Header Ads

  • INA BREAKING NEWS

    पाश्चात्य संस्कृति से आगे है भारतीय संस्कृति



    पाश्चात्य संस्कृति से आगे है भारतीय संस्कृति


    डॉ. अंशु दीक्षित आज जब मैंने खुद भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति दोनों का अनुभव लिया तो यही एहसास किया कि भारतीय संस्कृति हमेशा पाश्चात्य संस्कृति से आगे रही हैं। मैं एक भारतीय संस्कृति में पली-बढ़ी हूँ।

     इसलिए मेरी समस्त क्रियाएँ और व्यवहार भारतीय संस्कृति का पर्याय है। एक समय था जब भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बोल बाला था । एक दौर आया जब हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता पर पाश्चात्य सभ्यता का रंग चढ़ गया और हम अपनी भारतीय सभ्यता और संस्कृति से बहुत दूर होते गए। भारत देश कला, संगीत, विद्या, कृषि तथा उधोग के क्षेत्रो में भी अग्रिम था, इसीलिए इसको सोने की चिड़िया कहा जाता था। किन्तु आज के दौर में देखे तो सांस्कृतिक परिवेश में एक विषम स्थिति उत्पन्न हो गई थी। और इस प्राचीन संस्कृति की अवहेलना की जा रही थी, और उसे हेय दृष्टि से देखा जाने लगा था।


    #मैंने हमेशा अपने पूर्वजो से सुना है कि हमारी भारतीय संस्कृति ही पूर्वी संस्कृति कहलाती है। हमारी भारतीय संस्कृति कृषि और ऋषि परम्परा पर आधारित हैं। जिसमें संयम, सदाचार, धर्म, त्याग, सामाजिक परंपराएँ, रीति-रिवाज़ आदि हैं। हमारी भारतीय संस्कृति दिन प्रति दिन पाश्चात्य संस्कृति के जाल में इस कदर फंसती जा रही है कि लोग अपनी सभ्यता संस्कृति को भूलते ही जा रहे हैं।

     #अब भारत देश में अधिकतर लोगों पर पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता का रहन सहन, पहनावा,उनकी भाषा और सामजिक स्थिति ने बहुत पकड़ बना ली हैं। आज का युवा पाश्चात्य सभ्यता पर बहुत निर्भर हो गया हैं। भारतीय समाज में पहले माता पिता द्वारा तय किया गया विवाह होता था। पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से आज के दौर में प्रेम विवाह मतलब युवक-युवतियाँ स्वयं अपना जीवन-साथी चुनना पसन्द करते हैं, क्योंकि उस पर सारे जीवन का सुख और सफलता निर्भर है| 

    #आज पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से ही विवाह-विच्छेद या तलाक़ भी बहुत होने लगा हैं। भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली थी पर पाश्चात्य विचारों के प्रभाव से अब ये संयुक्त परिवार के विघटन होने लगा हैं।आज का युवा परिवार के लिए बलिदान करना और बड़ों के नियन्त्रण या संरक्षण में जीवन व्यतीत करना मूर्खता समझने लगा हैं। ये भारतीय युवा ही अपनी संस्कृति के दुश्मन बने हुए हैं और आज उनको भारतीय भाषा (हिंदी) बोलने में शर्म आती हैं ,अंग्रेजी बोलने में अपनी शान समझते हैं, वैसे ही पहनावे में भी अंतर देखा जा सकता है, महिलाओ में साडी और कुर्ता सलवार का परिधान या पुरुषो में धोती कुर्ता या पैजामा कुर्ता का परिधान पहनने में शर्म आती हैं। अब लोग जींस टी-शर्ट जैसे परिधान में रूचि रखने लगे है. और अपने को स्मार्ट समझने लगे हैं । 

    #यही हाल आज कल खान पान में भी हैं,की भारतीय खान पान शैली में रूचि नहीं रही हैं और पाश्चात्य खान पान शैली जैसे पिज्ज़ा, मेक्रोनी,पास्ता, ब्रेड, और चाउमीन, मांशाहारी व्यंजन को पसंद करने लगे और दूध, दही लस्सी आदि की जगह पर लोग सॉफ्ट ड्रिंक,आर्टिफीसियल जूस का सेवन करने लगे हैं ।आज कल के माता पिता भी अपने बच्चो को विदेशी शिक्षा देने में लगे हुए हैं, उन सब को लगता हैं की ये विदेशी शिक्षा ही सब से अच्छी शिक्षा प्रणाली हैं। ऐसे में हमारे जहन में एक प्रश्न उठता हैं कि क्या भारतीय शिक्षा इतनी बुरी हैं। इसी भारतीय शिक्षा से ही चाणक्य, आर्यभट, महात्मा हंसराज, बाल गंगाधर तिलक और मदन मोहन मालवीय जैसे महान लोग भी हुए हैं । परिवर्तन प्रकृति का नियम है, ये आज बिलकुल सच साबित हो गया हैं। 

    ऐसा समय परिवर्तन हुआ की सारा संसार हमारी प्राचीन और भव्य भारतीय सभ्यता को नमन करके उसको अपनाने लगा हैं। इस वैश्विक महामारी ने हम सब को एक बार फिर से भारतीय संस्कृति और सभ्यता के नियम पालन करने को बाध्य किया हैं। पहले लोग पश्चिमी संस्कृति के आधार पे हाय, हेलो, या हग की पद्दति अपनाते थे पर इस कोरोना वायरस महामारी के प्रकोप के कारण अब हाय, हेलो, या हग को छोड़ कर नमस्ते का पालन करने लगे क्योकि इसी में सोशल डिस्टन्सिंग का आचरण का प्रतीक भी हैं। अब लोग योग का अभ्यास और आयुर्वेद का भी पालन करने लगे हैं ,जैसे हल्दी, तुलसी, लोंग, नीम, काढ़ा आदि का सेवन करने लगे हैं।

    आज लोग अपने परिवार के साथ रहकर जीवन जीने का आनंद भी ले रहे हैं,और धार्मिक सीरियल जैसे रामायण और महाभारत देख कर अपने भारतीय सभ्यता औरअपनी संस्कृति को समझने एवं अपनाने की कोशिश कर भी रहे हैं। इसी तरह लॉक डाउन में सादा जीवन और उच्च विचारों की संस्कृति को अपना रहे हैं। भारतीय संस्कृति का स्वरुप विश्वव्यापी एवं आध्यात्मिकतागामी एक बार फिर से उभर कर आने लगा। भारतीय संस्कृति मानवतावादी ,त्यागवादी और विश्व बंधुत्व पर आधारित हैं। 

    #पाश्चात्य संस्कृति जड़वादी, व्यक्तिवादी एवं आत्मकेंदित स्वकेंद्रित पर आधारित होती हैं। स्वामी विवेकानंद ने ठीक ही कहा है कि भारतीय (हिन्दू) संस्कृति आध्यात्मिकता की अमर आधारशिला पर आधारित है। आज पूरा विश्व भारतीय संस्कृति की ओर उन्मूख हो रहा है। आज ब्रिटेन हो या अमेरिका देश हो उनको हमारी भारतीय सभ्यता और प्राचीन संस्कृति एवं रामायण में हनुमान जी द्वारा लाइ गयी संजीवनी बूटी का वर्णन करते हुए, हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा जैसी संजीवनी को उनको उसी अंदाज़ में मांग रहे हैं। 

    #यही भारतीय संस्कृति मानवतावादी ,त्यागवादी और विश्व बंधुत्व की सभ्यता का परिचय देते हुए संजीवनी बूटी जैसी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा की सहायता प्रदान की हैं। आज के समस्त उन पश्चिमी संस्कृति को अपनाने वाले हर भारतीय से अनुग्रह हैं की आज भारतीय संस्कृति को अपनाये और लोगो से भी उसका अनुसरण करने को बोले।

    डॉ अंशू दीक्षित
    लखनऊ

    Post Top Ad


    Post Bottom Ad


    Blogger द्वारा संचालित.