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    चुनाव आयोग ने SC में कहा- दागी नेताओं को दल बनाने से रोकें



    आपराधिक मामलों में दंडित होने के बाद चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किए गए नेताओं के लिए नई पार्टी बनाना या पार्टी में किस पद पर रहना मुश्किल होगा। भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि ऐसे नेताओं को पार्टी बनाने से रोकने के लिए दायर याचिका का वह पूरा समर्थन करता है। शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर 70 पन्नों के शपथपत्र में निर्वाचन आयोग ने कहा कि दलों में आंतरिक प्रजातंत्र बेहद जरूरी है और इसे लागू करने के लिए निर्वाचन आयोग को कानूनी शक्तियां दी जानी चाहिए।


    निर्वाचन आयोग के निदेशक (विधि) विजय कुमार पांडे ने यह शपथपत्र अश्वनी उपाध्याय की एक रिट याचिका के जवाब में दाखिल किया है। याचिका में मांग की गई है कि दंडित नेताओं को राजनैतिक दल बनाने और दलों में पदों पर रहने से रोका जाए। उन्होंने कहा था कि एक ओर तो अपराधों में दंडित होने के बाद वे छह वर्ष के लिए चुनाव लड़ने से रोक दिए जाते हैं लेकिन दूसरी ओर वे राजनैतिक दलों में पदों पर बने रहते हैं और अपनी पार्टी बना लेते हैं, जिससे आपराधिकरण जारी रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को विचार के लिए स्वीकार करते हुए 1 दिसंबर 2017 को केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।

    चार बार सरकार को लिखा
    आयोग ने शपथपत्र में कहा कि एक बार नहीं बल्कि चार बार चुनाव आयोग ने सरकार को चुनाव सुधार प्रस्तावों में राजनीति के आपराधिकरण को रोकने के लिए आयोग को शक्तियां देने के लिए लिखा है। पहली बार 1998 में उसके बाद 2004 में फिर 2010 में तथा हाल ही दिसंबर 2016 में आयोग ने सरकार को प्रस्ताव दिए। जिसमें यह भी मांग की गई है कि आयोग को राजनैतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने की शक्ति होनी चाहिए।

    संसदीय समिति की भी सिफारिश
    आयोग ने कहा इतना ही नहीं 2002 में संविधान समीक्षा आयोग ने तथा उसके बाद राज्यसभा की स्थाई समिति ने 2005, 2013 में निर्वाचन आयोग को दलों को डीरजिस्टर करने की शक्ति देने के लिए कानून में संशोशन करने की सिफारिश की। जिसमें कहा गया था, यदि कोई दल लागातर 10 वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ रहा है उसे डीरजिस्टर कर देना चाहिए।

    विधि आयोग भी समर्थन में
    आयोग ने हलफनामे में कहा, राष्ट्रीय विधि आयोग ने भी अपनी 255वीं रिपोर्ट में आयोग को दलों के अंदरूनी लोकतंत्र की निगरानी करने तथा दलों को डीरजिस्टर करने की शक्तियां देने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 29ए में संशोधन करने की सिफारिश की।
    स्वयं कार्रवाई भी की

    आयोग ने शपथपत्र में कहा कि हालांकि आयोग ने स्वयं कार्रवाई करते हुए फरवरी 2016 में लगभग 255 ऐसे राजनैतिक दलों को गैरसूचित (डीलिस्ट) कर दिया था जिनका जमीन पर कोई अस्तित्व नहीं था। इनके बारे में कर विभाग, सीबीडीटी को सूचना भेजी गई थी कि उन्हें आयकर में कोई छूट न दी जाए।

    उत्तराखंड से सैयद उवैस अली

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