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    कृषि कौशल व उद्यमिता विकास से बदलेगी गांवों की तस्वीर


    कृषि कौशल व उद्यमिता विकास से बदलेगी गांवों की तस्वीर 


    अरविन्द सुथार, कृषि सलाहकार एवं लेखक, जालौर। 

     [देशभर में आत्मनिर्भर भारत और उज्जवल भारत की कल्पनाएं की जा रही है, देश का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण भारत का है। कृषि प्रधान देश की छवि तभी बदल सकेगी जब ग्रामीण विकास व कृषि विकास पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा। ग्राम्य जीवन ही देश का आईना है। यदि गांव स्मार्ट नहीं होंगे तो भारत के आत्मनिर्भर बनने में भारी कमी रहेगी। ग्रामीण रोजगार समय की मांग है और यह तभी साकार होगा जब युवाओं में कृषिगत उद्यमिता का कौशल व इसके प्रति रूचि उत्पन्न की जाएगी]
            
    युवाओं में उद्यमिता कौशल विकसित करके छोटे बड़े ग्रामीण उद्यमों का विकास होगा, जिससे गांव हाइटेक बनेंगे। गांवों की अपनी अलग पहचान बनानी होगी। फसल उत्पादन से लेकर विपणन तक कार्य गांवों में ही होने लगेगा। उपभोक्ता सीधे नजदीकी गांवों से आवश्यक वस्तुएं खरीद सकेंगे। इतना ही नहीं युवाओं की कृषि के प्रति नई रूचि जाग्रत होगी। इस प्रकार से भारत की आत्मनिर्भरता अवधारणा निश्चित ही ग्रामीण भारत को प्रोत्साहन देगी। हम इस बात से वाकिफ हैं कि ग्रामीण भारत में महिलाओं की स्थिति दयनीय है। महिलाओं के सर्वागीण विकास पर अभी बहुत सारा विचार मंथन शेष है। पुरुष प्रधान समाज में, खासकर कृषि की बात करूं तो महिलाओं के महत्व को नजरअंदाज ही किया जाता रहा है। जिससे उनके सशक्तिकरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ग्रामीण महिलाओं में बहुत अधिक कौशल होता है। खेतीहर महिलाएं खासकर खाद्य पदार्थों के परंपरागत प्रसंस्करण के लिए जानी जाती है। आत्मनिर्भर भारत कल्पना से इन प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का मंडीकरण या बाजारीकरण हो सकेगा और ठेठ ग्रामीण व परंपरागत उत्पादों को अच्छे उपभोक्ता मिल सकेंगे व इनकी गुणवत्ता में निखार आएगा। आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को ग्रामीण भारत, महिला सशक्तिकरण के उत्थान की दृष्टि से देखना होगा। देर सवेर निश्चित ही हमारे गांव नए भारत का रूप लेंगे। ग्रामीण हाट बाजार मजबूत होंगे और शहरों से गांवों की और पलायन होगा।


    गांवों में डेयरी विकास की संभावनाएं प्रबल है। यदि हर 5-7 गांवों के समूह में एक डेयरी उत्पाद प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना हो। अभी वर्तमान में गांवों को केवल दूध संकलन का जरिया माना जा रहा है। गांवों से दूध संकलित करके नजदीकी बाजारों में पहुंचा दिया जाता है। परिवहन में समय लग जाने से दूध की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है। इसके लिए गांवों में ही दूध की प्रोसेसिंग की यूनिट्स लगवाकर कृषकों को इसका अधिक लाभ दिया जा सकता है। डेयरी प्रोसेसिंग से दूध के पाउच पैकिंग, छाछ, दही पैकिंग, मिठाई, पनीर या घी बनाना व पैकिंग करने संबंधित कार्य छोटे स्तर पर शुरू हो सकते हैं व नजदीकी बाजारों में आउटलेट बनाकर बेच सकते हैं। बशर्ते ये सभी कार्य दूध के प्रोक्यॉरमेन्ट से लेकर मार्केटिंग तक ग्रामीण किसान के द्वारा ही किए जाएं। और इसमें विपणन में ग्रामीण संस्कृति को आधार बनाया जाए, तो निश्चित ही किसान की मार्केटिंग कार्यकुशलता बहुत फायदेमंद होगी।


    फलों की प्रोसेसिंग, जैम, जेली, अचार, मुरब्बा और अन्य सभी उत्पाद जो फलों द्वारा तैयार होते हैं। फूलों की खेती जिन गांवों में होती है। वहां पर इत्र व प्राकृतिक रंग व गुलाल बनाने का कार्य हो सकता है। इसके लिए ग्रामीण महिलाओं को मौका दिया जाए जिससे महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकें। ग्रामीण महिलाएं नियमित क्रम में निर्धारित समय के अनुसार इस प्रकार के प्रोसेसिंग प्लांट में सेवाएं दे सकती हैं। साथ ही इन महिलाओं को फलोत्पादों की मार्केटिंग में भी हाथ बंटाने का मौका मिले, तो निश्चित ही ग्रामीण रोजगार का हम स्थाई ढांचा तैयार कर सकते हैं। गांवों में पशुआहार निर्माण की छोटी छोटी इकाइयां शुरू की जा सकती हैं। इसके लिए युवाओं को मौका दिया जाए। साथ अन्य सभी प्रकार के गैर कृषिगत उत्पादों का निर्माण भी गांवों में ही हो, तो निश्चित ही गांव आत्मनिर्भर बनेंगे। देश का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण भारत के रूप में जाना जाता है। गांवों में बायोगैस प्लांट, गोबर से लकड़ी व गत्ते बनाना, कंपोस्ट निर्माण व अन्य जैविक कीटनाशकों का निर्माण भी करवाया जा सकता है। प्रत्येक जिले के जिला उद्योग केन्द्र व कृषि एवं उद्यान विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों के सांझा प्रयासों की आवश्यकता होगी। सबसे पहला कार्य तो युवाओं को प्रशिक्षण देने का होगा, प्रशिक्षण भी गांवों में ही दिया जाए, ताकि ग्रामीण महिलाएं भी इसमें हिस्सा ले सकें। 


    जैविक खेती कृषि में नई संभावनाओं से भरपुर है। यह कृषि पर्यटन के अलावा शहरी उपभोक्ताओं को गांवों की और आकर्षित करने का एक माध्यम भी है। जैविक खेती जिन गांवों में होती है, उन किसानों को फसल विविधीकरण पर कार्य करवाया जाए, जैविक दूध, शहद से लेकर फल फूल व खाद्यान्न तक के पूरे उत्पादन को खेत पर ही बेचा जा सकता है। या ऑनलाइन मार्केटिंग करके जैविक खेती में आत्मनिर्भरता कायम की जा सकती है। इसके लिए जैविक खेती करने वाले किसान को कुछ उपभोक्ता के आवेदन आमंत्रित करने चाहिए ताकि वह साल भर अपने कृषि उत्पाद उन उपभोक्ताओं तक पहुंचा सके। और फैमिली फार्मर के रूप में सेवाएं दे सके। 

    कृषि को व्यावसायिक रूप देकर भी गांवों में कृषिगत रोजगार बढा सकते हैं। जिसमें मधुमक्खी पालन, रेशम कीटपालन, और पशुपालन को संरक्षित खेती के विषयों से जोड़ना होगा, इस प्रकार के प्रयोग करने होंगे कि ये विपरीत मौसमी परिस्थितियों में भी उत्पादन दे सकें। शहद उत्पादन कृषि में पशुपालन की तरह सहायक सिद्ध हो सकता है। लेकिन शहद के उचित प्रसंस्करण व प्रोसेसिंग करने की इकाइयां गांवों में खुले। जिन जिलों में शहद उत्पादन की संभावनाएं तलाशी जा रही है, वहां शहद के फिल्टर और पैकेजिंग की कोई राह दिखाई नहीं देती। मैने जो बात संरक्षित उत्पादन की लिखी, इस बात पर गौर करना होगा, क्योंकि इनके पालन में वातावरण का काफी असर रहता है। गांवों इस प्रकार के कृषिगत कुटीर उद्योंगों के विकास से गांवों का आत्मनिर्भर होना तय है।

    सरकार को हर जिले में ऐसे कुछ गांवों को चिन्हित करके उन्हें औद्योगिक क्षेत्र का दर्जा देना होगा, जहां अच्छा, घना व विविध कृषि उत्पादन होता हो, उस गांव के आस पास के गांवों के काफी किसान अच्छी क्वालिटी की फसलों का उत्पादन करते हो, ऐसे कुछ केन्द्र में स्थित गांवों को कृषि औद्योगिक क्षेत्र का दर्जा देकर हाइटेक करना होगा। जिस प्रकार से जिलों में रिको इण्डस्ट्रीयल एरिया विकसित किया जाता है। ऐसे ही कृषिगत एग्रो इण्डस्ट्रीयल एरियाज विकसित करने होंगे। जिसका सीधा लिंक जिले के तमाम किसानों से हो, साथ ही किसानों व ग्रामीण युवाओं को ही उनमें रोजगार मिले। इस प्रकार के कार्यों से फल, सब्जी व अन्न की खराबी बहुत कम होगी। विकट परिस्थितियों में भी ऐसे कारोबार चल सकेंगे। क्योंकि कृषि उत्पादन नही रूकता तो कृषि उद्योग कैसे रूक सकेगा। सरकार को हर जिले में ऐसे गांव विकसित करके औद्योगिक दृष्टि से सारे तामझाम लगाने होंगे। साथ ही उनमें कुछ नियमों के द्वारा उन्हें ही कार्य करने का मौका दिया जाना होगा, जो किसान है, फसल उत्पादक है। अन्यथा ऐसे क्षेत्रों पर पूंजीपतियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। 

    कृषि पर्यटन एक नवीन अवधारणा है। शहरों के लोग बंद मकानों में रह रहकर तंग आ गए हैं। वो महिने में एक दो दिन नजदीकी गांवों में भ्रमण को जाना चाहते हैं। गांवों की गोबर मिट्टी की संस्कृति में रहकर खुले में निवास करना चाहते हैं। यही एक ऐसा मोड़ है जहां से ग्रामीण कृषि एवं पर्यावरण पर्यटन को बढावा मिल सकेगा। कृषि पर्यटन के लिए हर जिले के एक दो गांवों को चयनित करके विकसित किया जा सकता है। ग्रामीण किसानों की फसल बुवाई व उत्पादन से लेकर प्रोसेसिंग तक का हर एक पहलु कृषि पर्यटन का मजबूत स्तम्भ है। खेती में दर्शनीयता का विकास करना होगा। इससे गांवों में रोजगार बढेगा व ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर हो सकेगा। गांवों को बाजार व एग्रो टूरिज्म के साथ साथ एग्रो मार्केटिंग टूरिज्म के रूप में भी विकसित करने होंगे। गांवों में हाट बाजारों व साप्ताहिक बिक्री मेलों का आयोजन व अच्छे प्रचार प्रसार से शहरों के लोगों को भी आकर्षित करना होगा। प्रायोगिक तौर पर कुछ मॉडल गांव विकसित किए जा सकते हैं। जहां जल संरक्षण के अच्छे तरीके देखने लायक हो, फार्मिंग सिस्टम, समन्वित कृषि प्रणाली, आधुनिक, स्मार्ट व संरक्षित खेती के स्थल मौजूद हो, उस गांव में उपजी हर उपज की प्रोसेसिंग उसी गांव में होती हो। वहां के किसान केवल गांव पर ही निर्भर हो, तो निश्चित ही ऐसे गांव एक नई अवधारणा एग्रो मार्केटिंग टूरिज्म के लिए पहचान बनाते हुए आत्मनिर्भर बन सकेंगे। जब तक किसान आत्मनिर्भर नहीं होगा, गांव आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। और जब तक गांव आत्मनिर्भर नहीं होगा, देश के आत्मनिर्भर बनने में समस्याएं आएगी। गांवों ब्राण्ड और स्मार्ट बनाकर विदेशी हवा से जोड़ना होगा।

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