Header Ads

  • INA BREAKING NEWS

    असम का एक गांव, जहां पानी है 'धीमा जहर'

                                      जल ही जीवन है 


    एक उम्र में जब बच्चे आम तौर पर खुद से चलना और चारों ओर छोटे-छोटे कदमों से दौड़ना शुरू कर देते हैं, असम के एक गांव तपत्जुरी का अमजद जब दो साल का था तो उसकी मां उसे छड़ी के सहारे चलाती थी। 



    अमजद के पैर टढ़े थे जो 'स्केलेटल फ्लोरोसिस' रोग का एक सामान्य लक्षण है और इस वजह से उसे खुद को संभालने के लिए संघर्ष करना पड़ता था और अपने दो साल के बच्चे की इस लाचारी से आहत मां को हर वक्त अमजद पर निगाह रखनी पड़ती थी।
    असम का एक गांव, जहां पानी है 'धीमा जहर'
    इस गांव में अमजद अकेला इस समस्या से ग्रसित बच्चा नहीं है। दुर्भाग्य से तपत्जुरी के लगभग हर घर के बच्चे और वयस्क फ्लोरोसिस के किसी न किसी रूप से प्रभावित हैं, जिसके लिए यहां का पानी जिम्मेदार है। 

    असम के भूजल में जब फ्लोराइड प्रदूषण की बात आती है, तब सबसे पहले होजई जिले का तपत्जुरी गांव का नाम आता है जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र है। पानी में फ्लोराइड की जायज सीमा एक मिलीग्राम प्रति लीटर होती है, लेकिन तपत्जुरी के हैंडपंप या ट्यूबवेल से निकलने वाले पानी के नमूने में फ्लोराइड का स्तर 10-15 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच होता है जो स्वाभाविक रूप से विनाशकारी है। 

    Asam-ka-ek-gauon-janha-pani-hai-dheema-poision
    असम का एक गांव, जहां पानी है 'धीमा जहर'
    उच्च फ्लोराइड के लंबे संपर्क में रहने का दुष्प्रभाव सबसे अधिक यहां के ग्रामीणों के शरीर पर पड़ा है। इस गांव में शायद ही आपको ऐसा बच्चा या वस्यक मिले, जिसके दांतों में दाग-धब्बे, तिरछे या मुड़े हुए न हों जो डेंटल फ्लूरोसिस के लक्षणों में शामिल है। गांव के लगभग हर निवासियों को जोड़ों और शरीर में दर्द की शिकायत रहती है। इतना ही नहीं, यहां के बच्चे आए दिन स्कूल नहीं जाते हैं और यह दायरे से बाहर जा रही इस स्वास्थ्य समस्या का एक आदर्श उदाहरण है। 

    गांव की दस वर्षीया रोहिमा शिकायत करती हैं कि उनके पैरों में हर समय दर्द रहता है। रोहिमा के दांतों को देखकर पता चलता है कि यह समस्या कितनी बड़ी है। रोहिमा ने बताया कि उनकी चार बहनें और भाई भी दर्द से पीड़ित हैं। वह कहती है, "मुझे कभी-कभी स्कूल छोड़ना पड़ता है। क्योंकि कभी-कभी मैं चल नहीं पाती।" 

    कक्षा में छह में पढ़ने वाले हमजद कहते हैं कि उन्हें भी अक्सर घुटनों में दर्द रहता है और उन्हें स्कूल जाने और खेलने के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ता है, लेकिन कभी-कभी उनके लिए दर्द के कारण यह सब असंभव हो जाता है। 

    इस गांव में कई सालों से इस समस्या पर काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता धरानी सैकिया ने कहा कि ट्यूबवेल या हैंडपंप जो जमीन से 100-150 फीट नीचे से पानी खींचते हैं। वह पानी में फ्लोराइड के उच्च स्तर को खींच रहे हैं और यही इस 'धीमा जहर' का कारण है। 

    जब आप उस गहराई पर जाकर पानी ड्रिल (खींचते) करते हैं तो आप ग्रेनाइटिक चट्टानों तक पहुंच जाते हैं जो फ्लोराइड जैसे खनिजों में समृद्ध होती है, जिससे पानी में फ्लोराइड की मात्रा भी अधिक आ जाती है। 

    वह कहती हैं, "यही कारण है कि कुएं, जिन्हें केवल 10-12 फीट ही खोदना पड़ता है, एक सुरक्षित विकल्प हैं और हम इसका उपयोग करने की वकालत कर रहे हैं।" 

    कथित तौर पर तपत्जुरी के पास के गांव फ्लोरोसिस से गंभीर रूप से प्रभावित नहीं हैं, जिस पर सैकिया का कहना है कि यह गांव के भौगोलिक स्थिति की वजह से हो सकता है। 

    अमजद की मां हलीमा बेगम ने कहा कि जब उन्हें अहसास हुआ कि उनका बेटा जो उस समय 18 महीने का था, अन्य बच्चों की तरह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाता था। वह अपने बच्चे के लिए, स्थानीय नीम-हकीम से लेकर चिकित्सकों तक के पास गईं। उन्होंने एक्स-रे, दवाएं और तेल मालिश सबकुछ किया, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। 

    अमजद के पैर टेढ़े थे और उसे पांच साल तक छड़ी की मदद से चलना पड़ा। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा हो रहा था चुनौतियां भी बढ़ती जा रही थीं। 

    अमजद अब 12 साल का हो गया है। उसने बताया, "मैंने पांचवीं तक अपने घर के पास के ही स्कूल से पढ़ाई की, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए स्कूल घर से दो किलोमीटर दूर था। मैं चूंकि उतना दूर नहीं चल सकता था, इसलिए मेरा एक साल बर्बाद हो गया।" 

    इस बीच सैकिया ने प्रभावित आबादी के बीच कैल्शियम, विटामिन-डी, मैग्नीशियम और जिंक के संयोजन वाली गोलियां बांटना शुरू कर दिया।

    केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत फ्लोरोसिस (एनपीपीसीएफ) के निवारण और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के दिशानिर्देश हालांकि बताते हैं कि उच्च फ्लोराइड एक्सपोजर के कारण दांत और हड्डियों में आए बदलाव अपरिवर्तनीय हैं, लेकिन इस पूरक के परिणामस्वरूप तपत्जुरी के लोगों को राहत मिली। 

    सैकिया ने बताया कि इन सप्लीमेंट्स को बच्चों के आहार में शामिल किया गया और हरी सब्जियों जैसे पौष्टिक पदार्थ के उपयोग के साथ सात साल से कम उम्र के बच्चों में आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिले। 

    लेकिन एक ठोस समाधान और नए मामलों की रोकथाम के लिए समस्या की जड़ से निपटना जरूरी था जो इस मामले में पानी का वैकल्पिक स्रोत था। 

    असम पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग विभाग (पीएचईडी) के पूर्व अतिरिक्त मुख्य अभियंता नजीबुद्दीन अहमद जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि समाधान सतह के पानी में ही है। इस सोच के साथ पीएचईडी अपनी विभिन्न जल आपूर्ति योजनाओं के माध्यम से तपत्जुरी जैसे गांवों तक गुववत्ता में सुधार किए गए नदियों के पानी की आपूर्ति की जा रही है। उधोगोंगा और धीकरामुख नदियों के पानी से इस तरह की आपूर्ति की जाती है। इसके अलावा जमुना नदी से भी आपूर्ति की जाती है। इन सभी स्रोतों के पानी को शुद्ध किया जाता है और फिर कुछ घरों में आम तौर पर नल के माध्यम से आपूर्ति की जाती है। 

    एक अध्ययन से पता चलता है कि वर्ष 1978 में तपत्जुरी में फ्लोरोसिस के लक्षण सामने आए और 1993-2003 के बीच मामलों की संख्या दोगुना हो गई। 2003-2008 के बीच संख्या चार गुना बढ़ी और 2008-2013 के बीच छह गुना बढ़ गई।

    लेकिन 2013 के बाद जब सतही जल आपूर्ति योजना शुरू हुई और इस रोग को लेकर जागरूकता बढ़ी तो इसकी संख्या में भी कमी आई। 

    होजई में सहायक आयुक्त दीपशिखा सैकिया का कहना है कि सुधार हो रहा है लेकिन अभी भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। यह 'धीमा जहर' है। इस समस्या के संपूर्ण समाधान के लिए निरंतर प्रयास और सहयोग चाहिए। वह महसूस करती है कि कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासन की देखरेख करने वाले सरकारी अधिकारियों के लगातार तबादले सुधार की गति में रुकावत पैदा करते हैं। 

    लगातार समर्थन एक लंबा रास्ता तय करता है। अमजद यह बात जानता है। उसके पैर अभी भी टेढ़े हैं, लेकिन अब वह स्कूल जा सकता है। मेरे लिए खुद अपने पैरों पर चलकर स्कूल जाने के अलावा कोई चीज अधिक मायने नहीं रखती है।

    विजय लक्ष्मी सिंह                                            आरती मिश्रा 'स्वतंत्र'
    एडिटर इन चीफ INA न्यूज़                             सम्पादक  INA न्यूज़                     

    Post Top Ad


    Post Bottom Ad


    Blogger द्वारा संचालित.