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    आपदा प्रबंधन का संस्थागत उद्भव और आज के अनुभवों से हमे बहुत कुछ सीखने को मिलता है..



    आपदा प्रबंधन का संस्थागत उद्भव और आज के अनुभवों से हमे बहुत कुछ सीखने को मिलता है..


    आपदा भारत में ब्रिटिश काल से भी पहले आती रहिहें. लेकिन आपदा प्रबंधन का  स्थाही और प्रतिष्ठापन का कार्य ९० के दशक में शुरू हुआ ,जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ९० के दशक को " प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण का  अन्तराष्ट्रीय दशक " घोषित किया- (IDNDR). उस के तहत   "आपदा प्रबंधन सेल" की स्थापना भारत सर्कार के कृषि मंत्रालय में की गयी. 


    देश में क्रमबद्ध आपदा जैसे - लातूर भूकम्प (१९९३); मालपा भूस्खलन (१९९४), ओडिशा सुपर साइक्लोन (१९९९) और भुज भूकंप (२००१), के बाद एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन, श्री जे सी पन्त -सचिव कृषि मंत्रालय भारत सर्कार की अध्यक्षता में हुआ. इस का उद्येश आपदा के लिए व्यस्तिथ,व्यापक और समग्र दृष्टिकोण की रूप रेखा बनाना था. यह निति में बहुत बड़ा बदलाव था,क्यूँ की अभी तक आपदा प्रबंधन का संबोधन सिर्फ आर्थिक सहायता का दृष्टिकोण था लेकिन अब समग्र दृष्टिकोण से कार्य करना था. इस के फलसरूप, साल २००२ में आपदा प्रबंधन को गृह मंत्रालय भारत सरकार,के आधीन, कैबिनेट सचिवालय की अधिसूचना no DOC.CD-108/2002 द्वारा स्थान्तरित कर दिया गया था.
    यहाँ १९९२ में हुए  दो अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों का जिक्र करना बहुत जरुरी है,क्यूंकि इन दोनों में भारत की अहम् भूमिका थी और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम २००५ को समग्र बनाने में भी.
    पहला - रिओ डी जनेरिओ- अर्थ समिट. इस में उस समय के पर्यावरण और वन राज्य मंत्री श्री कमल नाथ - विकासशील देशों के मुख्य प्रवक्ता थे.
    दूसरा - क्योटो प्रोटोकॉल
    दोनों में लिए गए निर्णय को मानने के लिए भारत वचनबद्ध है.
    पुराने इतिहास को देखा जाये तो  भारत में आपदा अत्यधिक मौसम की चपेट से होती थी,लेकिन इन दो सम्मेलनों की दूरदृश्यता से भारत का आपदा प्रबंधन अधिनियम २००५ समग्र बना.
    भारत सरकार ने आपदा प्रबंधन को गंभीरता से लिया और पहली बार दसवें पंच वर्षिय योजना दस्तावेज़ में पूरा एक विस्तृत अध्याय रखा गया. और बारवें वित्त आयोग में आपदा प्रबंधन की  वित्तीय समीक्षा अनिवार्य की गयी थी.
    २३ दिसंबर,२००५ को भारत सरकार ने आपदा प्रबंधन को अधिनियमित किया, इस में ११ चैप्टर और ७९ खंड हैं.
    भारत में आपदा प्रबंधन का ९० के दशक से संस्थागातिकर्ण शुरू हुआ और २००५ में अधिनियम बना, फिर भी आगरा और उत्तर प्रदेश के बाकी के नगर निगमों (कुल १६) वाले शहरों  में कोविद १९ आपदा और लॉक डाउन में समुचित ढंग से क्रियान्वन नहीं हुआ. इस अधिनियम में राष्ट्रिय, राज्य  और जिला स्तर पर "आपदा प्रबंधन प्राधिकरण" का वृस्तित विवरण है. जिले में स्थानीय स्व निकायओं के चुने हुए प्रतिनिधियों का भी योगदान है. और होगा भी, क्यूँ की शहर को सब से अच्छी तरह नगर निकाय ही जानता है. और आपदा प्रबंधन का मूल रूप उद्येश जगह (शहर/क़स्बा आदि) का भूगोल, उस की ताकत और कमज़ोरी का सम्पूर्ण आंकलन और बचाव की योजना. यह जिलाधिकारी और जनता द्वारा नगर निकाय के जनप्रतिनिधि समन्वय के साथ कर सकते है. जिलाधिकारी जिले में कुछ सालों के लिए रहते हैं पर नगर निकायों के चुने हुए जनप्रतिनिधि शहर से होने के नाते सालों शहर में लोगों के बीच रह कर शहर के हर बदलाव के साक्षी होते है. शायद यह ही अधिनियम का उद्येश रहा होगा, जब जिले में स्थानीय स्व निकायओं के चुने हुए प्रतिनिधि (मेयर, आगरा के संदार्ब में) को जिला आपदा प्राधिकरण का "को चेयरमैन" मनोनीत किया गया है.
    अगर हम उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्लान को देखें तो जिले में स्थानीय स्व निकायओं के चुने हुए प्रतिनिधि को कोई तवजो नहीं दी गयी है. पूर्वर्ती  युवा मुख्यमंत्री,( जो खुद विदेश से पर्यावरण पर शिक्षा प्राप्त किये हुए हैं ) ने भी अपने २०१६-१७ के आपदा प्रबंधन प्लान में इस  बात पर ध्यान नहीं दिया. शायद राजनेतिक मजबूरी थी- उन के काल में नगर निकायों पर विपक्ष का कब्ज़ा था और सरे वित्तीय अधिकार प्रशासनिक अधिकारीयों को देदिए गए थे.
    लगता है उस समय राज्य सर्कार ने अपने हित के लिए राष्ट्रिय अधिनियम को तोड़ मरोड़ कर अपना हित सिद किया था. हर नयी सरकार को पूर्वर्ती सरकार द्वारा की गयी गलती को सुधारने का पूरा अधिकार होता है. शायद कोविद १९ आपदा न आती तो यह उजागर भी नहीं होता. आगरा के मेयर ने मुख्यमंत्री को लैटर लिख कर साहस दिखाया गया , अगर पत्र में आपदा प्रबंधन अधिनियम  २००५ में जिले में स्थानीय स्व निकायओं के चुने हुए प्रतिनिधि (मेयर की) की भूमिका का भी उल्लेख होता तो आगरा के आपदा प्रबंधन को बल मिलता. और मुख्यमंत्री तत्काल निर्णय लेते.
    सरकारें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम २००५ को तोड़ मरोड़ कर अपने हित के अनुरूप राज्य आपदा प्रबंधन प्लान न बनायें. जनता के प्रतिनिधि और सीधे नागरिकों को भी जिला प्रबंधन प्राधिकरण का सदस्य बना कर, भूल सुधार करें. पता नहीं आगे आने वाले समय में आगरा (और प्रदेश) को किन किन नए आपदाओं का सामना करना पड़े."

    लेखक 
    अनिल शर्मा.
    सचिव -सिविल सोसाइटी ऑफ़ आगरा.

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