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    कामाख्या देवी के संदर्भ में पौराणिक कथा.

    कामाख्या देवी के संदर्भ में पौराणिक कथा.
    कामाख्या देवी को बहते रक्त की देवी भी कहा जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि यह देवी का एकमात्र ऐसा स्वरूप है जहाँ नियमानुसार हर वर्ष जून के माह में कामाख्या देवी रजस्वला होती है, और उनके रक्त से ब्रह्मपुत्र नदी का रंग लाल हो जाता है और इस दौरान तीन दिनों तक यह मन्दिर बन्द रहता है।

     प्राचीन काल से ही यह मन्दिर तांत्रिक सिद्धियाँ प्राप्त करने हेतु प्रसिद्ध केन्द्र रहा है। इस मन्दिर को 16वीं शताब्दी में नष्ट कर दिया गया था, फिर बाद में राजा नर नारायण ने पुनः 17वीं शताब्दी में इसका निर्माण करवाया।

    यह मन्दिर गुवाहाटी शहर से लगभग 08 किमी0 की दूरी पर नीलांचल पर्वत के बीचो बीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध एवं सिद्ध शक्ति पीठ है।

    मान्यता है कि जब श्री हरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिये थे तब महादेव उनके शव को लेकर तांडव कर रहे थे, जिसके फलस्वरूप तीनो लोकों में हाहाकार मचा था, जिसे देख भगवान विष्णु चिंचित हो उठे और महादेव के क्रोध को शांत करने हेतु उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र उठाकर देवी सती के शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिये थे। जिस स्थान पर देवी सती की योनि और गर्भ आकर गिरे थे आज उसी स्थान पर कामाख्या देवी का मन्दिर स्थित है।


    इस सन्दर्भ में पुराणों में एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार नरकासुर नामक राक्षस कामाख्या देवी की सुन्दरता पर मोहित होकर उनसे विवाह करना चाहता था, उसकी इस इच्छा को जानकर देवी ने नरका से कहा कि यदि वह एक ही रात में नीलांचल पर्वत से मन्दिर तक सीढ़ियाँ बना पायेगा तो ही देवी उससे विवाह करेंगी।

    नरकासुर ने देवी की बात मान लीं और सीढ़ियाँ बनाने का कार्य प्रारम्भ किया, देवी को लगा कि नरका इस कार्य को पूरा कर लेगा इसलिए उन्होंने एक कौवे को मुर्गा बनाकर उसे भोर से पहले ही बांग देने को कहा जैसे ही नरका ने मुर्गे की आवाज सुनी तो उसे लगा कि वह शर्त पूरी नहीं कर पायेगा, परन्तु जब उसे हकीकत का पता चला तो उसने दौड़कर उस मुर्गे की बलि दे दी। उस स्थान को आज भी कुकराकता नाम से जाना जाता है और इस मन्दिर की सीढ़ियाँ आज भी अधूरी ही हैं।


    यहां तारा, धूमावती, भैरवी, बगलामुखी आदि दस महाविद्याओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं। शक्ति के उपासक, तान्त्रिक और साधक नीलांचल पर्वत की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना कर सिद्धि प्राप्त करने के प्रयास में लगे रहते हैं। कामाख्या मन्दिर को वाममार्ग साधनाओं के लिए सर्वाेच्च शक्ति पीठ माना गया है। ऐसा माना जाता है कि गुरू गोरखनाथ, मछिन्द्रनाथ आदि जैसे महान तन्त्र साधकों ने इसी स्थान पर अपनी साधना पूर्ण की थी।

    पौराणिक दस्तावेजों के अनुसार अम्बूवाची पर्व के दौरान, कामाख्या देवी के गर्भ गृह के कपाट अपने आप ही बन्द हो जाते हैं और उनका दर्शन करना निषेध माना जाता है क्योंकि इन्ही तीन दिनों में कमाख्या देवी रजस्वला होती हैं। यह समय तन्त्र साधकों और अघोरियों के लिए एक सुनहरा काल होता है।



    डॉ राजुल दत्त मिश्रा 
    REGIONAL EDITOR INA न्यूज़ 

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