Header Ads

  • INA BREAKING NEWS

    वर्षों से गुलामी में जी रहा हमारा देश, कभी शारीरिक तो कभी मानसिक गुलामी का शिकार हुआ हमारा प्यार भारतवर्ष


    वर्षों से गुलामी में जी रहा हमारा देश, कभी शारीरिक तो  कभी मानसिक गुलामी का शिकार हुआ हमारा प्यार भारतवर्ष


    पांच साल में एक बार हैं,
    दर्शन देने आते,
    घूमे अकसर पहने खादी,
    नेता हैं कहलाते।

    लेकर वोट हमारी वो तो,
    हमें हमेशा लूटें,
    देश अमीर बनाने वाले,
    सपने सारे टूटे।

    झूठे देकर भाषण सारे,
    चोर बने हैं राजा,
    सारे बजा रहे जनता का,
    बिना बैंड के बाजा।

    बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाते,
    अपने अनपढ़ नेता,
    बिना सिफारिश पढ़े लिखे को,
    काम न कोई देता।

    भ्रष्टाचार मिटा देंगे हम,
    कहते भ्रष्टाचारी,
    पैसे बिन कोई काम नहीं,
    होता अब सरकारी।

    कुर्सी मिलते खून हमारा,
    सारा ये चूसेंगे,
    पांच साल में कहीं दुबारा,
    हमको न पूछेंगे।

    भारत देश का अब तक बड़ा दुर्भाग्य रहा है कि यहां के लोग शारीरिक या फिर मानसिक रूप से किसी न किसी बाह्य शक्ति के गुलाम रहे हैं। यही कारण है कि कभी सोने की चिड़िया कहा जाने वाला हमारा प्यारा भारतवर्ष कुछ भ्रष्टाचारी नेताओं और अफसरों की मुट्ठी में आकर सिमट सा गया है। हम सभी जानते हैं कि आजकल पैसे की दम पर कौन सा गलत काम नहीं किया जा सकता। जिसे खुलकर अपराध करना होता है, वह गुंडा बन जाता है और जिसे लोगों से छिपाकर अपराध करना होता है, वह नेता बन जाता है। सरकार कोई भी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है तो इस बात से कि वह भारत के हित के प्रति कितना कर्तव्यनिष्ठ है। आपको कोई अवैध खनन कराना हौ, बलात्कार की सजा से बचना या फिर आपने किसी की हत्या की हो और आपको उससे बचने का कोई उपाय न सूझ रहा हो तो आप किसी ऊंचे ओहदे पर बैठे तुच्छ मानसिकता और भ्रष्टाचार की सबसे ऊपरी डंडे पर बैठे नेता या अफसर से संपर्क साध लीजिए। फिर क्या, आपके अपराध के केस में इतने एंगल, इतने लॉजिक्स का तड़का लगाया जाएगा कि सामने वाला इंसान बोल उठेगा कि नहीं, यह अपराध तो है ही नहीं। यह तो देश सेवा है। 

    हमारे देश को कुछ सौ साल पहले मुगलों ने लूटा, फिर अग्रेंजों ने उसे गुलाम बनाकर रखा और आज हम खुद ही एक आपराधिक मानसिकता के गुलाम बने बैठे हैं। हम बाहर जाकर इस चीज पर दिमाग लगाएंगे कि साला, उसकी जेब से 500 रुपए कैसे निकालें और घर आकर अपने बच्चों को बताते हैं कि अरे भगत सिंह हीरो थे इस देश के। उनके जैसा कोई नहीं। बाहर जाकर हम रूल्स तोड़कर आएंगे और बच्चों से उनकी किताबों की ओर इशारा करके उन्हें ट्रैफिक रूल्स सिखाएंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम चाहते हैं कि सामने वाला सारे रूल्स फॉलो करे लेकिन जब बात हम पर आती है तो हम रूल्स तोड़ने में ही खुद की शहंशाही समझते हैं।

    बात करते हैं अब देश के महत्वपूर्ण मुद्दों की....

    एक नेता ईमानदारी को शस्त्र बनाकर समाज के बीच आकर लोगों को विकास की एक नई उम्मीद दिखाता है। देश से गरीबी को खत्म करने की बात करके सभी के सामने हीरो बन जाता है। फिर कुछ सालों बाद पता नहीं कौन सा जादू हो जाता है कि गरीबी देश की तो नहीं जाती है लेकिन उसकी गरीबी जरूर चली जाती है। यही हाल कुछ भ्रष्ट अधिकारियों का भी होता है. उदाहरण के लिए परिवहन विभाग, विद्युत विभाग आदि। लोग आपस में लड़ाई करते हैं, मुकदमा दर्ज होता है और थाने में कार्रवाई शुरू होती है। असल में यह कार्रवाई केस की कम और जेब की ज्यादा होती है। लड़ाई करने वाले दोनों पक्षों में से जो भी पक्ष कमजोर और मजबूर दिखाई देता है, उससे पैसे की मांग की जाती है। उससे पैसा लेकर, उसे उपहार स्वरूप गालियां देकर मामला रफा दफा कर दिया जाता है। अगर उसके पास देने के लिए पैसे नहीं हैं तो फिर उसके ऊपर ठोस केस बनाकर पकड़ा जाता है और अखबार में अच्छी सी फ़ोटो देकर अगले दिन चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ते हुए उसमें लिखी वाहवाही देखकर बड़ा इतराते हैं। यही हाल कुछ समाजसेवियों का है। जैसे किसी जगह पर अपना विज्ञापन अपने नाम से छपवाने के लिए पैसा देना होता है। ठीक उसी प्रकार कुछ कथित समाजसेवियों ने एक नया तरीका ढूंढ निकाला है। हाथ में 30-40 केलों के साथ 15-20 लोगों की पलटन लेकर निकल पड़ते हैं अपनी वाहवाही कराने व एक गरीब की इज्जत की नुमाइश सरेआम बाजार में नीलाम करने के लिए। 100-200 रुपयों में उनकी खबरें 08-10 अखबारों में छप जाती हैं। अब ये डायरेक्ट अपना विज्ञापन देते तो शायद 1000-2000 रुपए ख़र्च होते, वो भी सिर्फ एक अखबार के लिए। यहां तो 100-200 में ही 08-10 अखबारों में छा गए। समाजसेवा करने के लिए लोग आते तो बड़े जुनून के साथ हैं लेकिन फिर उन्हें लग जाता है फ़ोटो छपवाने का चस्का। उनके भीतर मदद करने का भाव खत्म हो जाता है। 04 केले देकर 40 जगह 'सौभाग्य-प्राप्त' टैग लाइन के साथ फ़ोटो लगाकर भी वे सोचते हैं कि उनकी यह सेवा सही मायनों में सार्थक हो रही है। यह तो सिर्फ उनकी गलतफहमी है। 

    एक व्यक्ति नियमतः कोई काम 100 रुपये में करा रहा है और हम वहां पहुंच गए। हमें अब बहुत जल्दी है तो हम 100 रुपए के काम के लिए  200 का लालच देकर वह काम जल्दी करवा लेंगे। यानी कि हम 100 रुपये एक्सट्रा देकर देश के लोगों को भ्रष्टाचार करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। ऐसा भला कहाँ होता है यार कि पैसे देकर हम गलत काम करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और बात करते हैं नियमों की। देश में फैले भ्रष्टाचार के लिए जितने जिम्मेदार अधिकारी/नेता/अन्य हैं उतने ही समाज में रह रहे हम लोग भी हैं। उन्हें रिश्वत देने का यह रास्ता आखिर दिखाया तो हमने ही। वैसे पैसों के ऊंचे गठ्ठरों पर बैठे लोग शायद इस बात को न समझें। फिर भी एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।

    आज किसी गरीब व्यक्ति की वाइफ की डिलीवरी होनी होती है और उसे किसी बड़े अस्पताल में रेफर करने की बात बोली जाती है तो छुटपुट एम्बुलेंसकर्मी मजबूरी का फायदा उठाकर 100 से 2000 रुपयों तक की मांग करते दिखाई देते हैं। किसी मजलूम की जमीन हड़पनी होती है तो तहसील में उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर मोटी रकम देकर यह काम भी हो जाता है। किसी को बेवजह परेशान कराना है तो वह भी पैसे देकर कराया जाता है। यानी कि हर हाल में पिसने  वाले सिर्फ दो श्रेणी के लोग हैं- गरीब और मध्यम वर्गीय। हर चीज का टैक्स हम देते हैं। उसी टैक्स के कोष पर एक जाहिल नेता को पॉवर देकर वह राशि हड़प ली जाती है। जैसे सड़क निर्माण में पास हुए 10 करोड़ रुपए। पर लागत आती है सिर्फ 04 करोड़। 06 करोड़ कहाँ गए, नेता के खाते में। इसी तरह से न जाने कितने केस हमारे सामने आते हैं लेकिन हमें क्या, हमने ठेका थोड़े ही ले रखा है देश हित मे सोंचने का। ऐसे ही देश का कई प्रतिशत पैसा भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों में बंद हो जाता है। फिर इसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और चीजों की कीमतें बढ़ने लगती हैं। लेकिन हमें क्या। हम तो फेसबुक पर विरोध तो कर ही रहे हैं न। इससे ज्यादा और भला हम क्या करें। कई ग्राम प्रधान, सेक्रेटरी, बीडीओ आदि घोटाला करते रहते हैं और कुछ चमचे गलत होने पर भी उनकी तबलमंजनी करते हैं, जैसे वह कोई देवता हो। सीधे शब्दों में कहें तो हमारी मानसिकता किसी इंसान की नहीं वरन् राक्षस जैसी बन चुकी है। जितना हड़प सको। हड़प लो देश के पैसे को।

    फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि अरे सतयुग आएगा। सब अच्छा हो जाएगा। कोई तो आएगा जो यह सब ठीक कर देगा। यही बात जीवन भर सोंचकर हम भी इसी धुन में रमे रहते हैं और एक दिन यहां से निकल लेते हैं। पर ये नहीं सोचते कि आगे आने वाली पीढ़ी और अपने देश को हम किस गहरे, अंधेरे गर्त में धकेल रहे हैं। फिल्मों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले हीरो की एक्टिंग देखकर हम खूब तालियां बजाते हैं लेकिन सिर्फ तालियां ही बजाते हैं, उससे सीखते कुछ नहीं। तो आपसे कहूंगा कि तालियां तो हि..डे भी बहुत बजाते हैं लेकिन इनकी तालियां आपकी तालियों से दमदार हैं। फिल्मों से हम अश्लीलता सीखेंगे, गालियां सीखेंगे। अभद्रता सीखेंगें। पश्चिमी सभ्यता को सीखेंगे। लेकिन जो सीखने वाली चीजें , उन्हें देखकर सिर्फ तालियां बजाकर छोड़ देंगे। 500 रुपए की टिकट लेकर, 200 का ऑयल खर्च करके जो फ़िल्म हम देखने जाते हैं, क्या उससे 02 पैसे की भी सीख हम लेते हैं 03 घंटों में..?

    ऐसे ही खुश होते रहो अपनी दयनीय दशा पर, तालियां बजाते रहो लेकिन याद रखना आपका देश सिसक-सिसककर खून के आंसू रो रहा है। देश को कुछ देने की बजाय उसे लुटवा देने में पूरे जी जान से जुटे हो तुम।

     सौरभ सिंह राजपूत
         न्यूज़ एडिटर
    आईएनए न्यूज़ एजेंसी

    Post Top Ad


    Post Bottom Ad


    Blogger द्वारा संचालित.