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    "पृथ्वी की उत्पत्ति का गुप्त रहस्य"

    प्राचीन काल की बात है,एक अंतरिक्ष हमलावर धरती को तवाह करने की फिराक में था.उस वक़्त एक विशाल गोलाकार चीज़ जो की लगभग मार्स (Mars) जितनी बड़ी थी,वो अंतरिक्ष में धरती से जा टकराई।
    इस टकराव के कारण हलके पदार्थो  के बने सतह के टुकड़ो को अंतरिक्ष में बिखेर दिया इन टुकड़ो ने धरती के चारो ओर एक विशाल छल्ले का रूप धारण कर लिया। हल्के पदार्थो के बने इस छल्ले से चन्द्रमा की रचना हुई
    इस अनोखे इस तरह से जन्म लेने के कारण धरती का चन्द्रमा ग्रह की तुलना में बहुत बडा है।
    चन्द्रमा धरती को डगमगाने नहीं देता वरना धरती जब अपनी एक्सेस (axes) पर घूमती है तो  झुकाव पर रहती है पर चन्द्रमा की ग्रेविटी इतनी तेज है की वो धरती को जगमगाने नहीं देगी।

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    "पृथ्वी की उत्पत्ति का गुप्त रहस्य"

    पृथ्वी के झुकाव के कारण ही यहाँ पर अलग-अलग मौसम है।

    ग्रहो को देखकर लगता है कि वो जन्म और म्रत्यु से परे है पर ऐसा नहीं है वो भी हमारी तरह जन्म लेते है और ख़त्म होते है,पर लगभग 4 अरब साल पहले जब चंद्रमा की रचना हुई तब धरती बेजान थी और चारो ओर सिर्फ खोलती,उबलती चटटाने थी पर समय के साथ धरती ठंडी हुई और उसकी सतह ठोस हो गई,किंतु नाइट्रोजन और कार्बोंडिऑक्सीड के मिश्रण से वातावरण जहरीला था और जीवन की संभव बनाने वाला बुनियादी तत्व पानी अब तक धरती पर मौजूद नहीं था,तब हुई एक और महाप्रलय। 
    धरती की बनावट के लगभग 50 करोड़ साल बाद यहाँ उल्का (meteors) की बरसात हुई, यह उल्का (meteors)    सौर मंडल (solar system) के बाहर से आए थे। इस समय को देर से भारी बमबारी (plate heavy bombardment) कहते है.कुछ सालो तक यह सिलसिला यही चलता रहा और  क्षुद्र गृह (asteroids) और धूमकेतु (comets) की बौक्षार होती रही जैसे धरती पर मुसलसल बमों की वर्षा हो रही हो।विज्ञान(science) की भाषा में कहा जाता है कि  धूमकेतु (comets) और क्षुद्र गृह  (asteriods) अपने साथ पानी भी लाते है और इसी वजह से यह धरती पर हुई एक और भाग्यशाली घटना थी।



    इस समय की खासियत यह थी कि इससे धरती पर कुछ मात्रा में पानी पहुंचा जिसके बिना यहाँ जीवन का पनपना संभव नहीं था।

    करोड़ो सालो में धरती पर काफी मात्रा में पानी उपलब्ध हो गया जिससे महासागरों और बादलो की बनावट या उत्पत्ति हुई.



    अब धरती पर वो सारे तत्व मौजूद थे जिससे जीवन की शुरुआत हो सकती थी। लेकिन धरती पर गर्मी बहुत ज्यादा थी,भूकम्प और ज्वालामुखी जैसी घटना आम बात थी,ऐसी विकट स्थिति में किसी भी जीव  का पनपना मुश्किल था।

    उस समय के वातावरण में सिर्फ कुछ विशेष प्रकार के फंगस (fungus) और बैक्टीरिया (bacteria) ही जीना (survive)कर पाते थे, क्योकि तब धरती पर ऑक्सीजन अब भी नहीं थी जिसके बिना जटिल जीवन पनप पाना मुश्किल था,मुख्य रूप से धरती पर कार्बनडाइऑक्साइड  थी और उसी वक्त बैक्टीरिया (bacteria) का एक प्राचीन रूप विकसित हो गया उसने सूर्य के प्रकाश को ऊर्जा में बदलना सीख लिया,यह  बैक्टीरिया (bacteria) सूर्य की रोशनी को पचा (digest) करके उसे ऊर्जा में बदल लेता था।


    इस नयी प्रक्रिया से एक गजब का कचरा (waste product) पैदा हो गया 'oxygen'

    हालांकि इस प्रजाति का हर बैक्टीरिया (bacteria) बहुत कम मात्रा में oxygen  पैदा कर पाता था परन्तु धीरे-धीरे लाखो ऐसे bacteria ने धरती को oxygen से लबालब कर दिया जिसके  फलस्वरूप धरती पर जीवन संभव हो पाया। 


    इससे जुड़े अन्य बुनियादी तथ्य हम अगले हफ्ते आप पाठको के समझ उजागर करेंगे। 



    डॉ राजुल दत्त मिश्रा

    REGIONAL EDITOR INA

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