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    अमृत वाणी भाग 1

    विवेकानंद  के अमृत वचन - भाग 1 

    बाहरी चीजों पर ध्यान केंद्रित करना आसान है, मन स्वाभाविक रूप से बाहर चला जाता है; लेकिन ऐसा नहीं होता, धर्म, या मनोविज्ञान, या तत्वमीमांसा के मामले में, जहां विषय और वस्तु एक ही है।वस्तु आंतरिक है, मन खुद ही वस्तु है, और उस मन का अध्ययन करने के लिए ही आवश्यकता है – मन ही मन का अध्यन कर रहा है ।
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    अमृत वाणी भाग 1 
    हम जानते हैं कि मन की एक शक्ति है जिसे प्रतिबिम्बंन कहते है । मैं तुमसे बात कर रहा हूँ. और उसी समय मैं बगल में खड़ा हूँ, जैसे वो कोई दूसरा व्यक्ति हो, और मुझे जान और सुन रहा है, की मैं क्या बात कर रहा हूँ । आप एक  ही समय में काम करते है और साथ-साथ सोचते है, जबकि आपके दिमाग का एक हिस्सा बगल में खड़ा ये देखता है की आप क्या सोच रहे है। मन की शक्तियों को एकाग्र किया जाना चाहिए और उसे उसके ही उपर लगाया जाना चाहिए, और जैसे अंधकारमय जगह, सूरज की भेदती किरणों के सामने अपने रहस्य खोल देती है, वैसे ही ये एकाग्र मन अपने अंतरतम रहस्यों को भेद देता है । 

    इस प्रकार हम विश्वास और वास्तविक धर्म के आधार पर आ जायेंगे । हम खुद के लिए समझ जायेंगे कि क्या हम आत्मा है, जीवन पांच मिनट का है या अनंत काल का है, क्या ब्रम्हांड में एक भगवान् है या और भी । ये सभी रहस्य हमारे सामने खुल जायेंगे. यही है जो राज-योग सिखाने का प्रस्ताव रखता है।इसकी सभी शिक्षा का लक्ष्य मन को कैसे एकाग्र करे है, फिर, हमारे खुद के दिमाग के अंतरतम गुप्त स्थानों को कैसे खोजे, फिर, कैसे उस सामग्री का सामान्यीकरण करे और उससे हमारे अपने निष्कर्ष प्राप्त करे. वो, इसलिए, कभी ये प्रश्न नहीं पूछता की आपका धर्म क्या है, आप आस्तिक है की नास्तिक, ईसाई, यहूदी, या बौद्ध है. हम मनुष्य है; यही पर्याप्त है

    सभी मनुष्यों के पास धर्म की खोज का अधिकार और सामर्थ्य है । सभी मनुष्य के पास कारण पूछने, की क्यों, और उसके प्रश्न का उत्तर खुद दिए जाने का अधिकार है, अगर वह केवल कष्ट करता है।

    डॉ राजूल दत्त मिश्रा 

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