौ आधारित खेती ही करनी है। मेरे घर पर तीन गायें व एक भैंस हैं। जिनसे सालाना 60-70 हजार की आमदनी दूध बिक्री से होती है, तथा कंपोस्ट व केंचुआ खाद की आय भी पशुपालन के कारण ही होती है। यह सामान्यत: सालाना 1 लाख तक हो जाती है। वर्मी कंपोस्ट के अलावा मैं केंचुए भी बेचता हूँ। वर्मीवॉश का प्रयोग तो मैं सिंचाई के साथ हमेशा से ही करता आया हूँ।
         मिश्रित बागवानी, सोयाबीन, मूंगफली, गेहूँ, अजवायन, चना, अफीम, लहसुन, प्याज, धनिया आदि कुल मिलाकर 2-3 हैक्टेयर में सालाना 3-4 लाख की आमदनी हो जाती है। ये सारी फसलें हेर फेर कर फसल चक्र के आधार पर लगाता हूँ। फसल चक्र का मेरी जैविक खेती में बहुत फायदा होता है़। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का ज्यादा नुकसान नहीं होता है। बंशीलाल अपने खेत पर अन्य किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण भी देते हैं और प्रतापगढ व चितौड़गढ के सरकारी विद्यालयों में मीड-डे-मील हेतु कीचन गार्डनिंग भी करवाते हैं। 
         मैं बंशीलाल धाकड़ अन्य किसानों से भी कहना चाहता हूँ कि रसायनों का घातक प्रभाव केवल जमीन पर ही नहीं बल्कि इंसानों, पशुओं व वनस्पतियों में प्रत्यक्ष रूप से देखा जा रहा है इसलिए अपनी खेती में कम से कम 1 एकड़ की खेती जैविक विधियों से करें।

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