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    मजदूर है, मजबूर नहीं



    मजदूर है, मजबूर नहीं

    मन विकल हैं, तन शिथिल है, फटे चिथड़े हैं काया पर गड्ढा खोदता, पत्थर फोड़ता, मिटटी ढोता ऊँचे ऊँचे महल बनाता हूँ धरती मेरी बनती बिछोना, नभ बनता छत मेरी बाजू बनते मसनद मेरी, गहरी नींद में सोता हूँ।


    ऊँचे ऊँचे महल बनाकर उन्हें देखता रहता हूँ एयर कंडीशन बनाकर भी एयर मैं ही सोता हूँ। कभी सहन करता फटकार कभी सहन करता हूँ मार मैं मजदूर जरूर पर मजबूर नहीं। मेरे हिये मैं भी क्रोधाग्नि भड़कती है शोषण ही घी बनकर उनको देहकायेगा । मेरे लहु जब उछाल मारेगा तहस नहस सब कर डालेगा



    तेरी शान शौकत ताश के पत्तो की तरह ढल जाएगी।
    मैं पत्थर का बूत नहीं हूँ मैं तो जीवित प्राणी हूँ
    भोग बिलास का निर्माता हूँ मैं उसका अधिकारी हूँ।
    मैं शोषण को सहन करूँ क्यों मुझे मत भड़काओ
    क्रोधाग्नि में तेरा सब कुछ आहुति बन जाएगा।
    मैं मजदूर हूँ मजबूर नहीं।


    सुश्री रीता शुक्ला, रिटायर्ड प्रवक्ता लखनऊ

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