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    स्वच्छता ही स्वच्छ मन और वातावरण का प्रतीक-जितेंद्री जी महाराज



    हरदोई 18 सितंबर- मानस अमृत सेवा संस्थान की ओर से श्री राम जानकी मंदिर परिसर में चल रही श्री राम कथा के तीसरे दिन परम पूज्य श्री जितेंद्री जी महाराज ने उपस्थित भक्तजनों को स्वच्छता के प्रति सचेत रहने और  स्वच्छता की शपथ दिलाकर मां पार्वती और भगवान शिव के अदभुत विवाह का वर्णन सुनाकर भक्तों को भाव विभोर कर दिया ।शिव पार्वती के विवाह की बेला का जिस मनोहर ढंग से वर्णन किया,उसमें भक्तजन मंत्रमुग्ध होकर झूमने को मजबूर हुए। 

    स्वच्छता ही स्वच्छ मन और वातावरण का प्रतीक-जितेंद्री जी महाराज

    शिव पार्वती के विवाह का वर्णन करने से पूर्व जितेंद्री  जी महाराज ने उपस्थित  भक्तजनों से स्वच्छता का संदेश दिया और अपने  आसपास के वातावरण और स्वयं को स्वच्छ रहने की शपथ दिलाई। स्वच्छता ही  अच्छे स्वास्थ्य की  परिचायक है।मानस मर्मज्ञ  श्री जितेंद्री जी महाराज ने शिव पार्वती के विवाह का वर्णन करते हुए कहा कि   पति-पत्नी का सामंजस्य जीवन में उतना ही महत्व रखता है जितना भक्त और भगवान का होता है। साथ ही पूज्य महाराज श्री ने भजन  सुनाया"आई भोले की बरतिया हिमाचल नगरी, दूसरा भजन "हाथ में त्रिशूल गरबा, गले सर्पों की माल, भोले नंदी पर सवार ,रुपवा मनवा मोहत बा" सुनाया। यहां पर उपस्थित सैकड़ों भक्त झूम उठे। नृत्य  करते हुए अपने पैरों को रोक न सके । "सती मरन हरि संत बरु मांगा,जनम-जनम शिव पद अनुरागा"। महाराज श्री ने बताया कि मां सती ने अपने शरीर का त्याग करते हुए भगवान श्री हरि से यही प्रार्थना की कि मुझे पुनः पति के रुप में भगवान शिव प्राप्त हो ,क्योंकि सती माता का भगवान की प्रत्येक बात को ना मानना,अपने श्रेष्ठ की बात को ना मानकर अपने जीवन का अंत करना  स्वाभाविक समझा।उन्होंने  कारण बताते हुए कहा कि  अगस्त्य मुनि के आश्रम में भगवान शिव व सती मां  कथा को सुनने गए।

    वहां पर सती ने कथा को श्रवण नहीं किया और साथ ही अगस्त ऋषि का भगवान शिव का दास समझकर  अपने मद में चूर हो गई। अपने पति पर संशय करना कि यह नर-नारायण नहीं है। तीसरी गलती श्री हरि की परीक्षा लेकर शिव के पास आई तो शिव भगवान ने कहा कि क्या परीक्षा ली ?तो मां बोली ,"कछु ना परीक्षा लीन्ह गोसाई"चौथी गलती पुनः कैलाश पर आकर भगवान जब समाधि से जागृत हुए और कथा कहने लगे" हरि कथा रसाला"फिर भी मां सती ने कथा नहीं सुनी। पांचवीं गलती भगवान शिव ने आसन दिया और जैसे ही आसन दिया, मां उस पर तुरंत बैठ गई। भगवान शिव ने बार-बार समझाया कि पिता के घर ना जाएं ,कारण बतलाया कि आपके पिता ने यज्ञ किया है उस यज्ञ में हमें नहीं बुलाया है।यदि आप हमारी धर्मपत्नी हैं तो उस यज्ञ में ना जाएं ,फिर भी मां सती ने बात नहीं मानी।

    परिणाम स्वरूप अपने शरीर त्याग दिये।कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में एक गलती को छुपाने की वजह से अनेकों गलतियां कर बैठता है। धनुष से निकला हुआ बाण वापस नहीं आता है जिस प्रकार से मुख से निकली हुई दुर्वचन वापस नहीं होते। हमें सोच समझ कर अपने विवेक का प्रयोग करके बात करनी चाहिए। श्री जितेंद्री जी महाराज ने कहा कि भारतीय परंपरा के अनुसार, पहले के समय में प्रत्येक शिष्य अपने गुरुजन के पास अध्ययन के लिए जाता था और शिक्षा ग्रहण करता था लेकिन आज के परिवेश में माता पिता बच्चों के लिए शिक्षा का प्रबंध हेतु अपने घरों में गुरुजनों को बुलवाते हैं कोचिंग कराकर शिक्षा देते हैं यह जिस दिन से शुरू हो गया ,उस दिन से बच्चों में एक मानसिक रुप से मद उत्पन्न हो गया। यदि मेरे गुरुजन मुझे मारेंगे, डाटेंगे या अपशब्द कहेंगे तो उस शिक्षक को बदलवा देंगे।

    आज कल का शिक्षार्थी अपने गुरुजन को अपने मद के अनुसार प्रयोग करवाना चाहता हैं। अतः बच्चों को गृह कोचिंग न लगाकर उसे शिक्षक के पास भेजें,जिससे बच्चों में मद ना आ सके। कथा के संयोजक/ व्यवस्थापक मुकेश गुप्ता ने मानस अमृत सेवा संस्थान कानपुर से पधारे संरक्षक जय कृष्ण शुक्ला ,अनूप पांडे ,मुकेश दुबे, दिवाकर अवस्थी, सुधीर, प्रवीण दुबे, ज्ञान शुक्ला आदि आचार्य गणों को माल्यार्पण कर व्यास गद्दी की पूजा की। श्री महाराज ने बताया, कल राम जन्म की कथा का रसपान कराया जाएगा।

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