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    पावन महाकुंभ का समय है

    पावन महाकुंभ का समय है। 
    संपूर्ण राष्ट्र कुंभमय है। विश्व भर से श्रद्धालु कुंभ स्नान के लिए प्रयागराज पहुँचे हैं। ऐसे में आगरा के रिटायर्ड वरिष्ठ वेटेनरी सर्जन डाॅ  रामप्रकाश चतुर्वैदी ने अपने कुंभ स्नान के अनुभव को एक बेहद सुंदर कविता के रूप में प्रस्तुत किया है। भक्ति रस से ओतप्रोत इस कविता में उन्होने माँ गंगा के महात्मय का वर्णन किया है। 
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    पावन महाकुंभ का समय है
    मम् मोक्ष दायनी तरण तारिणी सूर्य सुता संग् शारदा गंगे ।
    संगम तीर्थ धरा पर बहती ऐसी पतित पावनी है माँ गंगे।।
    तीर्थ राज इसे कहें हम 
    यहाँ हर हर गंगे हर पल गंगे ।
    कोटि कोटि के हर करम विषेले   
    क्षण क्षण क्षीण करे ये गंगे ।।
    पावन महाकुंभ का समय है
    भारत अवनि विराजे युगों से 
    हिमगिरि रूप में कंचन गंगा।
    अतृप्त पड़े भू तन मुनियों के
    कैसे हु तृप्त हो आ जाएं गंगा।।
    साधू रूप नृपों ने की घोर तपस्या पर धरा पर ना ला पाए गंगा।
    पुरखों की मुक्ति के कारण भागीरथ भूलोक पर ला पाए गंगा।।

    तीन धार तीन लोक विराजत आय मिली प्रयागराज में गंगा ।
    जहां जहां बूंद गिरी अमृत की वहां वहां कुंभ नहा आए गंगा।।
    भोले को प्रिय भू त्रिवेणी लगे
     ये तप योग मोक्ष का द्वार है गंगा।
     साधु-संत व अन्य अखाड़े 
    नित ये सब को धन्य करें है गंगा।।
    पावन महाकुंभ का समय है
    चाक चौबंद व्यवस्था यहाँ पर रक्षक भक्षक सब तट आये।
    योगी भोगी रोगी सब मिलकर संरक्षण संग संगम नहाए।।
    नाम जपा हर हर गंगे का 
     गठरी पाप की उतार सिर आये। 
    खोया पाया व अग्नि शमन संग स्वास्थ्य शिविर ढिंग ढिंग पाये।।

    माँ गंगा गंगनौर धरा पर
    मैं पर्व कुंभ पर प्रयागराज आई ।
    नंगे नंगे नागाओं के दल को 
    लख फिर बार-बार मैं शरमाई।।
    साधु संत ज्ञानी बैरागी सभी जन कोतहूूल था तन मेरे भाई
    संगम तट संग साथ सभी का 
    जा बारि कगार पर खिचड़ी खाई।।

    डॉ0 रामप्रकाश चतुर्वेदी 
    आगरा 
    मो-9897509171

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