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    "प्राकृतिक आपदा से भाव विह्वल मानव"

    "प्राकृतिक आपदा से भाव विह्वल मानव"

    "साँसे हो रही कम, आओ पेड़ लगाएं हम"

    आज के जीवन काल में हम कोई न कोई उदेश्य लेकर चलते है। जैसे:- कोई पेड़ लगाता हैं,कोई भोजन खिलाता हैं कुछ लोग निस्वार्थ लोगों की सेवा करते हैं। कुछ जन देश सेवा में जीवन समर्पित करते हैं और कोई भक्ति मार्ग
    पर चल कर लोगो को ज्ञान रूपी सागर में अपना उद्देश्य बना लेते है।

    लेकिन हमारा ज्ञान तब शून्य हो जाता हैं, जब अचानक से कोई प्राकतिक आपदा विकराल रूप लेकर हमारे सक्षम खड़ी हो जाती हैं। वो कभी "सुनामी ", "प्लेग " तो कभी "स्वाइन फ्लू " के रूप में आती रही है। इन सब आपदाओं से लोगों का जीवन अस्त व्यस्त हो रहा है। वर्तमान में "कोरोना " जैसी वैश्विक महामारी हम सब के समक्ष मुँह फैलाये खड़ी है। आज इस वैश्विक महामारी से पूरा विश्व संकट में आ गया है। आज इस संकट से लड़ने के लिए कोई सटीक उपचार नहीं आ पाया है। मनुष्य दिन प्रतिदिन कैसी कैसी समस्याओ का सामना कर रहा है। यह सब देख कर मन भाव विहल हो जाता है। आज भी हमारे लोग फइटर्स की तरह निरंतर प्रयासरत हैं जैसे
    ड्रॉक्टर्स :- जिसे हम भगवान का प्रतिरूप भी कहते है। आज इसी वैश्विक महामारी से लोगो को बचाने के लिए दिन रात सेवा में लगे हुए है। शायद इस समय हम ड्रॉक्टर की मनोदशा का अनुमान भी नहीं लगा सकते, आज अपनी


    जान जोखम में डालकर अपना कर्तव्य निभा रहे है।इस कोरोना काल ने हमारे कुछ ड्रॉक्टर की जीवन लीला को भी लील लिया है।
    सुरक्षा कर्मी :- जहाँ देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी इनके कंधो पर हैं वही आज इस त्रासदी से लोगो को बचाने की जिम्मेदारी भी इनके ऊपर आ गयी है। ये सुरक्षा कर्मी दिन रात,धूप,सर्दी, गर्मी की चिंता किये बिना परिवार से दूर रह कर भी हम सब की सुरक्षा करते है। कभी भूखा भी रहना पड़े लेकिन कर्तव्य परायणता में कोई कमी नहीं आती
    है
    सफाई कर्मी :- आज इस वैश्विक महामारी में सफाई कर्मी भी अपनी जान की परवाह न करते हुए लोगो की सेवा में
    लगे हुए है। ये भी एक फइटर्स की तरह हर तरफ साफ़ सफाई का पूरा ध्यान रख रहे है। और समय समय पर लोगों के घर द्वार और बाहर सड़क की सफाई और सेनेटाईज़ेड कर रहे है।
    "धार्मिक दृष्टि कोण " के अनुसार सिक्के के दो पहलू होते हैं जैसे जहाँ हम 'क्रांति का दौर कहते हैं वहीं भक्ति से
    विमुख नहीं हो सकते है। कई युगो से यह बात हम सब के सामने आती रही हैं चाहे वो त्रेतायुग हो या द्वापरयुग हो या

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    आज का कलियुग , जब जब धर्म की हानि हुई हैं तब तब ईश्वर ने कोई न कोई अवतार अवश्य लिया है। इसलिए उसका रूप ही बदल गया है। आज वह प्राकतिक आपदा के रूप में हम सब के सामने है। जब जब ऐसी आपदा सामने आती हैं तभी मनुष्य भक्ति मार्ग को चुनता हैं और हर वो प्रयास करने लगता हैं जिससे ईश्वर उसकी रक्षा करे।
    मेरा मन इस मानव जीवन की विडंबना को देख कर द्रवित हो उठता है। आज जब लोग अपनों से दूर और कोरोना के बचाव के लिए एक कैद पक्षी की तरह जीवन यापन करने पर मजबूर हो गया है। जो मनुष्य इस वैश्विक महामारी के आने से पहले रोज़ सुबह उठ कर रोजी रोटी की तलाश में निकल जाता था और शाम को अपने परिवार का पेट भरता था। वो मनुष्य आज भयंकर परेशानी से जूझ रहा है। आज लोगो की मनो दृष्टि ऐसी हो गयी है की लोग कहने
    लगे है कि भूख से मरने से अच्छा अपनों के बीच जाकर मरे इसी वश वो लोग मीलो लम्बी दूरी पैदल ही चलकर अपनों में जाने कि होड़ में खड़े हुए है।
    ये सब देख और सुन कर लगता हैं कि समस्याए तो बहुत है। जिधर दृष्टि डालो उधर वेदना और चीत्कार से भरी आवाजे सुनाई दे रही है। हर बात को कहना बहुत आसान हैं पर सहना बहुत ही मुश्किल होता है। आज इस कोरोना काल में लोगो के दर्द देखते हुए मेरे शब्द बहुत कम पड़ रहे हैं। पर फिर भी सभी जन मानस से मेरा अनुरोध है कि
    आज हम सबको सबका सहयोग देना चाहिए।
    घर पर रहे, सुरक्षित रहे जय हिन्द-जय भारत

    पूनम सिंह
    सब एडिटर

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