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    जिनका अपना कोई नहीं, उनका भी है हक!



    नई दिल्ली, 29 दिसंबर- दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने कहा था, "सुरक्षा और बचाव अनायास मिलने की चीज नहीं है, बल्कि इस दिशा में आम सहमति और सार्वजनिक निवेश के साथ काम करने से ये परिणाम मिलते है। इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि बच्चों को, जो समाज के सबसे कमजोर नागरिक होते हैं उन्हें हिंसा और भय मुक्त जीवन दें।
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    जिनका अपना कोई नहीं, उनका भी है हक!

    भारत में दो करोड़ से अधिक बच्चे बिन मां-बाप के हैं या छोड़ दिए गए हैं। उन्हें अपना कहने वाला कोई नहीं है। पर ये भी बच्चे हैं और इन्हें भी एक छत का अधिकार है जो इन्हें खतरों और आतंक से सुरक्षित रखे। 

    हर एक बच्चे को जीने का बराबर हक मिलना चाहिए। पूरी दुनिया में लाखों बच्चे कई पीढ़ियों से अभाव की जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं और बच्चों का भविष्य और उनके साथ पूरे समाज का भविष्य खतरों में है। बाल शोषण हमारे देश की नई महामारी बन गई है, जिसका समाधान अधिक जिम्मेदारी और गंभीरता से करना होगा।

    हालांकि हमारे देश में बच्चों की देखभाल के कई संस्थान हैं, जो इस दिशा में काम कर रहे हैं, पर बड़ा और सबसे ज्वलंत मुद्दा यह है कि उनमें से कितने रजिस्टर्ड हैं और कितनों के पा बच्चों को सुरक्षित और संपूर्ण बचपन देने का प्रोग्राम है? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों ऐसे संस्थानों की वैधता की जांच नहीं की जा रही है। इन तमाम सवालों के साथ आज यह समझना जरूरी है कि इस मसले को गंभीरता से लेना होगा।

    बाल देखभाल संस्थानों के लिए एसओपी :

    भारतीय संविधान बच्चों को कानून की नजर में बराबर होने का अधिकार सुनिश्चित करता है। राज्य सरकारों को बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत नीतियां बनाने की जिम्मेदारी दी गई है, ताकि सभी बच्चों को सुरक्षित परिवेश मिले जो खास कर कमजोर तबकांे के बच्चों के लिए बेहद जरूरी है। राज्य सरकारों को बच्चों को विकास का अवसर देना है। उन्हें हर प्रकार की हिंसा से बचाना है और ऐसा सुरक्षित परिवेश देना है जिसमें बच्चों पर किसी प्रकार की हिंसा और अत्याचार का खतरा नहीं हो। 

    बच्चों पर केंद्रित कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है मानक परिचालन प्रक्रिया का निर्धारण, ताकि बच्चों की सुरक्षा और बचाव सुनिश्चित हो। खासकर देश में कार्यरत सभी बाल देखभाल संस्थानों के लिए यह अनिवार्य होगा। 

    एसओपी का लक्ष्य बच्चों से जुड़े विभिन्न कानूनों के दायरे में आने वाले प्रत्येक कैटेगरी के बच्चों के लिए एक मानक परिचालन प्रक्रिया का निर्धारण करना है। आज ऐसे कई कानून हैं, जैसे जुवेनाइल जस्टिस (देखभाल एवं सुरक्षा) एक्ट, 2015, पीओसीएसओ, 2012, बाल श्रम कानून, 1986, शिक्षा अधिकार कानून, 2009, बाल विवाह कानून, मानसिक स्वास्थ्य, आईसीपीएस और बच्चों के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना का ड्राफ्ट, 2016 आदि। 

    पूरे देश में कार्यरत सीसीआई के लिए विभिन्न कानूनों और उनके प्रावधानों का अनुपालन करना अनिवार्य है और यह भी समझना होगा कि ऐसे सभी संस्थान इन कानूनांे के अनुपालन के लिए बाध्य हैं। सीसीआई के बच्चों के लिए परिसर में ही औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। उन्हें किसी पेशे और अन्य व्यवसायों के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। उनकी बुनियादी जरूरतों जैसे भोजन, स्वच्छता के लिए जरूरी चीजें, बिस्तर, कपड़े, किताबें और दैनिक उपयोग की अन्य चीजें उपलब्ध कराई जाए। जरूरत हो तो चिकित्सा की भी सुविधा हो। साथ ही, यह देखना होगा कि वे स्वस्थ परिवेश में रहें। 

    जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 66 के तहत सीसीआई को यह जनादेश है कि वे जहां कार्यरत हैं, उस राज्य में रजिस्ट्रेशन कराएं भले ही उन्हें विशेषज्ञतापूर्ण गोद लेने वाली एजेंसी की मान्यता नहीं मिली हो।

    सभी सीसीआई की यह जिम्मेदारी है कि इनकी देखरेख में आए सभी अनाथों, बेघर बच्चों या समर्पण कर चुके बच्चों की जानकारी दर्ज करें, प्रस्तुत करें और ऐसे बच्चों को गोद लेने के लिए कानूनी तौर पर स्वतंत्र घोषित करें। सीसीआई से यह उम्मीद की जाती है कि वे निकट के किसी एसएए से औपचारिक रूप से जुड़ेंगे और गोद लेने के लिए कानूनी तौर पर स्वतंत्र बच्चों के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध कराएंगे। धारा 66 के उल्लंघन पर 50,000 रुपये जुर्माना का प्रावधान है। हाल में झारखंड में गोद लेने से जुड़े गिरोह के मामले की अनदेखी नहीं की जा सकती और यह हमारे लिए चेतावनी है कि हमारी नीतियों को और मजबूत बनाना होगा।

    पंजीकरण से से क्यों बचते हैं सीसीआई?

    देश में 2,000 से अधिक सीसीआई हैं जो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बार-बार चेतावनी देने के बावजूद सरकार में खुद को पंजीकृत नहीं करा रहे हैं। केवल तिरुवनंतपुरम में ऐसे 280 सीसीआई ने काम बंद कर दिया, जब महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने जेजे एक्ट नहीं लागू करने के लिए उन पर शिकंजा कस दिया। इसलिए सभी सीसीआई के लिए यह जरूरी है कि कथित कानून के क्लॉजों पर अमल करें, जिनमें कुछ सुविधाएं देना अनिवार्य किया गया है। जैसे कि आश्रय लेने वाले बच्चों को न्यूनतम 40 वर्गफुट जगह देना और सुनिश्चित संख्या में (हर 10 बच्चे पर 1) वार्डन नियुक्त करना आदि। 

    केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे एक महीने के अंदर सभी सीसीआई का रजिस्टर्ड होना सुनिश्चित करें और यह भी कि ये गोद लेने संबंधी केंद्र के सर्वोच्च संगठन केंद्रीय गोद संसाधन प्राधिकरण (सीएआरए) से जुड़ जाएं। 

    गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय को भी खुल कर यह कहना पड़ा कि सीसीआई को रजिस्ट्रेशन कराना होगा और नाकाम रहने पर सजा भी होगी।

    रजिस्ट्रेशन नहीं होने की जो वजहें अक्सर बताई जाती हैं, उनमें मुख्य रूप से कहीं-न-कहीं राज्य सरकार की इच्छाशक्ति का अभाव और वित्त सुविधाओं की कमी है।

    क्या देश में कोई मॉडल है जिसका अनुकरण किया जा सके?

    एसओएस भारत बाल ग्राम इसका एक उदाहरण है जो बच्चों को वैकल्पिक देखभाल देता है। देश के 22 राज्यों के 32 गांवों में यह ऐसे बच्चों को परिवार का परिवेश देता है। यह मॉडल सफल है और इसका प्रमाण यह है कि आज पूरे देश के विभिन्न सीसीआई के प्रशिक्षण के लिए इसे आमंत्रित किया जाता है। यह काउंसलरों और शिक्षकों को यह प्रशिक्षण देता है कि कैसे लंबी अवधि के लिए बच्चों के सर्वांगीण विकास और कल्याण से जुड़े कार्य संभालें।

    आज ऐसे कई मॉडलों की जरूरत है। हालांकि बच्चों की देखभाल की पद्धति जो भी हो, हमारा ध्यान उन्हें परिवार का परिवेश देने पर केंद्रित हो, ताकि बच्चों को बढ़ने, विकसित होने और पूरी प्रतिभा दिखाकर तरक्की करने का अवसर उन्हें मिले। 

    बच्चों की देखभाल करने वालों और इस पेशे से जुड़े लोगों का निरंतर प्रशिक्षण एवं क्षमता संवर्धन आवश्यक है, ताकि वे बच्चों की नई-नई जरूरतों को समझें और उनकी मदद की नई पद्धतियों को अपनाएं और तनाव दूर करने जैसे कठिन काम भी बखूबी करें। 

    बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए भारत में उपलब्ध वैकल्पिक देखभाल को बेहतर बनाने के क्या प्रयास करने होंगे?

    सबसे पहले पूरे देश में ऐसे बच्चों के लिए परिवार-आधारित या परिवार-जैसे परिवेश में देखभाल की व्यवस्था करनी होगी। बुनियादी सुविधाएं देने के साथ इस काम में लगे लोगों के प्रशिक्षण पर जोर देना होगा। आज भारत में बाल देखभाल केंद्रों की कमी नहीं है, पर उनमें बच्चों की भावनात्मक और बौद्धिक जरूरतों को पूरा करने की कमी दिखती है। इसके अतिरिक्त सामाजिक मेल-जोल का अवसर भी नहीं दिया जाता है, जिससे बच्चों का समग्र विकास नहीं होता है। 

    हालांकि एसओएस भारत बाल ग्राम ने वैकल्पिक देखभाल के जो विकल्प दिए हैं, जैसे कि फोस्टर केयर और ग्रुप फोस्टर केयर, परिवार सेवा केंद्र, फोस्टर केयर इंडिया, वे बच्चों को सही मायनों में घर का माहौल देते हैं और बच्चे स्वाभाविक परिवेश में पलते हैं और अपनी आकांक्षा के संग जीवन में आगे बढ़ते हैं। 

    इन प्रक्रियाओं को तेज करने के लिए क्या करना होगा?

    हमारे देश में बिन मां-बाप के बच्चों या बेघर बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के लिए नीतियां और कानून उपलब्ध हैं। लेकिन सही अथरें में उनका अनुपालन होता नहीं दिखता है। पूरी दुनिया मानती है कि परिवार और परिवार-जैसे परिवेश में रहने वाले बच्चे जीवन की मुख्यधारा से जुड़ने और समाज में योगदान देने की जिम्मेदारियां बेहतर निभा सकते हैं जो न केवल आर्थिक और भावनात्मक और समाजिक मानकों पर देखा गया है। इसलिए बेहतर होगा कि देखभाल की गैर-संस्थानिक व्यवस्था जैसे कि किनशिप केयर, फोस्टर केयर या अन्य रूप में परिवार के माहैल में देखभाल सुनिश्चित किया जाए। किसी संस्थान की तुलना में परिवार जैसी देखभाल को प्राथकिमता देना उचित होगा। 

    ऐसे बच्चों के लिए परिवार आधारित वैकल्पिक देखभाल सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक संगठनों और बाल देखभाल के पेशे जुड़े लोगों की अहम् भूमिका होगी। वे पारिवारिक माहौल में बच्चों की देखभाल की वकालत कर सकते हैं और लोगों को आंदोलित कर सकते हैं। इस उद्देश्य से सरकर से तकनीकी साझेदारी की जा सकती है। व्यापक स्तर पर जानकारी और विशेषज्ञता की साझेदारी से सरकारी नीतियों और कार्य प्रक्रियाओं को बेहतर बनाना भी आसान होगा। 

    चुनौतियां और समाधान :

    राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग के आंकड़े बताते हैं कि देश में रजिस्टर्ड और अनरजिस्टर्ड कुल मिलाकर सभी सीसीआई में 2,32,937 बच्चे हैं। 

    आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि 1339 अनरजिस्टर्ड चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट में केवल केरल में 1165 हैं। इस राज्य में रजिस्टर्ड सीसीआई की संख्या 26 है।

    आंकड़ों के अनुसार, 11 जुलाई की तिथि में पूरे देश में रजिस्टर्ड सीसीआई की संख्या 5850 हैं और अनरजिस्टर्ड की गिनती करें तो यह संख्या कुल मिलाकर 8000 से अधिक होगी। केरल के अतिरिक्त कुछ अन्य राज्यों में भी अनरजिस्टर्ड सीसीआई हैं। इनमें महाराष्ट्र में 110, मणिपुर में 13, तमिलनाडु में 9, गोवा में 8, राजस्थान में 4 और नगालैंड में 2 ऐसे बाल आश्रय हैं।

    हमारे देश में बच्चों की देखभाल के अन्य वैकल्पिक मॉडलों की जरूरत है जो देखभाल में गुणवत्ता के लिए प्रतिबद्ध हों। विचारों और कार्य प्रक्रियों का आदान-प्रदान भी जरूरी है, क्योंकि इससे हमारा ²ष्टिकोण व्यापक होगा। एसओएस इंडिया ने विचारों के अदान-प्रदान, प्रशिक्षण और सरकारी सीसीसीआई के क्षमता संवर्धन के लिए राज्य सरकारों से भागीदारी की है। उनकी तकनीकी साझेदारी का विस्तार तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मेघालय और असम राज्य सरकारों तक हो गया है।

    इन साझेदारियों का मकसद बच्चों को परिवार का माहौल देने और उनकी सुरक्षा के लिए उनकी देखभाल करने वालों को सशक्त बनाना है। 

    भारत में हम परिवारिक मूल्यों को बहुत महत्व देते हैं। हमारी एक मजबूत परिवार व्यवस्था है। ऐसे में बिन मां-बाप के बच्चों और बेघर बच्चों को ग्रुप फोस्टर केयर और परिवार आधारित देखभाल की बड़ी व्यवस्था बनाना भारत के पारंपरिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर काम करना है। इससे बिन मां-बाप के बच्चों और बेघर बच्चों को निस्संदेह एक संपूर्ण जीवन जीवन का आनंद मिलेगा।


    (लेखिका:-विजयारती) 

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